भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 996

हिन्दी निरुक्त । ( २३० ) ६ अ० २ पा० ३ खं० इस कारण 'वीलयस्व' (संस्तम्भस्व) अपने को थाम । 'ते' तेरा 'आस्थाता' चढने वाला ' जेत्वानि ' ( जेतव्यानि ) जेय = जीतने योग्य शत्रुओं 'जयतु' जीते ॥ 'दुन्दुभिः' (८) यह शब्द के अनुकरण पर है जैसा ही वह ताडित हुआ 'दुम् दुम् भि- दुम् दुम् भि'शब्द करता है, वही उसका नाम है । अथवा 'द्रुमो भिन्नः' (वृक्ष कटा) इन दो पदों से है- 'द्रुम' से पहिला भाग 'दुन्दु' और ' भिन्न ' से दूसरा भाग ' भि ', इस प्रकार 'दुन्दुभि' पद है । अर्थात् द्रुम (वृक्ष) के एक भाग से छांटा हुआ और चर्म से मंढाहुआ ( बाजा ) है । अथवा शब्द अर्थ में ' दुन्दुभ ' ( दि० प० ) धातु से है । उसकी यह ऋचा है—॥ २ [१२] ॥ ( ख० ३ ) निरु०– “उपश्वासय पृथिवी मुतद्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत् । सदुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवै ईराद्दवीयो अपसेध शत्रून् ॥” [ऋ०सं०४,७,३५, ४] ॥ उपश्वासय पृथिवीं च दिवं च बहुधाते घोषं मन्यतां विष्ठितं स्थावरं जङ्गमं च यत् स दुन्दुभे सहजोषकः इन्द्रेण च देवैश्च दूराद् दूरतरम् अप- सेध शत्रून् ॥ “इषुधिः” इषूणांनिधानम् । तस्य-एषा भवति-॥३ [१३] ॥

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