नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ३
वाली है और वह पुरुष जिसे वह चाहती है किसी अन्य स्त्री को चाहता है एवं वह स्त्री मेरे प्रति अनुराग रखती है। इस प्रकार इस संसार में सभी लोग मानो एक उलझन में हैं जिन्हें यह कामदेव उलझाए रखता है। इसलिए उस कामदेव को उस स्त्री को, उस पुरुष को इस स्त्री को और मुझे एवं सभी को धिक्कार है, जो इन निस्सार बातों में अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ ही गंवाते रहते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक की भाषा अत्यन्त सरल, भावबोधगम्य, प्रसादगुणयुक्त एवं प्रवाहपूर्ण प्रयुक्त हुई है।
२. सांसारिक निस्सारता का बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुतीकरण किया गया है।
३. जैसा ऊपर बताया गया है, कहते हैं यह श्लोक महाकवि भर्तृहरि की स्वयं की जिन्दगी से सम्बन्धित है।
४. "धिगुपर्यादिषु त्रिषु" इत्यादि सूत्र से 'धिक्' के योग में तां, तं, मदनम् आदि पदों में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
५. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौ गः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अपि + अन्यम् (इ→ य् = यण्, इकोयणचि)
२. जनः + अन्यसक्तः (:— उ— ओ, पूर्वरूप, अतो रोरप्लुतादप्लुते, एडः पदान्तादति)
३. विरक्ताः = वि + √रञ्ज् + क्त + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहु वचन)
४. सक्तः = √सञ्ज् + क्त
मूर्ख पद्धतिः
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्॥३॥
अन्वय- बोद्धारः मत्सरग्रस्ताः (सन्ति), प्रभवः स्मयदूषिताः (वर्तन्ते), अन्ये च अबोधोपहताः (अनेन) सुभाषितम् अङ्गे जीर्णम् (भवति)।
अनुवाद- विद्वान् ईर्ष्या से युक्त (हैं), ऐश्वर्यसम्पन्न अहंकार से भरे हुए (हैं) और दूसरे (लोग) अज्ञान से युक्त हैं, (इसलिए) सुन्दर-सुन्दर बातें अंगों में ही नष्ट हो जाती हैं।
व्याख्या- इस संसार में तीन प्रकार के लोग हैं, विद्वान्, धनवान् और अज्ञानी। इनमें से प्रथम श्रेणी के विद्वान् लोग तो दूसरे विद्वान् से ईर्ष्या करने के कारण उनके द्वारा कही