निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 990, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २२४ ) ९ अ० २ पा० १ खं० 'बाल' है । अथवा अम्बा (माता) इसके लिये बल होती है । इससे यह 'बाल' है । अथवा बल इसमें नहीं होता इससे यह 'बाल' है ॥ १० ॥ इति हिन्दी निरुक्ते नवमस्याध्यायस्य प्रथमः पादःसमाप्तः ९।१ द्वितीयः पादः ॥ ( खं० १ ) निघ०— रथः॥७॥ दुन्दुभिः॥८॥ इषुधिः ॥६॥हस्तघ्नः ॥१०॥ अभीशवः ॥ ११ ॥ धनुः ॥१२॥ ज्या ॥१३॥इषुः॥१४॥अश्वा- जनी ॥१५॥ उलूखलम् ॥१६॥ निरु०- यज्जसंभोगाद् राजा स्तुतिं लभेत । राजसंयोगाद् युद्धोपकरणानि । तेषां रथः प्रथमागामी भवति ॥ 'रथः' रंहतेर्गतिकर्मणः । स्थिरतेर्वा स्याद् विपरीतस्य । रममाणःअस्मिन् तिष्ठति इतिवा । रपतेर्वा । रसतेर्वा । तस्य- एषा भवति-॥१(११) ॥ अर्थ:- यजक के संयोग से राजा स्तुति को प्राप्त हो या होता है। राजा के संयोग से युद्ध के उपकरण = साधन [स्तुति, को प्राप्त हों या होते हैं] । उन युद्ध के उपकरणों में 'रथ' प्रथम (मुख्य ) है । क्यो िक और युद्ध के उपकरण उसी में रखे जाते हैं ।