भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 986

हिन्दी निरुक्त ( ३२० ) ६ अ० १ पा० ६ खं० भेदन आदि धर्म हैं वे सब उनके उत्पत्ति स्थान वृक्षसे आये हुये हैं, इसी प्रकार संसार की अन्य २ वस्तुओं में या प्रा- णिश्रों में देखना चाहिये यह मन्त्र का उपदेश है ॥८॥ ( खं० ६ ) निरु०-प्रैते वदन्तु प्र॒वयं व॑दाम॒ ग्राव॑भ्यो॒ वाच॑ वदता वदद्भ्यः । यदद्र॑यः पर्वताः साकमाशवः श्लोकं॒ घोषं॒ भरथेन्द्राय सोमिनः ॥” ( ऋ०सं० ८, ४, २९, १ ) ॥ प्रवदन्तु एते, प्रवदाम वयं, ग्रावभ्यो वाचं वदत वदद्भ्यः यद्-अद्रयः पर्वताः आदरणीयाः सह सोमम्-आशवः क्षिप्रकारिणः । ‘श्लोकः’ शृणोतेः । ‘घोषः’ घुष्यतेः । सोमिनो यूयं स्थ-इतिवा । सोमिनो गृहेषु इतिवा । येन नराः प्रशस्यन्ते स ‘नाराशमो’ मन्त्रः । तस्य-एषा भवति-॥९॥ अर्थ:-“प्रैते वदन्तु०” इस ऋचा का अर्बुद ऋषि है। हे ग्रावो ! ( पत्थरों ) ‘यद्’ ( यस्मात् ) जिस से कि ( यूयम् ) तुम ‘अद्रयः’ ( आदरणीयाः ) आदर के योग्य हो, ‘पर्वताः’ ( पर्ववन्तः ) पर्वों वाले हो- ग्रन्थियों वाले हो, ‘साकम्’ ( सह ) साथ मिले हुए ‘आशवः’ ‘सोमम् अश्नीथ’ सोम को अशन करते हो-कूटते हो, और उस सोमको कूटते