भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 994

इस न्यायके अनुसार वे इस प्रकरण को इस प्रकार वर्णन करते हैं कि-अश्वमेध यज्ञ में सब युद्ध के साधनों के सहित रथ में बैठे हुए कवचको धारण किये हुये राजा की “जीमूतस्येव भवति प्रतीकम्” इस मन्त्र से स्तुति की जाती है। वह क्यों ? इस भूमिका को लेकर भाष्यकार कहते हैं “यज्ञसंयोगाद् राजा स्तुतिं लभते” अर्थात्- पहिले राजा यज्ञ के संयोग से स्तुति को प्राप्त होता है, और उसके संबन्ध से युद्धोपकरण। ‘युद्धोपकरण’ क्यों हैं ? वे युद्ध के लिये उपकृत = उपयुक्त होते हैं, या युद्ध में उपकार करते हैं। सो यह आचार्यने व्यापी = व्यापक “स्तुतिसंक्रमन्याय” दिखाया है। अर्थात्- युद्ध के उपकरण राजा के संयोग से स्तुति को प्राप्त होते हैं-उसके वे अङ्ग हैं, इस लिये उस के संबन्ध से उनकी स्तुति होती है, राजा भी यज्ञ के संबन्ध से, यज्ञ भी देवता के संबन्ध से और देवता भी आत्मा के संबन्ध से स्तुति को प्राप्त होता है। सो यह आत्मा ही अङ्ग और प्रत्यङ्ग (अङ्ग के अङ्ग) के रूप में स्थित हुआ सब अव- स्थाओं में स्थित हुआ स्तुति किया जाता है। इस प्रकार यह सब स्तुति आत्मा की ही है। सो कहा भी है- “स्थाने स्थाने स्तुतिः सर्वा स्थानाधिपतिभागिनी। आत्मप्रतिष्ठा बोद्धव्या तथोपकरणस्तुतिः ॥” अर्थात्-स्थान स्थान में जो सब स्तुति है, वह स्थान के अधिपति = स्वामी की है। वैसे ही उपकरणों (रथादिकों) की स्तुति को आत्मा में समझना चाहिये प्रयोजन यह कि