निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्षं वेदयन्ते ॥ 'ग्रावाणः' हन्तेर्वा । गृणातेर्वा । गृह्णातेर्वा ॥ तेषाम्-एषा भवति- ॥ ८ ॥ अर्थः- "प्रावेपाः" यह ऋचा अक्षपुत्र मौजवंत ऋषि की है । [ एते अक्षाः-] ये अक्ष या पासे 'प्रावेपाः' ( प्रवेपिणः ) बहुत कांपने वाले 'बृहत्तः' ( महतःवृक्षस्य ) बड़े वृक्षके हैं- किसी बहुत कांपने वाले वृक्षसे उपजे हैं = बने हुए हैं। 'प्रवाते- जाः' ( प्रवणोजाः ) बहुत वायुके या जलके स्थान में या काल में उत्पन्न हुये हैं । 'इरिणे' (अपगतर्णे ) जहां पुत्र पौत्र आदि तक ऋण नहीं जाता, किन्तु अपने तक ही रहता है, ऐसे स्थान में उत्पन्न हुए हुए, 'मौजवतस्य' मूजवान् पर्वत में उत्पन्न हुए हैं, 'सोमस्य' सोमके 'भक्षः-इव' भक्षण के समान 'मा' मुझे 'मादयन्ति' ( हर्षयन्ति ) हर्षित करते हैं अथवा ( तर्पयन्ति ) तृप्त करते हैं । और जो 'विभीदकः' कोष्ठ का भेदन करने वाला 'जागृविः' जागरण का करने वाला तथा 'मह्यम्' मेरे लिये 'अच्छान् ( अच्छच्छदत् ) (प्रशंसति-एमान् ) इनकी प्रशंसा करता है, ( तस्य विभीदकस्य फलानि ) उस विभीदक वृक्ष के ये फल हैं॥ 'इरिण' क्या ? निर्ऋण होता है । (क्योंकि-जूवा के स्थान में हारने से जो ऋण होता है, वह हारने वाले के पुत्र पौत्र पर नहीं जाता, किन्तु उस पुरुष तथा उस स्थान में ही रहता है ।) 'ऋ' ( क्रया०प० ) धातु से है। अथवा 'इरिण' ऊपर भूमि होती है । क्योंकि-'अपगता ओषधयः अस्मात्' इससे ओषधि गई हुई होती हैं-इसमें कुछ उपजता नहीं ।