नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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इनमें स्तोत्र एवं नीति-विषयक काव्य प्रायः मुक्तक काव्य के रूप में उपलब्ध होते हैं। यहाँ मुक्तकों से अभिप्राय उन स्वतन्त्र छन्दोबद्ध रचनाओं से है जिनमें पूर्वापर प्रसङ्ग की अपेक्षा नहीं होती, अपितु इनका प्रत्येक पद्य स्वतन्त्र रूप से अपने अभिप्राय को अभिव्यक्त करने में पूर्णतया समर्थ तथा स्वतः पूर्ण रसास्वादन कराने में सक्षम होता है।
महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित शृंगार शतक, नीतिशतक तथा वैराग्य शतक, मुक्तक काव्य के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। यहाँ हमारा विवेच्य इस शतकत्रय में से नीतिशतकम् है जो लौकिक संस्कृत साहित्य की श्रव्य-काव्य परम्परा में पद्यकाव्य की खण्डकाव्य अथवा गीतिकाव्य कोटि के अन्तर्गत नीतिपरक मुक्तक काव्य के रूप में परिगणित है।
अतः इस ग्रन्थ के विवेचन से पूर्व गीतिकाव्य के विषय में विस्तार से ज्ञान प्राप्त करना उचित होगा।
(क) गीतिकाव्य का स्वरूप- काव्य का वह स्वरूप जिसमें पद्यबद्ध रचनाएँ होने के साथ-साथ पूर्वा-पर प्रसङ्ग की आवश्यकता नहीं होती अर्थात् प्रत्येक पद्य भावाभिव्यक्ति में पूर्णतया स्वतन्त्र होता है, शास्त्रीय दृष्टि से खण्डकाव्य का ही दूसरा नाम गीतिकाव्य है, जिसमें काव्यतत्त्व के साथ-साथ संगीतात्मकता की प्रमुखता और भावों की प्रधानता होती है।
प्राचीन ग्रन्थों में गीतिकाव्य के स्वरूप पर विचार किया गया है— १. मुक्तकं श्लोक एवैकश्चमत्कार क्षमः सत्ताम्। (अग्निपुराण ३३७-३६) २. खण्डकाव्यं भवेत् काव्यस्यैकदेशानुसारि च। (साहित्यदर्पण. ६.३३९) ३. पूर्वापरनिरपेक्षेणापि येन रसचर्वणा क्रियते तदेवमुक्तम्। (ध्वन्यालोक)
उक्त बातों को ध्यान में रखते हुए ही डॉ. कपिलदेव द्विवेदी ने गीतिकाव्य को परिभाषित करने का सुन्दर प्रयास किया है— ‘‘गीतिकाव्य भाव-प्रधान होते हैं। इनमें अन्तरात्मा की ध्वनि होती है। जीवन का कोई एक पक्ष वर्णित होता है। महाकाव्य यदि जीवन की समग्रता है तो गीतिकाव्य एक देशीयता। महाकाव्य में विस्तार है तो गीतिकाव्य में घनत्व। महाकाव्य में शिथिलता है तो गीतिकाव्य में एकाग्रता और तन्मयता है।’’
(ख) गीतिकाव्य का उद्भव और विकास- जिस प्रकार सभी प्रकार की साहित्यिक विधाओं का उद्गमस्थल वेद को माना गया है। ठीक उसी प्रकार गीतिकाव्य के बीज भी हमें ऋग्वेद में सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। वहाँ विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियों में मुक्तक स्तोत्रसाहित्य के मूलतत्त्व हमें उपलब्ध होते हैं। इन स्तुतियों में भी हमें भावुकता परिलक्षित होती है।
इसके पश्चात् विकासक्रम की दृष्टि से गीतिकाव्य के लक्षण हमें आदिकाव्य रामायण, पुराण, महाभारत आदि में अनेक स्थलों पर विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियों