नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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में प्राप्त होते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि यहाँ तक के साहित्य में प्रायः स्तोत्र गीतिकाव्य के ही दर्शन होते हैं। जिसे हम धार्मिक गीतिकाव्य भी कह सकते हैं। परवर्ती पौराणिक साहित्य में इसका विकसित रूप देखने को मिलता है।
किन्तु लौकिक संस्कृत साहित्य में गीतिकाव्य का वर्तमान स्वरूप हमें विधिवत् रूप से महाकवि कालिदास के मेघदूत तथा ऋतुसंहार में परिलक्षित होता है। इसके बाद इस परम्परा का दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ घटकर्पर का २२ पद्यों में निबद्ध घटकर्पर काव्य है। जिसमें वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में एक विरहिणी पत्नी दूर स्थित अपने पति के पास अपना संदेश प्रेषित करती है।
पुनः इसी प्रणयसंदेश परम्परा में कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का गीतिकाव्य साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, जिनमें कृष्णमूर्ति का यज्ञोल्लास, श्रीराम शास्त्री का मेघ प्रति संदेश, महाकवि विक्रम का नेमिदूत, वेदान्त देशिक का हंस-संदेश, रुद्रवाचस्पति का भ्रमरदूत, वेंकटाचार्य का कोकिल-संदेश एवं कृष्णचन्द्र पन्त का चन्द्रदूत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इसी परम्परा को पोषित करने वाले ग्रन्थों में महाकवि जयदेव विरचित गीतगोविन्द विशेषतया उल्लेखनीय है। महाकवि हाल (सन् १२५ ई.) की गाथा सप्तशती, महाकवि भर्तृहरि (छठीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) का नीतिशतक, शृंगारशतक तथा वैराग्यशतक, महाकवि अमरु (लगभग ७०० ई.) का अमरुशतक, महाकवि विल्हण की चौरपंचाशिका आदि इसी परम्परा के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं।
महाकवि हाल के अनुकरण पर ही गोवर्धनाचार्य ने आर्यासप्तशती की रचना की। गीतिकाव्यों की परम्परा में पण्डित जगन्नाथ का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने पीयूष-लहरी, सुधा-लहरी, करुणा-लहरी, यमुना वर्णन, भामिनी-विलास आदि ग्रन्थों का प्रणयन करके स्तोत्र गीतिकाव्य में श्री वृद्धि की।
इसके अतिरिक्त इस परम्परा के कुछ उल्लेखनीय ग्रन्थ इस प्रकार हैं— शारङ्गधर-पद्धति, उद्भट-सागर, शंकराचार्य का चतुःशतक, पुष्पदन्त का महिम्नस्तोत्र, आनन्दवर्धनाचार्य का देवीशतक, यामुनाचार्य का चतुःश्लोकी स्तोत्ररत्न तथा महाकवि जयदेव का गंगास्तव, कवीन्द्ररससमुच्चय, सदुक्तिकर्णामृत, सूक्तिमुक्तावली, सुभाषितावली, पद्यावली, पद्यरचना, काव्यसंग्रह तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारम् इत्यादि।
(ग) संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ— उपलब्ध गीतिकाव्य साहित्य के आधार पर हम कुछ विशेषताओं का यहाँ उल्लेख कर रहे हैं, जिनके कारण इन्हें सहृदय समाज में लोकप्रियता प्राप्त हुई—
१. शृंगारिकता— गीतिकाव्यों में कुछ काव्य शृंगार प्रधान हैं, किन्तु उनकी विशेषता यह है कि वहाँ प्रेम का उदात्त स्वरूप चित्रित हुआ है तथा उसके बाह्य सौन्दर्य की