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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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किन्तु उपर्युक्त कथा के आधार पर तथा भर्तृहरि के द्वारा विरचित शतकत्रय के आधार पर इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि महाकवि भर्तृहरि का सम्बन्ध राजकीय जीवन से था तथा वे अत्यन्त नीति-निपुण थे। अपने युवाकाल में उन्होंने शृंगारशतक, प्रौढावस्था में नीतिशतक तथा वनवास काल में वैराग्यशतक की रचना की।

(ङ) भर्तृहरि का स्थिति काल- महाकवि भर्तृहरि जिन्होंने शतकत्रय की रचना की, वे किस काल में हुए, इस विषय में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है। इसके प्रमुख कारण है-

१. कालिदास आदि के समान उन्होंने भी अपनी रचनाओं में कहीं भी इस ओर संकेत नहीं किया है। २. भर्तृहरि नाम से इतिहास में कुछ अन्य व्यक्ति भी हुए तथा उन्होंने भी संस्कृत ग्रन्थों की रचना की। ३. जनश्रुति के आधार पर इन्हें विक्रमादित्य के साथ जोड़ा जाता है, किन्तु ये कौन से विक्रमादित्य थे, यह भी अस्पष्ट है।

इसलिए विद्वानों ने अपने-अपने विवेक के अनुसार महाकवि भर्तृहरि के काल का निर्धारण करने का प्रयास किया है, किन्तु फिर भी विद्वानों में इस विषय में मतैक्य नहीं हो सका है। हम यहाँ इस विषय में संक्षेप में विचार कर रहे हैं-

१. एक मत के अनुसार- भर्तृहरि विक्रम संवत् का प्रारम्भ करने वाले सम्राट् विक्रमादित्य के भाई थे। अतः इनका समय ईसा पू. ५७ के लगभग मानना चाहिए। २. कुछ विद्वानों के अनुसार- ये विक्रमादित्य (६४४ ई. में) हूणों को हराने वाले थे। महाकवि भर्तृहरि इन्हीं के भाई थे। ई. पू. ५७ ई. वाले सम्राट् विक्रमादित्य के नहीं। ३. चीनी बौद्धयात्री इत्सिंग ने लिखा है कि लगभग ६५१ ई. में भर्तृहरि नामक वैयाकरण का देहान्त हुआ था। ये ही प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ 'वाक्यपदीय' के रचयिता माने जाते हैं। ४. सम्भवतः इसी आधार पर डॉ. कीथ¹ ने भी वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को ही शतकत्रय का भी रचयिता स्वीकार करते हुए उनका समय ६५० ई. के आसपास निर्धारित किया है। ५. डॉ. सूर्यकान्त² ने भी भर्तृहरि को वाक्यपदीय की रचना करने वाला स्वीकार करते हुए उनकी मृत्यु ६५१ ई. में स्वीकार की है। ६. ईसा की सप्तमशती के अन्त में स्थित अमरुक कवि द्वारा विरचित अमरुक शतक पर महाकवि भर्तृहरि के पद्यों का प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है। अतः इस


१. संस्कृत साहित्य का इतिहास- डॉ. कीथ पृ. २१५ २. संस्कृत वाङ्मय का विवेचनात्मक इतिहास- डॉ. सूर्यकान्त १९७२ पृ. २४७

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आधार पर इन्हें अमरुक कवि से कुछ पूर्व अर्थात् छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध अथवा संप्तम शती के पूर्वार्द्ध में मानना उचित प्रतीत होता है।

अब हम उपर्युक्त तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में इस विषय पर विचार कर रहे हैं—

१. प्रथम तो हमें विचार करना होगा कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य को परस्पर जोड़ना कितना उचित है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर इतना तो स्पष्ट ही है कि उनका विक्रमादित्य के साथ सम्बन्ध अधिकांश विद्वानों द्वारा तथा जनश्रुतियों में स्वीकार किया गया है।

सिंहासनद्वात्रिंशिका तथा विक्रमांकदेव चरितम् में भर्तृहरि का विशेष उल्लेख करते हुए उन्हें राजा विक्रमादित्य का बड़ा भाई बताया गया है।

हाँ इस विषय में कुछ विद्वान् इन्हें सम्राट् विक्रमादित्य का बड़ा भाई स्वीकार नहीं करते, किन्तु उनके मत में— 'विक्रमादित्य से इन्हें बड़े भाई के समान सम्मान प्राप्त था।'

अतः इतना तो सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य का कोई सम्बन्ध अवश्य था। ई. पू. ५७ में स्थित विक्रमादित्य को भर्तृहरि से जोड़ना इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि उस स्थिति से बाकी किसी भी बात का तालमेल नहीं बैठ पाता है। अतः इन्हें ईसा की सप्तम शती में स्थित विक्रमादित्य मानना ही उचित प्रतीत होता है।

हाँ, इस विषय में इतना अवश्य निश्चय से कहा जा सकता है कि चीनी यात्री इत्सिंग द्वारा उल्लिखित वैयाकरण भर्तृहरि तथा शतकत्रय के रचयिता भर्तृहरि दोनों को एक मानना किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। इसके पक्ष में कुछ तर्क प्रस्तुत हैं—

१. चीनीयात्री इत्सिंग ने भर्तृहरि को बौद्ध मतावलम्बी माना है, किन्तु शतकत्रय का सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करने पर कोई एक भी प्रमाण उनके बौद्ध धर्मावलम्बी होने का प्राप्त नहीं होता, अपितु उनके आधार पर उन्हें वैदिक धर्मावलम्बी शिवभक्त अथवा वैष्णव अवश्य कहा जा सकता है।

२. उनकी रचनाओं में जो भाषा की सरलता दृष्टिगोचर होती है वह किसी वाक्यपदीयकार जैसे उच्चकोटि के वैयाकरण से अपेक्षित प्रतीत नहीं होती, क्योंकि वह अपने व्याकरण विषयक ज्ञान के प्रदर्शन के लोभ संवरण को रोकने में कैसे समर्थ हो सकता था, जाने अन्जाने में उसका प्रदर्शन स्वाभाविक भी था, किन्तु शतकत्रय में कहीं भी ऐसा नहीं हुआ है।

३. इत्सिंग के कथन में भी असत्यता नहीं है। यदि हम वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को शतकत्रय के रचयिता भर्तृहरि से भिन्न मान लेते हैं तो, यह गुत्थी स्वतः ही सुलझ जाती है।

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४. प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान् प्रोफेसर के. ए. सुब्रह्मण्य अय्यर¹ ने वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को शतकत्रय के भर्तृहरि से भिन्न ही स्वीकार किया है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि भर्तृहरि सम्राट् विक्रमादित्य (६४४ ई.) के समकालिक एवं उनके अत्यन्त निकट थे। ये शैव वेदान्ती थे। बौद्ध धर्मावलम्बी भर्तृहरि इनसे भिन्न और वाक्यपदीय ग्रन्थ के रचयिता हैं। इन्होंने जीवन में ऐश्वर्यों का अत्यधिक भोग किया तथा जीवन के अन्तिम क्षणों में इन्हें वैराग्य हुआ। इनका समय सप्तम शती का पूर्वार्द्ध मानना अधिक उचित प्रतीत होता है।

(च) भर्तृहरि की कृतियाँ- यों तो भर्तृहरि के नाम से अनेक ग्रन्थ¹ मिलते हैं, किन्तु हमारे विवेच्य महाकवि भर्तृहरि के मुक्तक पद्यों के तीन संकलन ही उपलब्ध होते हैं— शृंगारशतक, नीतिशतक और वैराग्यशतक। भारतीय परम्परा के अनुसार ये तीनों शतक एक ही कवि द्वारा प्रणीत हैं। अब हम यहाँ इनका संक्षेप में परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं—

१. शृंगारशतकम्- इसमें कवि ने सुमधुर शैली में रमणियों के मनमोहक सौन्दर्य के आकर्षण को चित्रित किया है। इसके अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने स्त्रियों की शृंगारिक चेष्टाओं एवं हावभावों का सूक्ष्म अध्ययन किया था।

साथ ही इस रचना के अन्त में उन्होंने सुन्दरता एवं प्रेम को सर्वोच्च न मानकर उसकी निस्सारता और प्रेम की दुःखद परिणति का भी चित्रण किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस रचना का प्रारम्भ उन्होंने अपनी युवावस्था में किया और समाप्ति प्रौढावस्था में। यही कारण है कि यहाँ कवि आकर्षण से विकर्षण की ओर, अतिप्रणय से अप्रणय की ओर बढ़ता हुआ दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः इस शतक में सांसारिक भोग और वैराग्य इन दोनों विकल्पों के मध्य अनिश्चय की मनःस्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है, जो धीरे-धीरे वैराग्य के प्रति निश्चयात्मक स्वरूप में बदल गई है।

२. नीतिशतकम्- इस शतक के सौ से अधिक श्लोकों में कवि ने विद्या, परोपकार, वीरता, परिश्रम, साहस और उदारता आदि उदात्त मनोभावों का सरल भाषा में मनोहारी चित्रण किया है। इसमें कवि के ऐश्वर्यसम्पन्न राजाओं की निष्ठुरता, हृदयहीनता, अहंकारिता, दुर्जनों एवं मूर्खों के द्वारा सज्जनों को दिए जाने वाले कष्टों एवं अपमान का चित्रण करते हुए, उसके प्रति विद्रोहात्मक स्वर को मुखरता मिली है। अनेक नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए, मानवतावादी दृष्टिकोण को अत्यन्त हृदयग्राही रूप में यहाँ चित्रित किया गया है। वस्तुतः नीतिशतकम् सम्पूर्ण सूक्ति-साहित्य का अलंकार स्वरूप ग्रन्थ है, जिसमें अनेक दीप्तिमान् माणिक स्थल-स्थल पर जड़े हुए हैं।


१. भर्तृहरि का वाक्यपदीय - अय्यर - राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी - १९८१
१. वाक्यपदीय, वाक्यपदीय टीका, महाभाष्यदीपिका, मीमांसाभाष्य, वेदान्तसूत्रवृत्ति, शब्दधातु समीक्षा, शृंगार, नीति और वैराग्यशतक।

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३. वैराग्यशतकम्- इस संरचना में कवि की सांसारिक भोगों एवं आकर्षणों के प्रति उदासीनता की भावना को सुन्दर अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। इसमें कवि ने संसार की निस्सारता, विषमता, भोगतृष्णा की विभीषिका तथा यौवन की अस्थिरता का मार्मिक चित्रण करते हुए अपने सहृदय पाठक को वैराग्य की ओर उन्मुख करने का सफल प्रयास किया है। वस्तुतः तीनों शतकग्रन्थ संस्कृत गीतिकाव्य साहित्य की अग्रणी एवं उत्कृष्ट रचनाएँ कही जा सकती हैं।

(छ) भर्तृहरि की भाषा-शैली- महाकवि भर्तृहरि के ग्रन्थों में सर्वत्र भाषा का अत्यन्त सरल स्वरूप देखने को मिलता है। उन्होंने भाषा में सर्वत्र शब्दों का उचित प्रयोग किया है। यहाँ हमें भाषा में स्वाभाविकता के दर्शन होते हैं। उन्होंने प्रसाद एवं माधुर्य गुणों का सर्वाधिक प्रयोग किया है। वाक्ययोजना इतनी सरल प्रयुक्त हुई है कि पढ़ते ही अर्थ हृदयंगम हो जाता है। इनका प्रत्येक पद्य स्वयं में पूर्ण है।

महाकवि ने जीवन के सभी पक्षों को अत्यन्त निकट से देखा और अनुभव किया है, इसलिए उनका वर्णन अत्यन्त स्वाभाविक एवं हृदयग्राही बन पड़ा है। उन्होंने सर्वत्र भावों के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है। वस्तुतः संस्कृत-कविता का सुन्दरतम स्वरूप हमें महाकवि की कविता में सर्वत्र देखने को मिलता है। यद्यपि उन्होंने सर्वत्र वैदर्भी रीति का प्रयोग किया है, किन्तु कुछ स्थलों पर गौड़ी रीति के दर्शन भी हमें सहज ही होते हैं—

क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि कष्टां दशामापन्नोऽपि,
शिथिलप्रायोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि।
मत्तेभेन्द्रविभिन्नकुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः,
किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी॥२७॥

उनकी भाषा में सर्वत्र अलंकारों का अत्यन्त स्वाभाविक प्रयोग हुआ है, कहीं भी उन्होंने अलंकारों से भाषा को सजाने का सायास प्रयास नहीं किया है। उनके शतकत्रय में हमें अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, दीपक, दृष्टान्त, समुच्चय, परिसंख्या, अर्थापत्ति, अप्रस्तुत-प्रशंसा, स्वभावोक्ति, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग देखने को मिलता है। अर्थान्तरन्यास एवं पर्यायोक्ति अलंकारों का उन्होंने सर्वाधिक प्रयोग किया है।

व्यंग्यार्थ उनकी सबसे बड़ी विशेषता है जिसके द्वारा वे अपने पाठक को सहज ही कोई न कोई उपदेश प्रदान कर देते हैं। वस्तुतः उनकी शैली में रोचकता, तार्किकता, उक्ति-वैचित्र्य की निपुणता, भावों की स्वाभाविकता, भाषा का लालित्य सहज ही देखने को मिलते हैं।

उनके काव्य की विशेषता है कि यहाँ आदर्शवादी व्यक्ति को नीतिपरक श्लोकों की उपलब्धि होती है, शृंगारिक वृत्ति वाले पाठक को शृंगाररस से ओतप्रोत काव्य के दर्शन

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होते हैं तथा विरक्त व्यक्ति को उसकी रुचि के अनुरूप शान्तरस की अनुभूति होती है। यहाँ पर आचार, नीति, कर्तव्याकर्तव्य, परोपकार, दुर्जन, सज्जन, कर्म, भाग्य, मान, शौर्य, क्रौर्य, प्रेम, नश्वरता आदि सभी विषयों को कवि ने अपनी लेखनी का विषय बनाया है।

उनके श्लोक इतने मार्मिक हैं कि सीधे हृदय पर प्रभाव डालते हैं। रसों की दृष्टि से उनके काव्य में श्रृंगार, वीर और शान्त रस का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। वीभत्स रस का यहाँ प्रायः अभाव ही है।

महाकवि भर्तृहरि के काव्यों में सर्वाधिक शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त स्रग्धरा, आर्या, अनुष्टुप्, वसन्ततिलका, शिखरिणी, हरिणी, द्रुतविलम्बित, इन्द्र-वज्रा, उपेन्द्रवज्रा उपजाति, वंशस्थ आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है। उनके सभी छन्द प्रायः गेयात्मकता लिए हुए हैं।

अन्त में हम महाकवि भर्तृहरि की भाषाशैली के विषय में संक्षेप में इतना ही कह सकते हैं कि उनके काव्य में कलापक्ष की अपेक्षा भावपक्ष अधिक प्रबल रहा है। उनके काव्य का प्रमुख उद्देश्य है, मानव जीवन के विविध पक्षों को चित्रित करते हुए सम्पूर्ण समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करना। जिसमें उन्होंने अधिकांश रूप में सफलता भी अर्जित की है। सुभाषित तो उनके तीनों शतकों में पदे-पदे भरे पड़े हैं।

उपर्युक्त कथ्यों की पुष्टि में कुछ उदाहरण हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। भाषा का माधुर्य एवं सरल स्वरूप द्रष्टव्य है—

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥

प्रेम का अस्थिर स्वरूप ऐन्द्रिक सुख के प्रति वैराग्य तो स्वयं कवि के जीवन में भी हलचल पैदा कर देता है। विषय प्रतिपादन के साथ-साथ भाषा का प्रवाह द्रष्टव्य है—

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥२॥

धन के विषय में कवि की अभिव्यक्ति कितनी सुन्दर बन पड़ी है—

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥४३॥

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शृंगारशतक में स्त्री सेवा ही सर्वोपरि बताई गई है—

मात्सर्यमुत्सार्य विचार्य कार्यं, आर्याः समर्यादमुदाहरन्तु।
सेव्या नितम्बाः किमु भूधराणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम्॥ (२-१५)

किन्तु विषय भोग ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। ये सब तो नाशवान् है, इसका प्रतिपादन भी द्रष्टव्य है—

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥

अथ नीतिशतकम्

दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय¹ नमः शान्ताय तेजसे²॥१॥

अन्वय– दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये, स्वानुभूत्येकमानाय शान्ताय तेजसे नमः।

पदच्छेद– दिक् + कालादि + अनवच्छिन्न + अनन्त + चिन्मात्रमूर्तये, स्वानुभूति + एकमानाय शान्ताय तेजसे नमः।

अनुवाद– दिशा, काल आदि से आच्छन्न न होने वाले, अन्तरहित, चैतन्यमात्र स्वरूप वाले, स्वानुभूतिमात्र प्रमाण वाले, शान्तस्वरूप, तेजोस्वरूप (परमपिता, परमब्रह्म) को नमस्कार है।

व्याख्या– जिस परमब्रह्म को देश, काल आदि सीमित सांसारिक तत्त्वों द्वारा आच्छादित नहीं किया जा सकता अर्थात् उसे देश अथवा समय की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता, जिसका कभी भी अन्त नहीं होता है। चैतन्य ही जिसका स्वरूप है, शान्तस्वरूप वाले, ज्योतिपुत्र स्वरूप वाले परमपिता परमात्मा को नमस्कार है।

विशेष– १. ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए संस्कृत काव्यों में मंगलाचरण की परम्परा रही है। जिसका निर्वाह महाकवि ने यहाँ प्रथम श्लोक में निराकार परमात्मा को प्रणाम करके किया है।
मंगलाचरण तीन प्रकार का होता है— आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक तथा वस्तु-निर्देशात्मक। इनमें से प्रथम मंगलाचरण में कवि श्रोताओं अथवा दर्शकों के लिए ‘वः पातु’ आदि पदों का प्रयोग करके मंगलकामना करता है। द्वितीय में कवि अपने इष्ट देव को ‘नमः’ आदि पदों का प्रयोग करते हुए प्रणाम निवेदन करता है। तृतीय मंगलाचरण में कथावस्तु का संक्षेप में प्रतिपादन करना भी वस्तुनिर्देशात्मक के अन्तर्गत आता है, जैसे मेघदूत में।
२. ‘नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च’ सूत्र से ‘नमः’ पद के योग में परमात्मा के सभी विशेषणों में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥


१. स्वानुभूत्येकसाराय
२. अमूर्तये नमस्तस्मै गुणातीतगुणात्मने॥

२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

४. स्वभावोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कालादि + अनवच्छिन्न = कालाद्यनवच्छिन्न (यण्-इकोयणचि)
२. अनवच्छिन्न + अनन्त = अनवच्छिन्नानन्त (दीर्घ - अकःसवर्णे दीर्घः)
३. स्व + अनुभूति + एकमानाय (दीर्घ, यण् संधि)
४. न अनन्त इति अनन्त (नञ् समास)
५. शान्ताय = शान्त + ङे (चतुर्थी विभक्ति, एकवचन)
६. दिशश्च कालादयश्च तैरनवच्छिन्ना अनन्ता चिन्मात्रा मूर्तिः यस्य तस्मै।
७. स्वस्य अनुभूतिः स्वानुभूतिः, स्वानुभूतिरेकं मानं यस्य तस्मै।

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥२॥

अन्वय- (अहम्) याम् सततम् चिन्तयामि, सा मयि विरक्ता (वर्तते)। सा अपि अन्यम् जनम् इच्छति, सः जनः अन्यसक्तः (च) अस्मत् कृते च काचित् अन्या परितुष्यति। ताम् च तम् च मदनम् च इमाम् च माम् च धिक्।

अनुवाद- (मैं) जिस (स्त्री) का निरन्तर चिन्तन करता हूँ, वह मुझसे विरक्त (है)। वह भी दूसरे पुरुष को चाहती है (और) वह पुरुष (भी) अन्य (स्त्री) के प्रति आसक्त है और मेरे लिए कोई अन्य स्त्री व्याकुल है। उस (स्त्री) को, उस (पुरुष) को, कामदेव को, इस (स्त्री) को और मुझको धिक्कार है।

प्रसंग- कहते हैं महाकवि भर्तृहरि अपनी युवावस्था में विषयों में अत्यधिक आसक्त रहते थे। एक बार उन्हें अपने जीवन में अत्यन्त कटु अनुभव हुआ। एक योगी ने उन्हें ऐसा फल लाकर दिया जिसे खाने से व्यक्ति सदैव युवा रहता था। उन्होंने वह फल अपनी प्रियतमा को दे दिया, उनकी प्रियतमा किसी अन्य पुरुष से प्रेम करती थी। अतः उसने वह अपने प्रियतम को दे दिया। उसका प्रियतम एक वेश्या से प्रेम करता था। अतः वह उसने उस वेश्या को दे दिया और वह वेश्या राजा के प्रति आदर भाव रखती थी। इसलिए उसने पुनः वह महाराज की सेवा में प्रस्तुत कर दिया। जब महाराज ने इस फल के विषय में गहन जानकारी प्राप्त की तो उन्हें वास्तविकता का पता चला तथा उन्होंने इस श्लोक का कथन करते हुए वैराग्य ले लिया और वैराग्यशतक की संरचना की।

व्याख्या- जिस अपनी प्रियतमा के विषय में मैं रात और दिन निरन्तर विचार करता रहता हूँ। वह मुझसे प्रेम नहीं करती, किन्तु वह अन्य किसी पुरुष के प्रति आसक्त मन

नीतिशतकम्

वाली है और वह पुरुष जिसे वह चाहती है किसी अन्य स्त्री को चाहता है एवं वह स्त्री मेरे प्रति अनुराग रखती है। इस प्रकार इस संसार में सभी लोग मानो एक उलझन में हैं जिन्हें यह कामदेव उलझाए रखता है। इसलिए उस कामदेव को उस स्त्री को, उस पुरुष को इस स्त्री को और मुझे एवं सभी को धिक्कार है, जो इन निस्सार बातों में अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ ही गंवाते रहते हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक की भाषा अत्यन्त सरल, भावबोधगम्य, प्रसादगुणयुक्त एवं प्रवाहपूर्ण प्रयुक्त हुई है। २. सांसारिक निस्सारता का बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुतीकरण किया गया है। ३. जैसा ऊपर बताया गया है, कहते हैं यह श्लोक महाकवि भर्तृहरि की स्वयं की जिन्दगी से सम्बन्धित है। ४. "धिगुपर्यादिषु त्रिषु" इत्यादि सूत्र से 'धिक्' के योग में तां, तं, मदनम् आदि पदों में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। ५. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौ गः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अपि + अन्यम् (इ→ य् = यण्, इकोयणचि)
२. जनः + अन्यसक्तः (:— उ— ओ, पूर्वरूप, अतो रोरप्लुतादप्लुते, एडः पदान्तादति)
३. विरक्ताः = वि + √रञ्ज् + क्त + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहु वचन)
४. सक्तः = √सञ्ज् + क्त


मूर्ख पद्धतिः

बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्॥३॥

अन्वय- बोद्धारः मत्सरग्रस्ताः (सन्ति), प्रभवः स्मयदूषिताः (वर्तन्ते), अन्ये च अबोधोपहताः (अनेन) सुभाषितम् अङ्गे जीर्णम् (भवति)।

अनुवाद- विद्वान् ईर्ष्या से युक्त (हैं), ऐश्वर्यसम्पन्न अहंकार से भरे हुए (हैं) और दूसरे (लोग) अज्ञान से युक्त हैं, (इसलिए) सुन्दर-सुन्दर बातें अंगों में ही नष्ट हो जाती हैं।

व्याख्या- इस संसार में तीन प्रकार के लोग हैं, विद्वान्, धनवान् और अज्ञानी। इनमें से प्रथम श्रेणी के विद्वान् लोग तो दूसरे विद्वान् से ईर्ष्या करने के कारण उनके द्वारा कही

४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

गई अच्छी-अच्छी बातों को सुनने में रुचि नहीं लेते हैं। दूसरी श्रेणी के ऐश्वर्यसम्पन्न लोगों को अपने धन का अत्यन्त अहंकार होने का कारण, वे उनकी बातों को नहीं सुनते। तीसरी श्रेणी के बचे हुए लोग अज्ञानी होने से उन बातों को चाहकर भी समझ नहीं पाते हैं। कवि कहता है कि इसलिए जो सुभाषित कोई विद्वान् कवि कहना चाहता है, अभिव्यक्ति का अवसर न मिलने के कारण उसकी मृत्यु के साथ ही नष्ट हो जाते हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक की भाषा अत्यन्त सरल, भाव बोधगम्य, प्रवाहपूर्ण एवं भावों की अभिव्यक्ति में समर्थ है।

२. इस संसार में सहृदयों के अभाव में बहुत सा काव्य हमारे सामने नहीं आ पाता है।

३. अच्छी-अच्छी, किन्तु उपदेशात्मक बातों को सुनने वालों का इस संसार में अभाव ही है।

४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है-- श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्रलघुषञ्चमम्। द्विःचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

५. यह श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं हैं।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √बुध् + तृच् (प्रथमा विभक्ति., बहुवचन) बोद्धारः। २. मत्सरेण ग्रस्ताः (तृतीया तत्पुरुष) = मत्सरग्रस्ताः। ३. √ग्रस् + क्त = ग्रस्तः (प्रथमा विभक्ति, पुल्लिंग., बहुवचन.) ग्रस्ताः। ४. सु + √भाष् + क्त = सुभाषितम्। √जॄ + क्त = जीर्णम्।

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः। ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि च तं नरं न रञ्जयति॥४॥

अन्वय- अज्ञः सुखम् आराध्यः, विशेषज्ञः सुखतरम् आराध्यते, (किन्तु) ज्ञानलवदुर्विदग्धम् च तम् नरम् ब्रह्मा अपि न रञ्जयति।

अनुवाद- अज्ञानी को सरलता से समझाया जा सकता है, विशेषज्ञ को और भी अधिक सरलता से समझा सकते हैं, (किन्तु) ज्ञान का लेशमात्र प्राप्त कर (स्वयं को) विद्वान् मानने वाले उस व्यक्ति को तो ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकता है।

व्याख्या- इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं, अज्ञ, विशेषज्ञ और पण्डितमानी। इन तीनों व्यक्तियों के लिए महाकवि कहते हैं कि जो लोग कुछ नहीं जानते, उन्हें आप किसी बात को सरलता से समझा सकते हैं, क्योंकि अज्ञानता के कारण वह जो भी आप बताएँगे अच्छे शिष्य के समान स्वीकार करता चलेगा। इसी

नीतिशतकम् ५

प्रकार दूसरी श्रेणी के, बात को भलीभाँति समझने वाले व्यक्ति को आप संकेतमात्र से ही किसी बात को सरलतम रूप में समझा सकते हैं, किन्तु किसी विषय में अल्पज्ञान प्राप्त कर स्वयं को विद्वान् समझने वाले पण्डितमन्य को तो यदि स्वयं ब्रह्मा भी आकर विषय समझाना चाहे तो भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि कदम-कदम पर उसका अहंकार विषय को समझने में बाधा उत्पन्न करता रहेगा। उसका समझाने वाले व्यक्ति के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न नहीं हो सकेगा।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में प्रतिपादन किया गया है कि अहंकार ज्ञानप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। २. इसमें संसार के सभी लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है— अज्ञ, विशेषज्ञ तथा पण्डितमानी। ३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ— 'यस्याः पादे प्रथमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या।'

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. ब्रह्मा + अपि (आ + अ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः) २. सुखम् + आराध्यः (अज्झीनं परे संयोज्यम्) ३. अज्ञः = न जानाति इति (नञ् समास) न + √ज्ञा + क ४. विशेषज्ञः, विशेषेण जानाति इति। विशेष + √ज्ञा + क (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. ज्ञानलवेन = ज्ञानस्य लवेन (षष्ठी तत्पुरुष) ६. दुर्विदग्धम् = दुर् + वि + √दह् + क्त ७. रञ्जयति = √रञ्ज् + तिप् (लट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन)

प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्र दंष्ट्राङ्कुरात्,
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदूर्मिमालाकुलम्।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद् धारयेत्,
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥५॥

अन्वय- (जनः) मकरवक्त्रदंष्ट्रांकुरात् प्रसह्य मणिम् उद्धरेत्, प्रचलद् ऊर्मिमालाकुलम् समुद्रम् अपि सन्तरेत्, कोपितम् भुजंगम् अपि शिरसि पुष्पवद् धारयेत्, तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तम् न आराधयेत्।

अनुवाद- (व्यक्ति) सम्भव है मगर के मुँह में दाढ़ की नोक से बलपूर्वक मणि को निकाल ले, सम्भव है (वह) अत्यन्त चञ्चल लहरों के समूह से व्याप्त समुद्र को भी पार कर ले, क्रुद्ध भयंकर सर्प को भी (सम्भव है वह) सिर पर पुष्प के समान धारण कर ले, किन्तु दुराग्रही मूर्ख व्यक्ति के (हठी) मन को प्रसन्न नहीं कर सकता।

६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति कोई भी कठिन से कठिन, असम्भव से असम्भव कार्य भी यदि चाहे तो करने में समर्थ है, किन्तु दुराग्रही हठी मूर्ख व्यक्ति के मन को प्रसन्न करना एकदम असम्भव है। इस प्रसंग में कवि तीन असम्भव कार्यों की पूर्ति की सम्भावना अभिव्यक्त करते हुए कहता है कि व्यक्ति यदि चाहे तो मगरमच्छ के भयावह मुख में स्थित दाढ़ों के बीच में रखी हुई मणि को भी सम्भव है प्रयत्न करने पर निकाल ले।

हो सकता है वह प्रयास करने पर ऊँची-ऊँची उठती हुई लहरों वाले समुद्र को भी तैर कर पार कर ले। इतना ही नहीं, सम्भव है व्यक्ति किसी क्रोध से पागल भयंकर सर्प को भी निडर होकर पुष्पमाला के समान अपने मस्तक पर धारण कर ले। हालांकि ये उपर्युक्त तीनों कार्य एकदम असम्भव हैं, किन्तु कवि की दृष्टि में व्यक्ति इन्हें भी प्रयास करने पर सिद्ध कर सकता है, किन्तु मूर्ख, व्यक्ति का हठी चित्त प्रसन्न करना पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि वह तो “करेला और नीम” चढ़ा कहावत के अनुसार किसी की भी बात सुनने को तैयार ही नहीं होगा। अतः उसे तो मनाया ही नहीं जा सकता है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने तीन अत्यन्त कठिन कार्यों— (१) मगर के मुख से मणि निकालना, (२) ऊँची-ऊँची लहरों से भरे हुए समुद्र को भी तैर कर पार करना, (३) भयंकर और क्रुद्ध सर्प को भी सहज ही माला के समान सिर पर धारण करना जैसे पूर्णतया असम्भव कार्यों को भी परिश्रम अथवा दुःसाहस आदि द्वारा सम्भव बताया; किन्तु एक तो मूर्ख, फिर ऊपर से हठी व्यक्ति का प्रसन्न होना पूर्णतया असम्भव है।

२. एक यूरोपीय विद्वान् लावेल ने भी कहा है— केवल मूर्ख और मृतक अपनी राय नहीं बदलते।

३. प्रस्तुत श्लोक में अत्यन्त व्यावहारिक तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।

४. पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है; लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथिवी गुरुः।

५. उपमा और रूपकातिशयोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. कोपितम् = √कुप् + णिच् + क्त (द्वितीया विभक्ति, एकवचन)
२. मालाकुलम् = माला + आकुलम् (आ + आ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः)
३. प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तम् = प्रतिनिविष्टः यः मूर्खजनः तस्य चित्तम्।
४. वक्त्र = √वच् + त्र, दंष्ट्रा = √दंश् + ष्ट्रन्, प्रसह्य = प्र + √सह + ल्यप्, संतरेत् = सम् + √तॄ + तिप् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन), भुजङ्गं = भुज् + √गम् + ख (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन), प्रतिनिविष्ट = प्रति + नि + √विश् + क्त, आराधयेत् = आ √राध् + तिप् (विधिलिंग प्रथम पुरुष, एकवचन)।

नीतिशतकम् ७

लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्,
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत्,
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥६॥

अन्वय- यत्नतः पीडयन् (मनुष्यः) सिकतासु अपि तैलम् लभेत् पिपासार्दितः (सः) मृगतृष्णिकासु सलिलम् पिबेत्, पर्यटन् कदाचित् (कोऽपि जनः) शशविषाणम् अपि आसादयेत्, प्रतिनिविष्ट मूर्खजनचित्तम् तु न आराधयेत्।

अनुवाद- (सम्भव है व्यक्ति) यत्नपूर्वक दबाता हुआ रेत से भी तेल प्राप्त कर ले, प्यास से व्याकुल हुआ (सम्भव है) मृग तृष्णिकाओं में (भी) जल पी लेवे। (हो सकता है) घूमता हुआ कभी खरगोश के सींग भी प्राप्त कर ले, किन्तु (वह) मूर्ख व्यक्ति के हठी चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकता है।

व्याख्या- पूर्व श्लोक के समान ही कवि ने यहाँ भी तीन पूर्णतया असम्भव कार्यों के सम्पन्न होने की सम्भावना व्यक्त की है, किन्तु मूर्ख व्यक्ति के हठी चित्त को प्रसन्न करने के विषय में किसी भी प्रकार व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, यह बात यहाँ कही गई है।

कवि सम्भावना व्यक्त करता है कि यों तो रेत में तेल लेशमात्र भी नहीं होता, किन्तु हो सकता है कि व्यक्ति को, अत्यन्त परिश्रम से दबाने पर रेत के कणों से तेल की एक दो बूँद प्राप्त हो जाए। ठीक इसी प्रकार वैसे तो मृगतृष्णिका में किसी स्थिति में व्यक्ति को पानी की प्राप्ति सम्भव नहीं है, किन्तु हो सकता है कभी संयोग से उसे जल की प्राप्ति मृगतृष्णिका में भी हो जाए। इसी प्रकार यद्यपि खरगोश के सींग नहीं होते, किन्तु सम्भव है यों ही कभी जंगलादि में घूमते हुए उसे खरगोश के सींग भी प्राप्त हो जाएँ। अर्थात् उपर्युक्त तीनों कार्य यद्यपि असम्भव ही हैं, किन्तु हो सकता है किसी परिस्थिति विशेष में संयोगवश ये सम्भव भी हो जाए। लेकिन ऐसा व्यक्ति जो मूर्ख भी हो और साथ-साथ हठी भी हो, उसके चित्त को तो प्रसन्न करना एकदम असम्भव ही है। उसकी प्रसन्न होने की तो लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है।

विशेष- १. पूर्व श्लोक के समान ही इसमें भी कवि ने मूर्ख व्यक्ति यदि हठी भी हो तो उसका प्रसन्न किया जाना एकदम असम्भव बताया है।

२. यहाँ रेत से तेल प्राप्त करना, मृगमरीचिका में जल पीना तथा खरगोश के सींग प्राप्त करना तीनों बातें पूर्णतया असम्भव है; किन्तु फिर भी कवि ने उनकी पूर्ति की सम्भावना व्यक्त की है, इसका अभिप्राय केवल तुलनात्मक रूप में मूर्ख एवं हठी चित्त की प्रसन्नता की कठिनता के अतिरेक का प्रतिपादन करना मात्र है।

३. यहाँ भी पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षणपूर्ववत्।

८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

४. मरुस्थल में प्रकाश की किरणों के कारण जल की प्रतीति होना, मृगतृष्णा या मृगमरीचिका कहलाता है। ५. शशविषाण पूर्णतया असम्भव वस्तु या कार्य के लिए लोक व्यवहार में प्रयुक्त होता है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. पिपासार्दितः =पिपासा + अर्दितः (आ + अ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः) पिपासया अर्दितः (तृतीया तत्पुरुष समास) पिपासा = √पा + सन् + अ + टाप्। अर्दितः = √अर्द + क्त। २. कदाचित् + अपि (व्यञ्जन संधि, झलां जशोऽन्ते) ३. पर्यटञ्छशविषाण....... = पर्यटन् + शशविषाण.......... (व्यञ्जन संधि-शशछोऽटि) ४. पीडयन् = √पीड् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. मृगतृष्णिकासु = मृगाणां तृष्णा यत्र सा मृगतृष्णा तासु ६. पर्यटन् = परि + √अट् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ७. शशविषाणम् = शशस्य विषाणम् (षष्ठी तत्पुरुष) ८. आसादयेत् = आ + √सद् + णिच् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन)

व्यालं बालमृणालतन्तुभिरसौ रोद्धुं समुज्जृम्भते,
छेत्तुं वज्रमणीञ्छिीरीषकुसुमप्रान्तेन संनह्यति।
माधुर्यं मधुविन्दुना रचयितुं क्षाराम्बुधेरीहते,
नेतुं वाञ्छति यः खलान् पथि सतां सूक्तैः सुधास्यंदिभिः॥७॥

अन्वय- असौ बालमृणालतन्तुभिः व्यालम् रोद्धुम् समुज्जृम्भते, शिरीषकुसुमप्रान्तेन वज्रमणीम् छेतुम् सत्रह्यते, मधुबिन्दुना क्षाराम्बुधेः माधुर्यम् रचयितुम् ईहते, यः सुधास्यन्दिभिः सूक्तैः खलान् सताम् पथि नेतुम् वाञ्छति।

अनुवाद- वह (व्यक्ति) कोमल कमलनाल के धागों से (मदमस्त) हाथी को रोकने के लिए उद्यत होता है, (कोमल) शिरीष के फूल (की पंखुडी) के किनारे से अत्यन्त कठोर मणि (हीरे) को काटने के लिए चेष्टा करता है, शहद की एक बूँद से खारे समुद्र को मीठा बनाना चाहता है, जो अमृतवर्षी सूक्तियों के द्वारा दुष्टों को सज्जनों के मार्ग पर ले जाना चाहता है।

व्याख्या- किसी दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति को अच्छी-अच्छी बातों का उपदेश देकर यदि कोई व्यक्ति सज्जन बनाना चाहता है तो वह मानो ठीक उसी प्रकार पूर्णतया असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है जैसे- कमल की नाल में स्थित धागों (रेशों)

नीतिशतकम्

से किसी मदमस्त हाथी को बाँधना। शिरीष पुष्प की कोमल पंखुड़ियों के किनारे से वज्र के समान कठोर मणि, हीरे आदि को काटना तथा शहद की एक बूँद के द्वारा विशाल खारे समुद्र को मीठा करना।

कहने का तात्पर्य यह है कि मदमस्त हाथी को बड़ी-बड़ी जंजीरों के द्वारा ही बाँधा जा सकता है। कमलनाल के धागों से बाँधने का प्रयास पूर्णतया मूर्खतापूर्ण एवं असम्भव है— ठीक इसी प्रकार हीरे आदि कठोर मणि को किसी भी कठोरतम पुष्प की पंखुड़ियों से काटना एकदम असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। ठीक वैसे ही एक शहद की बूँद से अथाह जलराशि वाले समुद्र के जल को मीठा करने का प्रयास भी मूर्खतापूर्ण एवं असम्भव है— वैसा ही मूर्खतापूर्ण कार्य अच्छी-अच्छी अमृतवर्षी बातों को सुना-सुनाकर मूर्खों को सज्जनों के मार्ग पर लाने का भी है। अर्थात् जिस प्रकार उपर्युक्त तीनों कार्य असम्भव हैं, ठीक उसी प्रकार दुष्टों को अच्छी-अच्छी बातों का उपदेश देकर सज्जन नहीं बनाया जा सकता।

विशेष- १. सदुपदेश से किसी भी स्थिति में दुष्ट स्वभाव को सज्जनता में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, इसका प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से यहाँ किया गया है। २. उत्तम शिक्षा के लिए सत्पात्र होना प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है। ३. प्रस्तुत श्लोक में निदर्शना अलंकार है, जिसका लक्षण इस प्रकार है—

अभवन् वस्तु सम्बन्धः उपमा परिकल्पकः। निदर्शना॥

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

सूर्याश्वै र्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. बालमृणालतन्तुभिः— बालाःमृणालाःबालमृणालाः,तैःतन्तुभिःबालमृणालतन्तुभिः २. रोद्धुम् = √रुध् + तुमुन्। समुज्जृम्भते = सम् + उत् + √जृम्भ् + तिप् (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) मधुबिन्दुना = मधुनः बिन्दुना (षष्ठी तत्पुरुष) ३. छेत्तुम् = √छिद् + तुमुन्। नेतुम् = √नी + तुमुन्। रचयितुम् = √रच् + तुमुन्। ईहते = √ईह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन, आत्मने पद) ४. सन्नह्यते = सम् √नह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन आ.) ५. स्यन्दिभिः = √स्यन्द् + णिनि + भिस् (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)। सूक्तैः = सु + √वच् + क्त + भिस् (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)। वाञ्छति = √वाञ्छ् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)। ६. क्षाराम्बुधेः = क्षार अम्बुधिः क्षाराम्बुधिः तस्य।

१० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

स्वायत्तमेकान्तगुणं १ विधात्रा
विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे
विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥८॥

अन्वय- विधात्रा अज्ञतायाः छादनम् स्वायत्तम् एकान्तगुणम् (मौनम्) विनिर्मितम्। विशेषतः सर्वविदाम् समाजे मौनम् अपण्डितानाम् भूषणम् (एव वर्तते)।

अनुवाद- विधाता ने मूर्खता को छिपाने के लिए (पूर्णतया) स्वाधीन (एवं) एकमात्र गुणाकारी (मौन का) निर्माण किया है। विशेष रूप से विद्वानों के समाज में मौन मूर्खों का आभूषण ही है।

व्याख्या- मूर्ख व्यक्ति को अपनी मूर्खता छिपाने के लिए विधाता ने मानो मौन रूपी एक उपहार भेंट किया है, जिसकी दो विशेषताएँ है— प्रथम उसके लिए मूर्ख व्यक्ति को दूसरे के अधीन नहीं रहना पड़ता अर्थात् चुप रहना पूर्णतया उसके अपने वश में है तथा इसमें केवल गुण ही गुण हैं, क्योंकि इससे हानि की कोई सम्भावना ही नहीं है।

विशेष रूप से उस सभा या समाज में जहाँ विद्वानों का ही बाहुल्य हो, यह मौन वास्तव में मूर्खों के लिए आभूषण के समान ही है, क्योंकि जैसे ही मूर्ख व्यक्ति बोलेगा वैसे ही उसकी अज्ञानता का लोगों को पता चल जाएगा। अतः विद्वत्समाज में चुप रहना मूर्खों के लिए एक अलंकरण का ही कार्य करता है।

विशेष- १. विद्वानों के समक्ष अल्पज्ञ अथवा मूर्ख व्यक्ति को सदैव चुप रहना चाहिए।
२. एकान्तगुणम् के स्थान पर एकान्तहितम् भी पाठभेद प्राप्त होता है, जिसका अर्थ होगा— एकमात्र हितकारी।
३. इस प्रसङ्ग में नीतिकार चाणक्य का कथन विशेषतया उल्लेखनीय है—

मूर्खोऽपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टितः।
तावच्च शोभते मूर्खो यावत् किञ्चिन्न भाषते॥

४. इसी प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति अंग्रेजी के विद्वान् की भी है—

A fool when he is silent is wise.
Silence is the wit of fools.

५. यहाँ उपजाति छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः
उपेन्द्र वज्रा जतजास्ततो गौ।


१. एकान्तहितम्।

नीतिशतकम् ११

इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा को मिलाकर उपजाति छन्द बनाता है।

६. मौन रूप आभूषण की दो विशेषताओं का यहाँ उल्लेख किया है। प्रथम इसके लिए व्यक्ति पूर्णतया स्वाधीन होता है। द्वितीय इसमें लाभ ही लाभ है, हानि की कोई सम्भावना ही नहीं है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

  • विधात्रा = वि + √धा + तृच् (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
  • छादनम् = √छद् + णिच् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
  • विनिर्मितम् = वि + निर् + √मा + क्त (नपु. , प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
  • विभूषणम् = वि + √भूष् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
  • अपण्डितानाम् = न पण्डितः इति अपण्डितः, तेषाम् (नञ् समास)

यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं,
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।
यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतं,
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः॥९॥

अन्वय- यदा अहम् किञ्चित् ज्ञः (आसम्) द्विपः इव मदान्धः समभवम्, तदा मम मनः सर्वज्ञः अस्मि इति अवलिप्तम् अभवत्। यदा बुधजनसकाशात् किञ्चित् किञ्चित् अवगतम्, तदा मूर्खः अस्मि इति मे मदः ज्वरः इव व्यपगतः।

अनुवाद- जब मैं थोडा सा जानता (था तो मैं) हाथी के समान मद से अंधा हो गया था, तब मेरा मन (मैं) सर्वज्ञ हूँ, इस प्रकार (सोचकर) अहंकारयुक्त हो गया था। जब विद्वानों के सन्निध्य से (मैंने) कुछ-कुछ समझा, तब '(मैं) मूर्ख हूँ', इस प्रकार मेरा मद ज्वर के समान दूर हो गया।

व्याख्या- कवि कहता है कि जिस समय मैंने अत्यल्प जाना था तो मैं अपने को सर्वज्ञ मानता था और जिस प्रकार हाथी मद में अंधा रहता है तथा उचित अनुचित का ध्यान नहीं रखता। अपने सामने अन्य किसी को सामर्थ्यशाली नहीं मानता, ठीक उसी प्रकार मुझे भी अहंकार हो गया था कि मैं ही सबसे अधिक विद्वान् हूँ। मैं ही सब कुछ जानता हूँ, अन्य सब लोग मेरी अपेक्षा अल्पज्ञ हैं।

किन्तु जब मैं ईशकृपा से विद्वानों के सम्पर्क में आया तथा मैंने उनके अथाह ज्ञान का दर्शन किया तो मैंने स्वयं को उनके सामने एकदम मूर्ख माना और मेरा अहंकार, जो स्वयं को सर्वज्ञ मानते हुए मुझे हो गया था, ठीक उसी प्रकार क्षणभर में दूर हो गया, जिस प्रकार औषधि लेने से बुखार दूर हो जाता है।

कहने का तात्पर्य है कि प्रथम तो व्यक्ति को अपने ज्ञान को कभी भी सम्पूर्ण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती तथा ज्ञानी मानकर कभी भी स्वयं

१२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

की योग्यता पर अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार व्यक्ति के नाश का द्योतक होता है। सत्पुरुषों, विद्वानों की सदैव खोज करनी चाहिए और उससे कुछ न कुछ सीखने का विनम्र प्रयास करना चाहिए।

विशेष- १. आधा भरा घड़ा शब्द करता है, इस कहावत के अनुसार अल्पज्ञता व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। २. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने अल्पज्ञ की स्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है। ३. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमा इत्यभिधीयते। यहाँ अहंकार की मद से उपमा दी गई है। ४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ५. काव्यलिंग अलंकार-लक्षण-हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगमुदाहृतम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- किञ्चिज्ज्ञः = किञ्चिद् जानाति इति, किञ्चित् √ज्ञा + क + पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। द्विपः = द्वाभ्यां पिबति इति, द्वि + √पा + क। सर्वज्ञः = सर्वं जानाति इति। सर्व + √ज्ञा + क। मदान्धः = मदेन अन्धः (तृतीया तत्पुरुष), अवलिप्तम् = अव + √लिप् + क्त। अवगतम् = अव + √गम् + क्त। व्यपगतः = वि + अप + √गम् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)। सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तम् = सर्वज्ञः + अस्मि + इति + अभवत् + अवलिप्तम् (विसर्ग, दीर्घ, यण्, व्यञ्जन)।

कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धि¹ जुगुप्सितं, निरुपमरसं प्रीत्या खादन्खरास्थि² निरामिषम्। सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्थं विलोक्य न शङ्कते, न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु परिग्रहफल्गुताम्॥१०॥

अन्वय- श्वा कृमिकुलचितम्, लालाक्लिन्नम्, विगन्धि, जुगुप्सितम्, निरुपमरसम्, निरामिषम्, खरास्थि प्रीत्या खादन् पार्श्वस्थम् सुरपतिम् अपि विलोक्य न शङ्कते, (वस्तुतः) क्षुद्रः जन्तुः परिग्रहफल्गुताम् न हि गणयति।

अनुवाद- कुत्ता कीड़ों के समूह से भरे हुए, लार से भीगे हुए, दुर्गन्धित, घृणा को योग्य, अनुपम (बुरे) रस वाली, माँसरहित गदहे की हड्डी को प्रेमपूर्वक खाता हुआ,


१. विगर्हि २. नरास्थि

नीतिशतकम् १३

पास में खड़े हुए इन्द्र को भी देखकर शंकित नहीं होता है (वास्तव में) तुच्छ प्राणी ग्रहण की गई (वस्तु की) तुच्छता को नहीं गिनता है।

व्याख्या- कुत्ता यदि उसे किसी हड्डी का टुकड़ा मिल जाए चाहे, उसमें कीड़े क्यों न भरे हुए हों, उसके मुख से निकलने वाली लार से भीगने के कारण कितना भी घृणित क्यों न हो, अत्यन्त दुर्गन्ध आ रही हो तथा उसमें स्वाद भी ऐसा क्यों न हो जिसकी कोई उपमा ही न दी जा सके, उसमें लेशमात्र भी माँस नहीं हो, फिर भी वह अत्यन्त प्रेमपूर्वक उसे चबाते हुए एक असीम आनन्द का अनुभव करता है। उस समय उसे आसपास की भी खबर नहीं रहती, भले ही स्वयं इन्द्र भी उसके पास क्यों न खड़ा हो, उसे कुछ भी देने का इच्छुक क्यों न हो, वह उसकी भी परवाह नहीं करता, न ही उससे तनिक भी भयभीत ही होता है।

वास्तव में नीच स्वभाव वाले प्राणी अपने स्वभाव के कारण खराब से खराब वस्तु की निःसारता को नहीं समझ पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि निकृष्ट स्वभाव वाला प्राणी तुच्छ से तुच्छ वस्तु को अपनाने के बाद बिना किसी की परवाह के उसी में आनन्द का अनुभव करता है।

ठीक इसी प्रकार इस संसार में नीच स्वभाव वाले लोग भी बुरे से बुरे काम में लिप्त हो. जाते हैं तथा किसी की भी परवाह किए बिना, लेशमात्र भी लज्जित नहीं होते। उनके लिए उसी में असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, उन्हें न तो लोकनिन्दा की परवाह होती हैं और न ही उन्हें ईश्वर से ही डर लगता है।

विशेष- १. नीच स्वभाव वाले व्यक्ति की तुलना कुत्ते से दी गई है।

२. हड्डी चबाते हुए कुत्ते का स्वाभाविक वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलंकार का प्रयोग।

३. अप्रस्तुत कुत्ते के वर्णन द्वारा प्रस्तुत नीच व्यक्ति का वर्णन होने से अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है, लक्षण इस प्रकार है–

अप्रस्तुतस्य कथनात् प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुत प्रशंसेयं सारूप्यादि नियन्त्रिता।।

४. प्रस्तुत श्लोक में विगन्धि के स्थान पर विगर्हि तथा खरास्थि के स्थान पर नरास्थि पाठभेद भी प्राप्त होता है, तब निन्दित एवं मनुष्य की हड्डी अनुवाद करना होगा।

५. नरास्थि के स्थान पर अर्थौचित्य की दृष्टि से खरास्थि पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि मनुष्य की हड्डी की इस प्रकार उपलब्धि सहज नहीं होती।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

कृमिकुलचितं = कृमीणां कुलं— कृमिकुलं तैः चितम्, √चि + क्त। लालाक्लिन्नम् = लालाभिः क्लिन्नम् √क्लिद् + क्त। विगन्धि = वि √गन्ध् + इनि (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)। विगर्हि = वि + √गर्ह् + इनि (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)।

१४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

निरुपमरसम् = निर्गता उपमा यस्य सः निरुपमः, निरुपमः रसः यस्मिन्। प्रीत्या = √प्रीञ् + क्तिन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन)।

खादन् = √खाद् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)। पार्श्वस्थम् = पार्श्वे तिष्ठति इति पार्श्वस्थः तम्। सुरपतिम् = सुराणां पतिः सुरपतिः तम्। विलोक्य = वि + √लोक् + ल्यप्। परिग्रहस्य फल्गुताम् = परिग्रहफल्गुताम्।

शिरः शार्वं स्वर्गात् पशुपतिशिरस्तः १ क्षितिधरं,
महीध्रादुत्तुंगादवनिमवनेश्चापि जलधिम्।
अधोधो गङ्गेयं पदमुपगता स्तोकमथवा,
विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः॥१९॥

अन्वय- इयम् गंगा स्वर्गात् शार्वम् शिरः, पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरम्, उत्तुंगात् महीध्रात् अवनिम्, अवनेः च अपि जलधिम् (एवम् क्रमशः) अधः अधः स्तोकम् पदम् उपगता अथवा विवेकभ्रष्टानाम् विनिपातः शतमुखः भवति।

अनुवाद- इस गंगा ने, स्वर्ग से शिव के सिर को, शिव के सिर से पर्वत (हिमालय) को, ऊँचे पर्वत से पृथिवी को और पृथ्वी से भी समुद्र को (इस प्रकार क्रमशः) नीचे-नीचे स्थान को प्राप्त किया अथवा विवेक से भ्रष्ट हुए लोगों का पतन सैकड़ों प्रकार से होता है।

व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति जब विवेक भ्रष्ट होता है तो उसके पतन की कोई सीमा नहीं होती, इसी विचार को प्रतिपादित करते हुए कवि यहाँ गंगा का उदाहरण देते हुए कहता है कि यह गंगा प्रारम्भ में स्वर्ग जैसे ऊँचे एवं श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान थी, किन्तु जब इसका पतन होना प्रारम्भ हुआ तो यह स्वर्ग से कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव के सिर पर गिरी, वहाँ भी यह स्थिर नहीं रह सकी तथा वहाँ से इसका पतन हिमालय पर्वत पर हुआ। हिमालय पर्वत जैसे उत्तुंग स्थल पर भी यह नहीं टिक सकी, अपितु इसका वहाँ से पृथ्वी पर पतन हुआ और पृथ्वी से अन्त में सर्वाधिक नीचे स्थान समुद्र को प्राप्त करके ही इसने विराम लिया। जहाँ इसका अपना अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

इस प्रकार जब व्यक्ति विवेकरहित होता है तो उसका इतना आधिक पतन होता है कि अन्त में वह गंगा के समान ही अस्तित्वहीन हो जाता है। अतः व्यक्ति को अपना विवेक कभी भी नहीं त्यागना चाहिए। किसी भी कार्य को करने से पूर्व कर्तव्य अकर्तव्य का विचार अवश्य करना चाहिए।

विशेष- १. व्यक्ति को कोई भी कार्य भलीभाँति विचार कर, विवेकपूर्वक ही करना चाहिए।


१. पतति शिरस्तत्