निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘मौजवत’ क्या ? मूजवान् में उत्पन्न । ‘मूंजवान ही क्या ? पर्वत वह क्यों ? मूंजवाला होने से ‘मुञ्ज’ क्यों ? इषीका से (तूली से) सिसोचन की जाती है । ‘इषीका’ कैसे ? गति अर्थ में ‘इष’ (तु०प०) धातु से । यह इषीका भी इसी से है । ‘विभीदक’ क्यों ? भेदन करने से । ‘जागृवि,’ क्यों ? जागरण से । क्योंकि-जो जूवामें हारता है वह दुःख से जागता है, और जीतता है, वह सुख से = हर्ष से जागता है । पहिली ऋचा से इनकी प्रशंसा करता है, और अगली ऋचाओं से इसकी निन्दा करता है । इस ऋचा को अक्ष- परिद्यून (अक्षपुत्र) ऋषि का आर्ष बताते हैं,-अक्षपुत्र ऋषि इसका ऋषि है, ऐसा कहते हैं । ‘ग्रावाणः’ (५) (पत्थर) कैसे ? हिंसार्थक ‘हन्’ (अदा० प०) धातु से हैं । क्योंकि-इनसे हनन किया जाता है । शब्द अर्थ में ‘गृ’ (क्र्या०प०) धातु से हैं । क्योंकि-इनसे शब्द होता है अथवा ‘ग्रह’ (क्र्या०प०) धातु से हैं । क्योंकि-ये कूटने आदि क्रिया के लिये ग्रहण किये जाते हैं । उन ग्रावों (पत्थरों) की स्तुति की यह ऋचा है-॥८॥ व्याख्या “प्रावेपा०” मन्त्र में-जिस वस्तुमें जो गुण या दोष होते हैं, वे सब प्रायः उसके कारण से ही आए हुए होते हैं, इसी न्याय से अक्षों के सब गुण दोषों को उनके कारण भूत वृक्ष में ऋषि देखता है । इन में जो कम्पन मादन जागरण और