भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 988

हिन्दी निरुक्त ( २२२ ) ६ अ० १ पा० १० खं० मन्त्र वही है, जिस में नरों की स्तुति हो इस से नरों की प्राधान्यस्तुति वाली ऋचा ही इसका उदाहरण होसकती है। यद्यपि जिसकी मन्त्र में स्तुति होती है, उसीका नाम समाम्नाय में पढा जाता है, इससे मनुष्यों के ही नामों का समाम्नाय में समाम्नान होना चाहिये था, तथापि नरों की कोई सामान्य स्तुति = नरमात्र की स्तुति = नर जातीय की अनुगत या व्यापक स्तुति मन्त्रों में नहीं आती, बल्कि-राजा- ओं की स्तुति आती है, और उनकी भी राजामात्र की स्तुति नहीं, बल्कि किसी किसी विशेष व्यक्ति की एक २ करके स्तुति आती है, इसी से नरों के नामों का समाम्नान (पाठ) न करके 'नाराशंस' मन्त्र का नाम ही पढ़ाया गया है, और उसके उदाहरण के लिये भावयव्य राजा की स्तुति की ऋचा दी जाती है ॥ ६ ॥ (खं० १०) निघ०-“अमन्दान्स्तोमान्प्रभरे मनीषा सिन्धा- वधि क्षियतो भाव्यस्य । यो मे सहस्रममिमीत सवान्तूत्तौ राजा श्रव इच्छमानः ॥” [ऋ० सं० २, १, ११, १] ॥ अमन्दान् स्तोमान् अबालिशान्,अनल्पान् वा। ‘बालः' बलवर्त्ती । भर्त्तव्यो भवति । अम्बा अस्मै अलं भवति इति वा । अम्बा अस्मै बलं भवति इतिवा । बलो वा प्रतिषेधव्यवहितः । प्रभरे मनीषा । मनसः ईषया, स्तुत्या, प्रज्ञया