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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 194 में से

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कहते हैं कि भर्तृहरि ने इस घटना को शीघ्र ही भुला दिया और फिर से दूसरी पत्नी पिङ्गला से पहले के समान ही प्रेम करने लगे।

एक बार भर्तृहरि शिकार के लिए जंगल गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक शिकारी ने एक हिरण का शिकार किया, किन्तु उसी समय शिकारी को एक सांप ने काट लिया और वह वही मर गया। तभी उस हिरण की पत्नी वहाँ आई और अपने पति के शरीर पर मृत होकर गिर पड़ी। उधर शिकारी की पत्नी को जब शिकारी की मृत्यु का पता लगा तो उसने भी अपने पति के साथ चिता में अपने प्राण त्याग दिये।

भर्तृहरि इस सब घटनाक्रम को देखकर अत्यन्त विस्मित हुए उन्होंने घर आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त अपनी प्रियतमा पिङ्गला¹ को सुनाया। उसने बिना किसी आश्चर्य की अभिव्यक्ति करते हुए कहा कि सती तो बिना अग्नि को जलाए भी स्वयं को भस्म कर सकती है। यह सुनकर राजा चुप रहे, किन्तु उन्होंने अपनी पत्नी की परीक्षा लेने का मन ही मन निश्चय कर लिया।

एक बार वे शिकार के लिए वन में गए और वहाँ से खून में लथपथ अपने कपड़े एक सेवक के द्वारा भिजवाकर यह संदेश दिया कि 'राजा तो व्याघ्र द्वारा मारे गए' रानी यह सुनकर खून से सने कपड़े लेकर, उन्हें पृथ्वी पर रखकर, प्रणाम करके वहीं समाप्त हो गई।

उधर राजा ने जब यह सब समाचार सुना तो उन्हें बहुत गहरा धक्का लगा और उन्हें वैराग्य हो गया। उन्होंने राजकाज का परित्याग कर दिया और वन में जाकर एक तपस्वी का जीवन व्यतीत करने लगे। वहीं पर उन्होंने महान् योगी गोरखनाथ से योग की दीक्षा भी ग्रहण की और अमरत्व प्राप्त किया।

उपर्युक्त कथा के कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होते, न ही उनके ग्रन्थों से इस प्रकार की घटना का कोई संकेत प्राप्त होता है। एक मात्र श्लोक ‘‘यां चिन्तयामि’’ इत्यादि से ही इस ओर थोड़ा संकेत प्राप्त होता है, किन्तु कुछ विद्वान् इस श्लोक को ही प्रक्षिप्त मानकर इसकी प्रामाणिकता में संदेह व्यक्त करते हैं। वस्तुतः महाकवि भर्तृहरि का जीवनचरित भी कालिदास आदि अन्य प्रसिद्ध कवियों के समान ही पूर्णतया अनुमान पर ही आधारित है। उस पर भी जटिलता उस समय और अधिक बढ़ जाती है, जब भर्तृहरि नाम के अन्य व्यक्ति भी इतिहास में उपलब्ध होते हैं। इतना ही नहीं जिन विक्रम नाम के व्यक्ति को इनका बड़ा भाई बताया गया, वह विक्रमादित्य ही थे या कोई और, इस विषय में भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि विक्रम नाम के व्यक्ति भी इतिहास में अनेक हुए हैं। इसलिए यह गुत्थी बहुत अधिक उलझ जाती है। कहते हैं इनके वनप्रवास में इनकी बहन के पुत्र गोपीचन्द इनके साथ थे।


१. रानी के नाम के सम्बन्ध में विद्वानों में मतवैमत्य मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह नाम पद्माक्षी तो अन्यों के अनुसार यह नाम भानुमती या अनङ्ग सेना था।