निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २१६ ) ६ अ० १ पा० ७ खं० मण्डूकाः अन्वमोदन्त । स मण्डूकान् अनुमोदमा- नान् दृष्ट्वा तुष्टाव । तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति- ॥६॥ अर्थ:- वसिष्ठ ऋषि ने वर्षा की कामना से पर्जन्य (मेघ) की स्तुति की । मण्डूकों ने (मेंढकों ने ) उसका अनुमोदन किया = सराहा । उस ऋषि ने अनुमोदन करते हुये मण्डकों को देखकर स्तुति की ॥ उसको कहने वाली यह ऋचा है-॥६॥ (खं० ७) निरु०- "उप प्रवद मण्डूकि वर्ष मावद तादुरि । मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः ॥” [ ] इति सा निगदव्याख्याता । 'अक्षाः' अश्नुवते एनान्- इतिवा। अभ्यश्नुवते एभिः- इतिवा । तेषाम्- एषा भवति- ॥७॥ अर्थ- "उप प्रवद" हे 'मण्डूकि !' हे मेंढकी ! (त्वम्) तू (मा) मेरे (उप) (गम्य) पास होकर 'प्रवद' खूब बोल 'वर्षम्' वर्ष भर 'आ' सामने होकर 'वद' बोल 'तादुरि' हे तैरने के स्वभाव वाली । 'ह्रदस्य' तलाव के 'मध्ये' बीच में 'चतुरः' चारों 'पदः' पैरों को 'विगृह्य' फैलाकर 'प्लवस्व' तैर । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है । 'अक्षाः (४) (पासे) यह निर्वचन करने योग्य है । 'अक्ष' क्यों ? 'अश्नुवते एनान्' जुवारिये इन्हें हाथों से