निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 981, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २१५ ) ६ अ० १ पा० ६ खं० वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्रमण्डूका अवादिषुः ॥ [ऋ० सं० ५, ७, ३, १] ॥ संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः– अब्रु- वाणाः । अपि वा उपमार्थे स्यात्— ब्राह्मणा इव व्रतचारिणः– इति । वाचं पर्जन्यप्रीतां प्रावादिषुः मण्डूकाः ॥ अर्थः– "संवत्सरम्०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है। 'संवत्सरम्' वर्ष भर 'शशयानाः' (शिश्यानाः) न बोलने से सोये हुये जैसे 'ब्राह्मणाः' (ब्रुवाणाः सर्वथा सन्तो वक्तुम्) सब प्रकार से बोलने वाले होकर भी 'व्रतचारिणः' (अब्रुवाणाः) मौनी रहते हुये— अथवा (ब्राह्मण शब्द) उपमा अर्थ में हो– ब्राह्मणों के समान व्रतधारी रहते हुये [जिस प्रकार ब्राह्मण वर्षा में उपाकर्म करके हाथ में पवित्र धारण करके मेखला = मूंज आदि विहित द्रव्य की तागड़ी पहिन कर नियत समय तक वेद की वाणी को बोलते रहते हैं, वैसे ही] 'मण्डूकाः' मेंढक 'पर्जन्यजिन्विताम्' मेघ से तृप्त हुई 'वाचम्' वाणी को 'प्र-अवादिषुः' (वदन्ति) बोलते हैं ॥ व्याख्या– उक्त निगम में भाष्यकारने 'ब्राह्मण' शब्द से यौगिक वृत्ति ˙ ब्रुवाण (बोलने वाला) अर्थ तथा रूढिवृत्ति से ब्राह्मण जातीय अर्थ लेकर व्याख्या धर्म का परिदर्शन किया है। अर्थात्– मन्त्रों में प्रमाण के अविरुद्ध एक शब्द के नाना अर्थ परिकल्पित करने में भी कोई हानि नहीं होती। निरु०– वसिष्ठो वर्षकामः पर्जन्यं तुष्टाव । तं