निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २२६ ) ९ अ० २ पा० १ खं० लाती है । भाव यह कि— यह मुख्यतया राजा की स्तुति नहीं, यज्ञ की ही है, उसी के संबन्ध से वह स्तुत होता है। तथा इसके संस्रम्ध से युद्ध के साधन स्तुत होते हैं । ऐसा कोई आचार्य मानते हैं । दूसरे आचार्य इसे “स्तुतिसंक्रमणन्याय” कहते हैं । उनका यह अभिप्राय है कि–उक्त मन्त्र में भावयव्य की स्तुति का कारण वही है, जो युद्ध के उपकरणों की स्तुति का है, किन्तु कोई पृथक् कारण नहीं है । इसी प्रयोजन को लक्ष्य करके भाष्यकार–“यज्ञसंयोगात् राजा स्तुतिंलभते । राजसंयोगात् युद्धोपकरणानि” ऐसा कहते हैं । अर्थात्–यहां मन्त्र में राजस्तुति के प्रश्नका जो उत्तर भाष्यकार ने दिया है, उसका अभिप्राय भगवद् दुर्गाचार्य कहते हैं कि–पुराने टीकाकारों ने दो प्रकार से समझा है, उसमें पहिले मतका अभिप्राय है कि– राजा की स्तुति का हेतु वही है, जो मन्त्र में कहा हुआ है । अर्थात्–भावयव्य राजा ने कक्षीवान् ऋषिके सहस्र यज्ञों में सहायता पहुंचाई, उसी ( यज्ञसंयोग ) से उसकी स्तुति मन्त्र में हुई और राजा के संयोग से युद्धोपकरण रथ आदिकों की स्तुति मन्त्रों में आती है । यहां इस प्रथम मत में, क्योंकि– यज्ञ कर्म प्रशंसायुक्त है, इस से उस प्रशंसायुक्त कर्म के करने से राजा भी प्रशंसा- युक्त होता है, इस लिये राजा भी मन्त्रों में स्तुति के योग्य हो जाता है । अर्थात्–राजा की प्रशंसा यज्ञ की प्रशंसा के अधीन है । एवम् युद्धोपकरण रथ आदिकों की जो मन्त्रों में प्रशंसा आती है, उसका उत्तर भी इसी प्रकार से दिया जाता