निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २२५ ) ६ अ० २ पा० १ खं० 'रथ' कैसे ? गति अर्थ में 'रंह्' (भ्वा०प०) धातु से है। क्यों कि-चलने के अर्थ ही उसकी उत्पत्ति है। अथवा उलटे हुए 'स्थिर' (नामधा०) से हो। अर्थात् 'स्थिर' होता हुआ 'रथ' कहा गया होसकता है। क्यों कि उसमें बैठा हुआ योद्धा जैसा सुप्रतिष्ठित होता है, वैसा अन्य अश्व आदि में नहीं। अथवा 'रप' (स्वा०प०) धातु से है। क्यों कि-उससे शत्रु को रुपण या मोह होता है। अथवा 'रस' (स्वा० प०) धातु से है। क्यों कि- उसमें बैठे हुये को रस का आस्वादन जैसा होता है। “तस्य” उस रथ की यह स्तुति है ॥१(११)॥ व्याख्या देवता से अन्य वस्तुओं की स्तुति का हेतु मन्त्रों में देवताओं की ही स्तुति होती है और होना चाहिये, क्यों कि वेही स्तुति करने वाले की कामनाओं को अपने माहाभाग्य से पूर्ण कर सकते हैं, किन्तु अन्य असमर्थ राजा और रथ आदि नहीं, अतः उन की स्तुति मन्त्रों में क्यों आती है। इसी प्रश्न का उत्तर भाष्यकार "यज्ञसंयोगात्” इस न्याय से देते हैं। क्या भाष्यकार यह उत्तर अपनी ओर से देते हैं ? नहीं, यह 'अमन्दान्०” इस मन्त्रोक्त भाव- यव्य राजा की स्तुति के हेतु का ही अनुवादमात्र करते हैं, अर्थात्- जिससे कि- उसने कक्षीवान् के सहस्र (हजार) यज्ञों का साधन किया था, इसी से उसकी उक्त ऋषि के द्वारा मन्त्र में स्तुति है। यही यज्ञ के संयोग से स्तुति कह-