नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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किन्तु उपर्युक्त कथा के आधार पर तथा भर्तृहरि के द्वारा विरचित शतकत्रय के आधार पर इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि महाकवि भर्तृहरि का सम्बन्ध राजकीय जीवन से था तथा वे अत्यन्त नीति-निपुण थे। अपने युवाकाल में उन्होंने शृंगारशतक, प्रौढावस्था में नीतिशतक तथा वनवास काल में वैराग्यशतक की रचना की।
(ङ) भर्तृहरि का स्थिति काल- महाकवि भर्तृहरि जिन्होंने शतकत्रय की रचना की, वे किस काल में हुए, इस विषय में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है। इसके प्रमुख कारण है-
१. कालिदास आदि के समान उन्होंने भी अपनी रचनाओं में कहीं भी इस ओर संकेत नहीं किया है। २. भर्तृहरि नाम से इतिहास में कुछ अन्य व्यक्ति भी हुए तथा उन्होंने भी संस्कृत ग्रन्थों की रचना की। ३. जनश्रुति के आधार पर इन्हें विक्रमादित्य के साथ जोड़ा जाता है, किन्तु ये कौन से विक्रमादित्य थे, यह भी अस्पष्ट है।
इसलिए विद्वानों ने अपने-अपने विवेक के अनुसार महाकवि भर्तृहरि के काल का निर्धारण करने का प्रयास किया है, किन्तु फिर भी विद्वानों में इस विषय में मतैक्य नहीं हो सका है। हम यहाँ इस विषय में संक्षेप में विचार कर रहे हैं-
१. एक मत के अनुसार- भर्तृहरि विक्रम संवत् का प्रारम्भ करने वाले सम्राट् विक्रमादित्य के भाई थे। अतः इनका समय ईसा पू. ५७ के लगभग मानना चाहिए। २. कुछ विद्वानों के अनुसार- ये विक्रमादित्य (६४४ ई. में) हूणों को हराने वाले थे। महाकवि भर्तृहरि इन्हीं के भाई थे। ई. पू. ५७ ई. वाले सम्राट् विक्रमादित्य के नहीं। ३. चीनी बौद्धयात्री इत्सिंग ने लिखा है कि लगभग ६५१ ई. में भर्तृहरि नामक वैयाकरण का देहान्त हुआ था। ये ही प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ 'वाक्यपदीय' के रचयिता माने जाते हैं। ४. सम्भवतः इसी आधार पर डॉ. कीथ¹ ने भी वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को ही शतकत्रय का भी रचयिता स्वीकार करते हुए उनका समय ६५० ई. के आसपास निर्धारित किया है। ५. डॉ. सूर्यकान्त² ने भी भर्तृहरि को वाक्यपदीय की रचना करने वाला स्वीकार करते हुए उनकी मृत्यु ६५१ ई. में स्वीकार की है। ६. ईसा की सप्तमशती के अन्त में स्थित अमरुक कवि द्वारा विरचित अमरुक शतक पर महाकवि भर्तृहरि के पद्यों का प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है। अतः इस
१. संस्कृत साहित्य का इतिहास- डॉ. कीथ पृ. २१५ २. संस्कृत वाङ्मय का विवेचनात्मक इतिहास- डॉ. सूर्यकान्त १९७२ पृ. २४७