निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २२१ ) ६ अ० १ पा० ६ खं० हुए तुम 'इन्द्राय' इन्द्र के अर्थ 'श्लोकम्' श्रवणीय = मनको लुभाने वाले 'घोषम्' (शब्दम्) शब्द को 'भरथ' धारण करते हो, और जो (यूयम्) तुम 'सोमिनः' सोम वाले ( स्थ ) होते हो अथवा सोम वाले यजमान के (गृहेषु) घरोंमें (एवं कुरुध्वे) ऐसा करते हो [ इस कारण तुम से कहता हूँ-] 'एते' (उद्- गातारः) ये उद्गाता = गाने वाले ऋत्विज् तुम्हारे अर्थ स्तु- तिए' 'प्रवदन्तु' कहें या गावैं । और 'वयम्' हम होता लोग 'प्र-वदाम' स्तुतिए' कहें । और [अध्वर्युओं से भी हम कहते हैं कि-] (यूयमपि) तुम भी 'वद्भ्यः' बोलते हुओं 'ग्रावभ्यः' पत्थरों के लिये 'वाचम्' वाणी को 'वदत' बोलो । 'नराशंस' (६) शब्द का निर्वचन कर्तव्य है । 'नराशंस' कौन है ? येन नराः प्रशस्यन्ते सः नाराशंसो मन्त्रः' जिस से नर (मनुष्य) स्तुति किये जाते हैं, वह 'ना- राशंस' मन्त्र होता है-'नराशंस' एक प्रकार का मन्त्र होता है । क्योंकि-उससे नरोंकी = मनुष्यों की प्रशंसा कीजातीहै । “तस्य०” उस नाराशंस मन्त्र की यह ऋचा उदाहरण है, अथवा उस नर विशेष भावयव्य की प्राधान्य स्तुति की यह ऋचा है ॥६॥ व्याख्या । इस देवता काण्ड में यह 'नराशंस नाम पढ़ा गया है, और आचार्य ने स्वयम् यह व्याख्यान किया है कि-यह नाम मन्त्र विशेष का है, इससे प्रकरण के अनुसार ऐसी प्रतीति होती है कि- और पदार्थों के समान मन्त्र की स्तुति भी मन्त्रों में आती होगी ? किन्तु ऐसा नहीं है । 'नराशंस'