भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 194 में से

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२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

४. स्वभावोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कालादि + अनवच्छिन्न = कालाद्यनवच्छिन्न (यण्-इकोयणचि)
२. अनवच्छिन्न + अनन्त = अनवच्छिन्नानन्त (दीर्घ - अकःसवर्णे दीर्घः)
३. स्व + अनुभूति + एकमानाय (दीर्घ, यण् संधि)
४. न अनन्त इति अनन्त (नञ् समास)
५. शान्ताय = शान्त + ङे (चतुर्थी विभक्ति, एकवचन)
६. दिशश्च कालादयश्च तैरनवच्छिन्ना अनन्ता चिन्मात्रा मूर्तिः यस्य तस्मै।
७. स्वस्य अनुभूतिः स्वानुभूतिः, स्वानुभूतिरेकं मानं यस्य तस्मै।

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥२॥

अन्वय- (अहम्) याम् सततम् चिन्तयामि, सा मयि विरक्ता (वर्तते)। सा अपि अन्यम् जनम् इच्छति, सः जनः अन्यसक्तः (च) अस्मत् कृते च काचित् अन्या परितुष्यति। ताम् च तम् च मदनम् च इमाम् च माम् च धिक्।

अनुवाद- (मैं) जिस (स्त्री) का निरन्तर चिन्तन करता हूँ, वह मुझसे विरक्त (है)। वह भी दूसरे पुरुष को चाहती है (और) वह पुरुष (भी) अन्य (स्त्री) के प्रति आसक्त है और मेरे लिए कोई अन्य स्त्री व्याकुल है। उस (स्त्री) को, उस (पुरुष) को, कामदेव को, इस (स्त्री) को और मुझको धिक्कार है।

प्रसंग- कहते हैं महाकवि भर्तृहरि अपनी युवावस्था में विषयों में अत्यधिक आसक्त रहते थे। एक बार उन्हें अपने जीवन में अत्यन्त कटु अनुभव हुआ। एक योगी ने उन्हें ऐसा फल लाकर दिया जिसे खाने से व्यक्ति सदैव युवा रहता था। उन्होंने वह फल अपनी प्रियतमा को दे दिया, उनकी प्रियतमा किसी अन्य पुरुष से प्रेम करती थी। अतः उसने वह अपने प्रियतम को दे दिया। उसका प्रियतम एक वेश्या से प्रेम करता था। अतः वह उसने उस वेश्या को दे दिया और वह वेश्या राजा के प्रति आदर भाव रखती थी। इसलिए उसने पुनः वह महाराज की सेवा में प्रस्तुत कर दिया। जब महाराज ने इस फल के विषय में गहन जानकारी प्राप्त की तो उन्हें वास्तविकता का पता चला तथा उन्होंने इस श्लोक का कथन करते हुए वैराग्य ले लिया और वैराग्यशतक की संरचना की।

व्याख्या- जिस अपनी प्रियतमा के विषय में मैं रात और दिन निरन्तर विचार करता रहता हूँ। वह मुझसे प्रेम नहीं करती, किन्तु वह अन्य किसी पुरुष के प्रति आसक्त मन