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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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(घ) भर्तृहरि का जीवन-चरित- महाकवि भर्तृहरि के जीवनचरित के विषय में कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु जनश्रुति के आधार पर कुछ कथाएँ प्रचलित हैं, जिनका हम यहाँ संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं—

महाराजा गंधर्वसेन की दो पत्नियाँ थीं, जिनमें से एक के पुत्र महाकवि भर्तृहरि थे और दूसरी पत्नी के पुत्र का नाम विक्रम था। विक्रम की माता मालवा के राजा की पुत्री थी। उस समय मालवा की राजधानी धारा थी। विक्रम और भर्तृहरि की शिक्षा-दीक्षा उनके नाना धाराधिपति की देखरेख में ही सम्पन्न हुई। शिक्षा पूर्ण होने पर उन्होंने अपने नाती विक्रम को अपना राज्य देने की इच्छा प्रकट की, क्योंकि उन्हें कोई पुत्र नहीं था।

किन्तु विक्रम ने अपने बड़े भाई के रहते राज्य को स्वीकार करने से मना कर दिया। अन्त में विक्रम की इच्छानुसार भर्तृहरि राजा बने और विक्रम प्रधानमन्त्री बन कर राज्य की देखभाल करने लगे। इसी बीच उन्होंने मालवा की राजधानी धारा से हटाकर उज्जैन को बना दिया।

इधर राजा भर्तृहरि भोग-विलास में डूब गए, उन्होंने राज्य की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी काल में उन्होंने शृंगार शतक की रचना की। विक्रम ने अपने बड़े भाई को बहुत समझाया, किन्तु परिणाम उल्टा ही हुआ और विक्रम एक षड्यन्त्र के शिकार होने के कारण राज्य से बाहर निकाल दिये गए। कहते हैं इसके पश्चात् विक्रम ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया, बाद में वे पूर्वी बंगाल में ढाका के निकट जाकर बस गए जो स्थान आज भी विक्रमपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

इस बीच भर्तृहरि के साथ एक महत्त्वपूर्ण घटना घटी। एक दिन अकस्मात् एक साधु राजा भर्तृहरि के पास आया और एक फल देकर कहा कि इसे खाने से अक्षययौवन की प्राप्ति होगी। राजा अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। अतः उन्होंने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया, किन्तु उनकी पत्नी किसी अन्य पुरुष से प्रेम करती थी। अतः उसने वह फल अपने प्रेमी को दे दिया। उसका प्रेमी, रानी से प्रेम न करके किसी वेश्या को अत्यधिक चाहता था। इसलिए उसने वह फल वेश्या को दे दिया। वह वेश्या भर्तृहरि के प्रति अत्यधिक श्रद्धा करती थी। अतः उसने वह फल राजा को लाकर दे दिया।

राजा उस फल को देखकर चौंक उठा। उसने इस विषय में गहन पूछताछ की तो उसे सभी प्रेम सम्बन्धों का पता चल गया। जब रानी को इस सबका पता लगा तो उसने महल से कूदकर आत्महत्या कर ली। राजा को इस सम्पूर्ण घटना से अत्यन्त दुःख हुआ। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर उन्होंने प्रस्तुत श्लोक की संरचना की—

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥

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