निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २२७ ) ६ अ० २पा० १ खं०
है, कि राजा लोकमें प्रशंसा-युक्त होता है, उसके सम्बन्ध से युद्ध के उपकरण रथ आदि भी प्रशंसा युक्त होते हैं। यहां राजा की प्रशंसा के अधीन युद्धोपकरण रथ आदिकों की प्रशंसा है, किन्तु स्वतः उनमें प्रशंसा की योग्यता नहीं है । दूसरे आचार्योंने इन पूर्वाचार्यों के हेतु को यों उचित नहीं समझा कि वे मन्त्रों में राजा की स्तुतिका हेतु यज्ञसंयोग बताते हैं, और रथ आदिकों की स्तुति का हेत उनमें राज- संयोग को बताते हैं, सुतराम् दोनों स्थानोंमें अलग २ प्रशंसा का हेतु आता है, किन्तु एक नही । तथा एक वस्तु रथ आदि की प्रशंसा के कारण को पूछते हैं, तो उन में राजसंयोग को हेतु बताते हैं, किन्तु राजा में भी क्या प्रशंसा का हेतु है ? यह प्रश्न अवशिष्ट रहजाता है। जब उसका उत्तर उसमें यज्ञ संयोग से देते हैं, तब वही प्रश्न उस यज्ञ में उपस्थित हो जाता है, अतः उनके मतमें यह प्रश्न पूरा ही नहीं होता तथा सब स्थानों में पृथक् २ ही हेतु रहता है । इस दोषकी निवृत्तिके लिये दूसरे पण्डितों ने उस हेतु को खोज निकाला जो सब स्थानों में समान रूप से मिलता है तथा वह सर्वो- नुगत सर्वत्र व्यापक आत्मवस्तु ही है। जहां वह नहीं ऐसी कोई वस्तु नहीं। अतः उस आत्मवस्तु के लक्ष्य से हम जिस किसी वस्तु की भी स्तुति कर सकते हैं, और वह स्तुति आत्म वस्तु से स्तुति संक्रमन्याय से सब बस्तुओं में धारा प्रवाह रूपसे अनुवर्त्तमान होती है। यही वैदिक सनातन सिद्धान्त है। यहां पर स्तुति संक्रमन्याय से राजा तथा रथ आदिमें आत्मवस्तु से स्तुति किस प्रकार आती है, इस की व्याख्या आगे पढ़िये ।