नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 14, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१२
अपेक्षा अन्तः सौन्दर्य को प्रधानता दी गई है। शृंगार के दोनों पक्ष संयोग और वियोग का प्रभावी चित्रण इन काव्यों में देखने को मिलता है। भर्तृहरि का शृंगार शतक इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।
२. कोमल भावों की प्रधानता- इनमें मानव के अत्यन्त कोमल भावों का उदात्त चित्रण देखने को मिलता है। इन काव्यों में भयानक, वीभत्स आदि रसों का प्रायः अभाव ही हैं। यही कारण है कि इनमें शृंगार, शान्त अथवा वीर रस को प्रधानता मिली है।
३. संगीतात्मकता- सभी प्रकार के गीतिकाव्यों में यह विशेषता हमें प्रमुखतया देखने को मिलती है। यहाँ सभी गेयात्मक छन्दों का चयन किया गया है, यही कारण है कि इन काव्यों में हृदय को छूने वाली वीणा की झंकार-सी स्वर की मधुरिमा का सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
४. भावपक्ष की प्रमुखता- गीतिकाव्यों में भाव, कल्पना, संवेदनशीलता एवं अनुभूति आदि काव्य के भावपक्ष विषयक तत्त्वों को ही प्रमुखता मिली है। कलापक्ष यहाँ प्रायः सभी कवियों की दृष्टि में गौण ही रहा है। विशेषतया धार्मिक दृष्टि से लिखे गए गीतिकाव्यों में संवेदनात्मक भावों की प्रबलता का मार्मिक स्वरूप सहज ही प्रवाह रूप में देखा जा सकता है।
५. प्रसाद एवं माधुर्य गुण की प्रधानता- इन काव्यों में ओजगुण का प्रायः अभाव ही रहा है, क्योंकि भाषा का अत्यन्त सरल रूप, कोमलकान्त पदावली के साथ सहजता और सरसता में अभिवृद्धि करता हुआ, यहाँ सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।
६. जीवन के सभी पक्षों का चित्रण- संस्कृत गीतिकाव्यों में जीवन के सभी पक्षों प्रेम, भक्ति, सुख, दुःख, वैराग्य आदि सभी का स्पर्श किया गया है। वास्तविकता तो यह है कि मानव के जीवनदर्शन को जो मुखरता आकर्षक रूप में इन काव्यों में प्राप्त हुई है, वह अन्यत्र काव्य की किसी विधा में नहीं।
७. कल्पना की स्वच्छन्दता- इन काव्यों में विषय-विशेष की सीमाओं से परे कवि हृदय को कल्पनाओं के सागर में स्वच्छन्द रूप से गोते लगाने का अधिक आनन्द प्राप्त होता है। यही कारण है कि यहाँ अनुभूति की मार्मिकता, निरीक्षण की सूक्ष्मता, भाषा की सरसता और सरलता, अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग, विचारों की नवीनता एवं छन्दों की व्यवस्था को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है।
इसके अतिरिक्त गीतिकाव्य में धार्मिकभावना, नैतिक-शिक्षा, अनुभव की गम्भीरता, नखशिख वर्णन एवं प्रकृति का मनोहारी बाह्य एवं आन्तरिक चित्रण भी देखने को मिलता है। जिनका यहाँ विस्तार की दृष्टि से विवेचन नहीं किया जा रहा है।
इसके पश्चात् अब हम गीतिकाव्य के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण नीतिशतकम् के रचयिता महाकवि भर्तृहरि के विषय में विचार करेंगे-