भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त ( २२९ ) ६ अ० २ पा० २ खं० ऊपर दिखाई हुई प्रणाली के अनुसार यथासंभव मार्ग से सब स्तुति क्रम २ से आत्मा में पहुंच जाती है । वह कहीं बीच में नहीं रुकतीं । यही स्तुति संक्रमणन्याय का अभिप्राय है, इस का उपयोग सब जगह करना चाहिये ॥ १ ( ११ ) ॥ ( खं० २ ) निरु०-‘वनस्पते वीड्वङ्गो हिभूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्वा स्थाता ते जयतुजेत्वानि ॥” (ऋ० सं० १,७.३५,१)॥ वनस्पते दृढाङ्गो हि भव अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः कल्याणवीरः गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्व इति संस्तभस्व आस्थाता ते जयतु जेतव्यानि ‘दुन्दुभिः' इति शब्दानुकरणत् । द्रुमो भिन्नः इति वा । दुन्दुभ्यतेर्वा स्यात् शब्दकर्मणः । तस्य- एषा भवति– ॥२ (१२) ॥ अर्थः- “वनस्पते” यह ऋचा गर्ग आर्षिकी है। ‘वन- स्पते!’ हे वानस्पत्य ! बनस्पति के पुत्र रथ ! ‘ वीड्वङ्गः ’ ( दृढाङ्गः ) दृढ अङ्गोंवाला ‘भूयाः’ ( भव ) हो। और फिर ‘अस्मत्सखा’ हमारा सखा ‘प्रतरणः’ संग्रामों के पार लेजाने वाला ‘सुवीरः’ (कल्याणवीरः) नहीं डरने वाला तथा नहीं खण्डित होने वाला आरोही (चढने वाले ) वाला हो। [और तेरा बचाव हमने कर दिया है, क्योंकि-] तू ‘गोभिः’ गोओं के चर्म से अथवा चर्बी से ‘सन्नद्धः सब ओर से मढाहुआ है,