निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२२३) ६ अ० १ पा० १० खं० वा । सिन्धौ अधिनिवसतः भावयव्यस्य राज्ञः यः मे सहस्रं निरमिमीत सवान् अतूर्त्तो राजा । अतूर्णः इति वा। अत्वरमाणः इति वा । प्रशंसां इच्छमानः ॥१०॥ इति नवमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥९,१॥ अर्थः- "अमन्दान्स्तोमान् "दान से संतुष्ट होकर कक्षीवान् ऋषि कहता है - (अहम्) मैं (तस्य) उस 'सिन्धौ-अधि' सिन्धु नदी के ऊपर (समीप) 'क्षितयः' (निवसतः) बसने वाले 'भाव्यस्य' (भाव- यव्यस्यराज्ञः)भावयव्य राजा के 'मनीषा' (मनीषया = मन- सः ईषया = स्तुत्या = प्रज्ञया वा) मनकी प्रेरित या प्रेरणा की हुई स्तुति से अथवा बुद्धि से 'अमन्दान्' (अबालिशान् ) अनल्पान् वा ) जो मूर्खों के योग्य नहीं , ऐसे अथवा बहुत घने 'स्तोमान्' स्तोमों को = स्तुतियों को 'प्रभरे' ( प्रहरे = उच्चारये ) उच्चारण करता हूं । 'यः' ( राजा ) जिस राजा ने 'अतूर्त्तः' (अतूर्णः इतिवा अत्वरमाणः इति वा)बिना वेग के या बिना घबराहट के 'श्रवः ( प्रशंसां ) इच्छमानः' अपनी प्रशंसा = अटल कीर्त्तिको इच्छा करते हुये ने 'मे' मेरे 'सह- स्त्रं' हजार 'सवान्' यज्ञों को 'प्रमिमीत' (निरमिमीत) सिद्ध किया है- बहुत यज्ञों के उपकरण = सामान दिये हैं ॥ 'बाल' क्यों ? वह बलवर्त्ती = बल में रहने वाला होता है । अथवा भर्त्तव्य (पालने योग्य) होता है । अथवा अम्बा (माता) इस के लिये अलम् या पर्याप्त(बस) होती है, उससे