नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
नीतिशतकम् ३
वाली है और वह पुरुष जिसे वह चाहती है किसी अन्य स्त्री को चाहता है एवं वह स्त्री मेरे प्रति अनुराग रखती है। इस प्रकार इस संसार में सभी लोग मानो एक उलझन में हैं जिन्हें यह कामदेव उलझाए रखता है। इसलिए उस कामदेव को उस स्त्री को, उस पुरुष को इस स्त्री को और मुझे एवं सभी को धिक्कार है, जो इन निस्सार बातों में अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ ही गंवाते रहते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक की भाषा अत्यन्त सरल, भावबोधगम्य, प्रसादगुणयुक्त एवं प्रवाहपूर्ण प्रयुक्त हुई है।
२. सांसारिक निस्सारता का बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुतीकरण किया गया है।
३. जैसा ऊपर बताया गया है, कहते हैं यह श्लोक महाकवि भर्तृहरि की स्वयं की जिन्दगी से सम्बन्धित है।
४. "धिगुपर्यादिषु त्रिषु" इत्यादि सूत्र से 'धिक्' के योग में तां, तं, मदनम् आदि पदों में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
५. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौ गः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अपि + अन्यम् (इ→ य् = यण्, इकोयणचि)
२. जनः + अन्यसक्तः (:— उ— ओ, पूर्वरूप, अतो रोरप्लुतादप्लुते, एडः पदान्तादति)
३. विरक्ताः = वि + √रञ्ज् + क्त + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहु वचन)
४. सक्तः = √सञ्ज् + क्त
मूर्ख पद्धतिः
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्॥३॥
अन्वय- बोद्धारः मत्सरग्रस्ताः (सन्ति), प्रभवः स्मयदूषिताः (वर्तन्ते), अन्ये च अबोधोपहताः (अनेन) सुभाषितम् अङ्गे जीर्णम् (भवति)।
अनुवाद- विद्वान् ईर्ष्या से युक्त (हैं), ऐश्वर्यसम्पन्न अहंकार से भरे हुए (हैं) और दूसरे (लोग) अज्ञान से युक्त हैं, (इसलिए) सुन्दर-सुन्दर बातें अंगों में ही नष्ट हो जाती हैं।
व्याख्या- इस संसार में तीन प्रकार के लोग हैं, विद्वान्, धनवान् और अज्ञानी। इनमें से प्रथम श्रेणी के विद्वान् लोग तो दूसरे विद्वान् से ईर्ष्या करने के कारण उनके द्वारा कही
४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
गई अच्छी-अच्छी बातों को सुनने में रुचि नहीं लेते हैं। दूसरी श्रेणी के ऐश्वर्यसम्पन्न लोगों को अपने धन का अत्यन्त अहंकार होने का कारण, वे उनकी बातों को नहीं सुनते। तीसरी श्रेणी के बचे हुए लोग अज्ञानी होने से उन बातों को चाहकर भी समझ नहीं पाते हैं। कवि कहता है कि इसलिए जो सुभाषित कोई विद्वान् कवि कहना चाहता है, अभिव्यक्ति का अवसर न मिलने के कारण उसकी मृत्यु के साथ ही नष्ट हो जाते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक की भाषा अत्यन्त सरल, भाव बोधगम्य, प्रवाहपूर्ण एवं भावों की अभिव्यक्ति में समर्थ है।
२. इस संसार में सहृदयों के अभाव में बहुत सा काव्य हमारे सामने नहीं आ पाता है।
३. अच्छी-अच्छी, किन्तु उपदेशात्मक बातों को सुनने वालों का इस संसार में अभाव ही है।
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है-- श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्रलघुषञ्चमम्। द्विःचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
५. यह श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं हैं।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √बुध् + तृच् (प्रथमा विभक्ति., बहुवचन) बोद्धारः। २. मत्सरेण ग्रस्ताः (तृतीया तत्पुरुष) = मत्सरग्रस्ताः। ३. √ग्रस् + क्त = ग्रस्तः (प्रथमा विभक्ति, पुल्लिंग., बहुवचन.) ग्रस्ताः। ४. सु + √भाष् + क्त = सुभाषितम्। √जॄ + क्त = जीर्णम्।
अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः। ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि च तं नरं न रञ्जयति॥४॥
अन्वय- अज्ञः सुखम् आराध्यः, विशेषज्ञः सुखतरम् आराध्यते, (किन्तु) ज्ञानलवदुर्विदग्धम् च तम् नरम् ब्रह्मा अपि न रञ्जयति।
अनुवाद- अज्ञानी को सरलता से समझाया जा सकता है, विशेषज्ञ को और भी अधिक सरलता से समझा सकते हैं, (किन्तु) ज्ञान का लेशमात्र प्राप्त कर (स्वयं को) विद्वान् मानने वाले उस व्यक्ति को तो ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकता है।
व्याख्या- इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं, अज्ञ, विशेषज्ञ और पण्डितमानी। इन तीनों व्यक्तियों के लिए महाकवि कहते हैं कि जो लोग कुछ नहीं जानते, उन्हें आप किसी बात को सरलता से समझा सकते हैं, क्योंकि अज्ञानता के कारण वह जो भी आप बताएँगे अच्छे शिष्य के समान स्वीकार करता चलेगा। इसी
नीतिशतकम् ५
प्रकार दूसरी श्रेणी के, बात को भलीभाँति समझने वाले व्यक्ति को आप संकेतमात्र से ही किसी बात को सरलतम रूप में समझा सकते हैं, किन्तु किसी विषय में अल्पज्ञान प्राप्त कर स्वयं को विद्वान् समझने वाले पण्डितमन्य को तो यदि स्वयं ब्रह्मा भी आकर विषय समझाना चाहे तो भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि कदम-कदम पर उसका अहंकार विषय को समझने में बाधा उत्पन्न करता रहेगा। उसका समझाने वाले व्यक्ति के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न नहीं हो सकेगा।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में प्रतिपादन किया गया है कि अहंकार ज्ञानप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। २. इसमें संसार के सभी लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है— अज्ञ, विशेषज्ञ तथा पण्डितमानी। ३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ— 'यस्याः पादे प्रथमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या।'
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. ब्रह्मा + अपि (आ + अ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः) २. सुखम् + आराध्यः (अज्झीनं परे संयोज्यम्) ३. अज्ञः = न जानाति इति (नञ् समास) न + √ज्ञा + क ४. विशेषज्ञः, विशेषेण जानाति इति। विशेष + √ज्ञा + क (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. ज्ञानलवेन = ज्ञानस्य लवेन (षष्ठी तत्पुरुष) ६. दुर्विदग्धम् = दुर् + वि + √दह् + क्त ७. रञ्जयति = √रञ्ज् + तिप् (लट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन)
प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्र दंष्ट्राङ्कुरात्,
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदूर्मिमालाकुलम्।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद् धारयेत्,
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥५॥
अन्वय- (जनः) मकरवक्त्रदंष्ट्रांकुरात् प्रसह्य मणिम् उद्धरेत्, प्रचलद् ऊर्मिमालाकुलम् समुद्रम् अपि सन्तरेत्, कोपितम् भुजंगम् अपि शिरसि पुष्पवद् धारयेत्, तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तम् न आराधयेत्।
अनुवाद- (व्यक्ति) सम्भव है मगर के मुँह में दाढ़ की नोक से बलपूर्वक मणि को निकाल ले, सम्भव है (वह) अत्यन्त चञ्चल लहरों के समूह से व्याप्त समुद्र को भी पार कर ले, क्रुद्ध भयंकर सर्प को भी (सम्भव है वह) सिर पर पुष्प के समान धारण कर ले, किन्तु दुराग्रही मूर्ख व्यक्ति के (हठी) मन को प्रसन्न नहीं कर सकता।
६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति कोई भी कठिन से कठिन, असम्भव से असम्भव कार्य भी यदि चाहे तो करने में समर्थ है, किन्तु दुराग्रही हठी मूर्ख व्यक्ति के मन को प्रसन्न करना एकदम असम्भव है। इस प्रसंग में कवि तीन असम्भव कार्यों की पूर्ति की सम्भावना अभिव्यक्त करते हुए कहता है कि व्यक्ति यदि चाहे तो मगरमच्छ के भयावह मुख में स्थित दाढ़ों के बीच में रखी हुई मणि को भी सम्भव है प्रयत्न करने पर निकाल ले।
हो सकता है वह प्रयास करने पर ऊँची-ऊँची उठती हुई लहरों वाले समुद्र को भी तैर कर पार कर ले। इतना ही नहीं, सम्भव है व्यक्ति किसी क्रोध से पागल भयंकर सर्प को भी निडर होकर पुष्पमाला के समान अपने मस्तक पर धारण कर ले। हालांकि ये उपर्युक्त तीनों कार्य एकदम असम्भव हैं, किन्तु कवि की दृष्टि में व्यक्ति इन्हें भी प्रयास करने पर सिद्ध कर सकता है, किन्तु मूर्ख, व्यक्ति का हठी चित्त प्रसन्न करना पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि वह तो “करेला और नीम” चढ़ा कहावत के अनुसार किसी की भी बात सुनने को तैयार ही नहीं होगा। अतः उसे तो मनाया ही नहीं जा सकता है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने तीन अत्यन्त कठिन कार्यों— (१) मगर के मुख से मणि निकालना, (२) ऊँची-ऊँची लहरों से भरे हुए समुद्र को भी तैर कर पार करना, (३) भयंकर और क्रुद्ध सर्प को भी सहज ही माला के समान सिर पर धारण करना जैसे पूर्णतया असम्भव कार्यों को भी परिश्रम अथवा दुःसाहस आदि द्वारा सम्भव बताया; किन्तु एक तो मूर्ख, फिर ऊपर से हठी व्यक्ति का प्रसन्न होना पूर्णतया असम्भव है।
२. एक यूरोपीय विद्वान् लावेल ने भी कहा है— केवल मूर्ख और मृतक अपनी राय नहीं बदलते।
३. प्रस्तुत श्लोक में अत्यन्त व्यावहारिक तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।
४. पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है; लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथिवी गुरुः।
५. उपमा और रूपकातिशयोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कोपितम् = √कुप् + णिच् + क्त (द्वितीया विभक्ति, एकवचन)
२. मालाकुलम् = माला + आकुलम् (आ + आ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः)
३. प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तम् = प्रतिनिविष्टः यः मूर्खजनः तस्य चित्तम्।
४. वक्त्र = √वच् + त्र, दंष्ट्रा = √दंश् + ष्ट्रन्, प्रसह्य = प्र + √सह + ल्यप्, संतरेत् = सम् + √तॄ + तिप् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन), भुजङ्गं = भुज् + √गम् + ख (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन), प्रतिनिविष्ट = प्रति + नि + √विश् + क्त, आराधयेत् = आ √राध् + तिप् (विधिलिंग प्रथम पुरुष, एकवचन)।
नीतिशतकम् ७
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्,
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत्,
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥६॥
अन्वय- यत्नतः पीडयन् (मनुष्यः) सिकतासु अपि तैलम् लभेत् पिपासार्दितः (सः) मृगतृष्णिकासु सलिलम् पिबेत्, पर्यटन् कदाचित् (कोऽपि जनः) शशविषाणम् अपि आसादयेत्, प्रतिनिविष्ट मूर्खजनचित्तम् तु न आराधयेत्।
अनुवाद- (सम्भव है व्यक्ति) यत्नपूर्वक दबाता हुआ रेत से भी तेल प्राप्त कर ले, प्यास से व्याकुल हुआ (सम्भव है) मृग तृष्णिकाओं में (भी) जल पी लेवे। (हो सकता है) घूमता हुआ कभी खरगोश के सींग भी प्राप्त कर ले, किन्तु (वह) मूर्ख व्यक्ति के हठी चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकता है।
व्याख्या- पूर्व श्लोक के समान ही कवि ने यहाँ भी तीन पूर्णतया असम्भव कार्यों के सम्पन्न होने की सम्भावना व्यक्त की है, किन्तु मूर्ख व्यक्ति के हठी चित्त को प्रसन्न करने के विषय में किसी भी प्रकार व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, यह बात यहाँ कही गई है।
कवि सम्भावना व्यक्त करता है कि यों तो रेत में तेल लेशमात्र भी नहीं होता, किन्तु हो सकता है कि व्यक्ति को, अत्यन्त परिश्रम से दबाने पर रेत के कणों से तेल की एक दो बूँद प्राप्त हो जाए। ठीक इसी प्रकार वैसे तो मृगतृष्णिका में किसी स्थिति में व्यक्ति को पानी की प्राप्ति सम्भव नहीं है, किन्तु हो सकता है कभी संयोग से उसे जल की प्राप्ति मृगतृष्णिका में भी हो जाए। इसी प्रकार यद्यपि खरगोश के सींग नहीं होते, किन्तु सम्भव है यों ही कभी जंगलादि में घूमते हुए उसे खरगोश के सींग भी प्राप्त हो जाएँ। अर्थात् उपर्युक्त तीनों कार्य यद्यपि असम्भव ही हैं, किन्तु हो सकता है किसी परिस्थिति विशेष में संयोगवश ये सम्भव भी हो जाए। लेकिन ऐसा व्यक्ति जो मूर्ख भी हो और साथ-साथ हठी भी हो, उसके चित्त को तो प्रसन्न करना एकदम असम्भव ही है। उसकी प्रसन्न होने की तो लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है।
विशेष- १. पूर्व श्लोक के समान ही इसमें भी कवि ने मूर्ख व्यक्ति यदि हठी भी हो तो उसका प्रसन्न किया जाना एकदम असम्भव बताया है।
२. यहाँ रेत से तेल प्राप्त करना, मृगमरीचिका में जल पीना तथा खरगोश के सींग प्राप्त करना तीनों बातें पूर्णतया असम्भव है; किन्तु फिर भी कवि ने उनकी पूर्ति की सम्भावना व्यक्त की है, इसका अभिप्राय केवल तुलनात्मक रूप में मूर्ख एवं हठी चित्त की प्रसन्नता की कठिनता के अतिरेक का प्रतिपादन करना मात्र है।
३. यहाँ भी पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षणपूर्ववत्।
८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
४. मरुस्थल में प्रकाश की किरणों के कारण जल की प्रतीति होना, मृगतृष्णा या मृगमरीचिका कहलाता है। ५. शशविषाण पूर्णतया असम्भव वस्तु या कार्य के लिए लोक व्यवहार में प्रयुक्त होता है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पिपासार्दितः =पिपासा + अर्दितः (आ + अ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः) पिपासया अर्दितः (तृतीया तत्पुरुष समास) पिपासा = √पा + सन् + अ + टाप्। अर्दितः = √अर्द + क्त। २. कदाचित् + अपि (व्यञ्जन संधि, झलां जशोऽन्ते) ३. पर्यटञ्छशविषाण....... = पर्यटन् + शशविषाण.......... (व्यञ्जन संधि-शशछोऽटि) ४. पीडयन् = √पीड् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. मृगतृष्णिकासु = मृगाणां तृष्णा यत्र सा मृगतृष्णा तासु ६. पर्यटन् = परि + √अट् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ७. शशविषाणम् = शशस्य विषाणम् (षष्ठी तत्पुरुष) ८. आसादयेत् = आ + √सद् + णिच् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन)
व्यालं बालमृणालतन्तुभिरसौ रोद्धुं समुज्जृम्भते,
छेत्तुं वज्रमणीञ्छिीरीषकुसुमप्रान्तेन संनह्यति।
माधुर्यं मधुविन्दुना रचयितुं क्षाराम्बुधेरीहते,
नेतुं वाञ्छति यः खलान् पथि सतां सूक्तैः सुधास्यंदिभिः॥७॥
अन्वय- असौ बालमृणालतन्तुभिः व्यालम् रोद्धुम् समुज्जृम्भते, शिरीषकुसुमप्रान्तेन वज्रमणीम् छेतुम् सत्रह्यते, मधुबिन्दुना क्षाराम्बुधेः माधुर्यम् रचयितुम् ईहते, यः सुधास्यन्दिभिः सूक्तैः खलान् सताम् पथि नेतुम् वाञ्छति।
अनुवाद- वह (व्यक्ति) कोमल कमलनाल के धागों से (मदमस्त) हाथी को रोकने के लिए उद्यत होता है, (कोमल) शिरीष के फूल (की पंखुडी) के किनारे से अत्यन्त कठोर मणि (हीरे) को काटने के लिए चेष्टा करता है, शहद की एक बूँद से खारे समुद्र को मीठा बनाना चाहता है, जो अमृतवर्षी सूक्तियों के द्वारा दुष्टों को सज्जनों के मार्ग पर ले जाना चाहता है।
व्याख्या- किसी दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति को अच्छी-अच्छी बातों का उपदेश देकर यदि कोई व्यक्ति सज्जन बनाना चाहता है तो वह मानो ठीक उसी प्रकार पूर्णतया असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है जैसे- कमल की नाल में स्थित धागों (रेशों)
नीतिशतकम् ९
से किसी मदमस्त हाथी को बाँधना। शिरीष पुष्प की कोमल पंखुड़ियों के किनारे से वज्र के समान कठोर मणि, हीरे आदि को काटना तथा शहद की एक बूँद के द्वारा विशाल खारे समुद्र को मीठा करना।
कहने का तात्पर्य यह है कि मदमस्त हाथी को बड़ी-बड़ी जंजीरों के द्वारा ही बाँधा जा सकता है। कमलनाल के धागों से बाँधने का प्रयास पूर्णतया मूर्खतापूर्ण एवं असम्भव है— ठीक इसी प्रकार हीरे आदि कठोर मणि को किसी भी कठोरतम पुष्प की पंखुड़ियों से काटना एकदम असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। ठीक वैसे ही एक शहद की बूँद से अथाह जलराशि वाले समुद्र के जल को मीठा करने का प्रयास भी मूर्खतापूर्ण एवं असम्भव है— वैसा ही मूर्खतापूर्ण कार्य अच्छी-अच्छी अमृतवर्षी बातों को सुना-सुनाकर मूर्खों को सज्जनों के मार्ग पर लाने का भी है। अर्थात् जिस प्रकार उपर्युक्त तीनों कार्य असम्भव हैं, ठीक उसी प्रकार दुष्टों को अच्छी-अच्छी बातों का उपदेश देकर सज्जन नहीं बनाया जा सकता।
विशेष- १. सदुपदेश से किसी भी स्थिति में दुष्ट स्वभाव को सज्जनता में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, इसका प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से यहाँ किया गया है। २. उत्तम शिक्षा के लिए सत्पात्र होना प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है। ३. प्रस्तुत श्लोक में निदर्शना अलंकार है, जिसका लक्षण इस प्रकार है—
अभवन् वस्तु सम्बन्धः उपमा परिकल्पकः। निदर्शना॥
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वै र्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. बालमृणालतन्तुभिः— बालाःमृणालाःबालमृणालाः,तैःतन्तुभिःबालमृणालतन्तुभिः २. रोद्धुम् = √रुध् + तुमुन्। समुज्जृम्भते = सम् + उत् + √जृम्भ् + तिप् (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) मधुबिन्दुना = मधुनः बिन्दुना (षष्ठी तत्पुरुष) ३. छेत्तुम् = √छिद् + तुमुन्। नेतुम् = √नी + तुमुन्। रचयितुम् = √रच् + तुमुन्। ईहते = √ईह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन, आत्मने पद) ४. सन्नह्यते = सम् √नह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन आ.) ५. स्यन्दिभिः = √स्यन्द् + णिनि + भिस् (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)। सूक्तैः = सु + √वच् + क्त + भिस् (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)। वाञ्छति = √वाञ्छ् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)। ६. क्षाराम्बुधेः = क्षार अम्बुधिः क्षाराम्बुधिः तस्य।
१० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
स्वायत्तमेकान्तगुणं १ विधात्रा
विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे
विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥८॥
अन्वय- विधात्रा अज्ञतायाः छादनम् स्वायत्तम् एकान्तगुणम् (मौनम्) विनिर्मितम्। विशेषतः सर्वविदाम् समाजे मौनम् अपण्डितानाम् भूषणम् (एव वर्तते)।
अनुवाद- विधाता ने मूर्खता को छिपाने के लिए (पूर्णतया) स्वाधीन (एवं) एकमात्र गुणाकारी (मौन का) निर्माण किया है। विशेष रूप से विद्वानों के समाज में मौन मूर्खों का आभूषण ही है।
व्याख्या- मूर्ख व्यक्ति को अपनी मूर्खता छिपाने के लिए विधाता ने मानो मौन रूपी एक उपहार भेंट किया है, जिसकी दो विशेषताएँ है— प्रथम उसके लिए मूर्ख व्यक्ति को दूसरे के अधीन नहीं रहना पड़ता अर्थात् चुप रहना पूर्णतया उसके अपने वश में है तथा इसमें केवल गुण ही गुण हैं, क्योंकि इससे हानि की कोई सम्भावना ही नहीं है।
विशेष रूप से उस सभा या समाज में जहाँ विद्वानों का ही बाहुल्य हो, यह मौन वास्तव में मूर्खों के लिए आभूषण के समान ही है, क्योंकि जैसे ही मूर्ख व्यक्ति बोलेगा वैसे ही उसकी अज्ञानता का लोगों को पता चल जाएगा। अतः विद्वत्समाज में चुप रहना मूर्खों के लिए एक अलंकरण का ही कार्य करता है।
विशेष- १. विद्वानों के समक्ष अल्पज्ञ अथवा मूर्ख व्यक्ति को सदैव चुप रहना चाहिए।
२. एकान्तगुणम् के स्थान पर एकान्तहितम् भी पाठभेद प्राप्त होता है, जिसका अर्थ होगा— एकमात्र हितकारी।
३. इस प्रसङ्ग में नीतिकार चाणक्य का कथन विशेषतया उल्लेखनीय है—
मूर्खोऽपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टितः।
तावच्च शोभते मूर्खो यावत् किञ्चिन्न भाषते॥
४. इसी प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति अंग्रेजी के विद्वान् की भी है—
A fool when he is silent is wise.
Silence is the wit of fools.
५. यहाँ उपजाति छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः
उपेन्द्र वज्रा जतजास्ततो गौ।
१. एकान्तहितम्।
नीतिशतकम् ११
इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा को मिलाकर उपजाति छन्द बनाता है।
६. मौन रूप आभूषण की दो विशेषताओं का यहाँ उल्लेख किया है। प्रथम इसके लिए व्यक्ति पूर्णतया स्वाधीन होता है। द्वितीय इसमें लाभ ही लाभ है, हानि की कोई सम्भावना ही नहीं है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
- विधात्रा = वि + √धा + तृच् (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
- छादनम् = √छद् + णिच् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
- विनिर्मितम् = वि + निर् + √मा + क्त (नपु. , प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
- विभूषणम् = वि + √भूष् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
- अपण्डितानाम् = न पण्डितः इति अपण्डितः, तेषाम् (नञ् समास)
यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं,
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।
यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतं,
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः॥९॥
अन्वय- यदा अहम् किञ्चित् ज्ञः (आसम्) द्विपः इव मदान्धः समभवम्, तदा मम मनः सर्वज्ञः अस्मि इति अवलिप्तम् अभवत्। यदा बुधजनसकाशात् किञ्चित् किञ्चित् अवगतम्, तदा मूर्खः अस्मि इति मे मदः ज्वरः इव व्यपगतः।
अनुवाद- जब मैं थोडा सा जानता (था तो मैं) हाथी के समान मद से अंधा हो गया था, तब मेरा मन (मैं) सर्वज्ञ हूँ, इस प्रकार (सोचकर) अहंकारयुक्त हो गया था। जब विद्वानों के सन्निध्य से (मैंने) कुछ-कुछ समझा, तब '(मैं) मूर्ख हूँ', इस प्रकार मेरा मद ज्वर के समान दूर हो गया।
व्याख्या- कवि कहता है कि जिस समय मैंने अत्यल्प जाना था तो मैं अपने को सर्वज्ञ मानता था और जिस प्रकार हाथी मद में अंधा रहता है तथा उचित अनुचित का ध्यान नहीं रखता। अपने सामने अन्य किसी को सामर्थ्यशाली नहीं मानता, ठीक उसी प्रकार मुझे भी अहंकार हो गया था कि मैं ही सबसे अधिक विद्वान् हूँ। मैं ही सब कुछ जानता हूँ, अन्य सब लोग मेरी अपेक्षा अल्पज्ञ हैं।
किन्तु जब मैं ईशकृपा से विद्वानों के सम्पर्क में आया तथा मैंने उनके अथाह ज्ञान का दर्शन किया तो मैंने स्वयं को उनके सामने एकदम मूर्ख माना और मेरा अहंकार, जो स्वयं को सर्वज्ञ मानते हुए मुझे हो गया था, ठीक उसी प्रकार क्षणभर में दूर हो गया, जिस प्रकार औषधि लेने से बुखार दूर हो जाता है।
कहने का तात्पर्य है कि प्रथम तो व्यक्ति को अपने ज्ञान को कभी भी सम्पूर्ण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती तथा ज्ञानी मानकर कभी भी स्वयं
१२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
की योग्यता पर अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार व्यक्ति के नाश का द्योतक होता है। सत्पुरुषों, विद्वानों की सदैव खोज करनी चाहिए और उससे कुछ न कुछ सीखने का विनम्र प्रयास करना चाहिए।
विशेष- १. आधा भरा घड़ा शब्द करता है, इस कहावत के अनुसार अल्पज्ञता व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। २. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने अल्पज्ञ की स्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है। ३. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमा इत्यभिधीयते। यहाँ अहंकार की मद से उपमा दी गई है। ४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ५. काव्यलिंग अलंकार-लक्षण-हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगमुदाहृतम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- किञ्चिज्ज्ञः = किञ्चिद् जानाति इति, किञ्चित् √ज्ञा + क + पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। द्विपः = द्वाभ्यां पिबति इति, द्वि + √पा + क। सर्वज्ञः = सर्वं जानाति इति। सर्व + √ज्ञा + क। मदान्धः = मदेन अन्धः (तृतीया तत्पुरुष), अवलिप्तम् = अव + √लिप् + क्त। अवगतम् = अव + √गम् + क्त। व्यपगतः = वि + अप + √गम् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)। सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तम् = सर्वज्ञः + अस्मि + इति + अभवत् + अवलिप्तम् (विसर्ग, दीर्घ, यण्, व्यञ्जन)।
कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धि¹ जुगुप्सितं, निरुपमरसं प्रीत्या खादन्खरास्थि² निरामिषम्। सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्थं विलोक्य न शङ्कते, न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु परिग्रहफल्गुताम्॥१०॥
अन्वय- श्वा कृमिकुलचितम्, लालाक्लिन्नम्, विगन्धि, जुगुप्सितम्, निरुपमरसम्, निरामिषम्, खरास्थि प्रीत्या खादन् पार्श्वस्थम् सुरपतिम् अपि विलोक्य न शङ्कते, (वस्तुतः) क्षुद्रः जन्तुः परिग्रहफल्गुताम् न हि गणयति।
अनुवाद- कुत्ता कीड़ों के समूह से भरे हुए, लार से भीगे हुए, दुर्गन्धित, घृणा को योग्य, अनुपम (बुरे) रस वाली, माँसरहित गदहे की हड्डी को प्रेमपूर्वक खाता हुआ,
१. विगर्हि २. नरास्थि
नीतिशतकम् १३
पास में खड़े हुए इन्द्र को भी देखकर शंकित नहीं होता है (वास्तव में) तुच्छ प्राणी ग्रहण की गई (वस्तु की) तुच्छता को नहीं गिनता है।
व्याख्या- कुत्ता यदि उसे किसी हड्डी का टुकड़ा मिल जाए चाहे, उसमें कीड़े क्यों न भरे हुए हों, उसके मुख से निकलने वाली लार से भीगने के कारण कितना भी घृणित क्यों न हो, अत्यन्त दुर्गन्ध आ रही हो तथा उसमें स्वाद भी ऐसा क्यों न हो जिसकी कोई उपमा ही न दी जा सके, उसमें लेशमात्र भी माँस नहीं हो, फिर भी वह अत्यन्त प्रेमपूर्वक उसे चबाते हुए एक असीम आनन्द का अनुभव करता है। उस समय उसे आसपास की भी खबर नहीं रहती, भले ही स्वयं इन्द्र भी उसके पास क्यों न खड़ा हो, उसे कुछ भी देने का इच्छुक क्यों न हो, वह उसकी भी परवाह नहीं करता, न ही उससे तनिक भी भयभीत ही होता है।
वास्तव में नीच स्वभाव वाले प्राणी अपने स्वभाव के कारण खराब से खराब वस्तु की निःसारता को नहीं समझ पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि निकृष्ट स्वभाव वाला प्राणी तुच्छ से तुच्छ वस्तु को अपनाने के बाद बिना किसी की परवाह के उसी में आनन्द का अनुभव करता है।
ठीक इसी प्रकार इस संसार में नीच स्वभाव वाले लोग भी बुरे से बुरे काम में लिप्त हो. जाते हैं तथा किसी की भी परवाह किए बिना, लेशमात्र भी लज्जित नहीं होते। उनके लिए उसी में असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, उन्हें न तो लोकनिन्दा की परवाह होती हैं और न ही उन्हें ईश्वर से ही डर लगता है।
विशेष- १. नीच स्वभाव वाले व्यक्ति की तुलना कुत्ते से दी गई है।
२. हड्डी चबाते हुए कुत्ते का स्वाभाविक वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलंकार का प्रयोग।
३. अप्रस्तुत कुत्ते के वर्णन द्वारा प्रस्तुत नीच व्यक्ति का वर्णन होने से अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है, लक्षण इस प्रकार है–
अप्रस्तुतस्य कथनात् प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुत प्रशंसेयं सारूप्यादि नियन्त्रिता।।
४. प्रस्तुत श्लोक में विगन्धि के स्थान पर विगर्हि तथा खरास्थि के स्थान पर नरास्थि पाठभेद भी प्राप्त होता है, तब निन्दित एवं मनुष्य की हड्डी अनुवाद करना होगा।
५. नरास्थि के स्थान पर अर्थौचित्य की दृष्टि से खरास्थि पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि मनुष्य की हड्डी की इस प्रकार उपलब्धि सहज नहीं होती।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
कृमिकुलचितं = कृमीणां कुलं— कृमिकुलं तैः चितम्, √चि + क्त। लालाक्लिन्नम् = लालाभिः क्लिन्नम् √क्लिद् + क्त। विगन्धि = वि √गन्ध् + इनि (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)। विगर्हि = वि + √गर्ह् + इनि (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)।
१४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
निरुपमरसम् = निर्गता उपमा यस्य सः निरुपमः, निरुपमः रसः यस्मिन्। प्रीत्या = √प्रीञ् + क्तिन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन)।
खादन् = √खाद् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)। पार्श्वस्थम् = पार्श्वे तिष्ठति इति पार्श्वस्थः तम्। सुरपतिम् = सुराणां पतिः सुरपतिः तम्। विलोक्य = वि + √लोक् + ल्यप्। परिग्रहस्य फल्गुताम् = परिग्रहफल्गुताम्।
शिरः शार्वं स्वर्गात् पशुपतिशिरस्तः १ क्षितिधरं,
महीध्रादुत्तुंगादवनिमवनेश्चापि जलधिम्।
अधोधो गङ्गेयं पदमुपगता स्तोकमथवा,
विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः॥१९॥
अन्वय- इयम् गंगा स्वर्गात् शार्वम् शिरः, पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरम्, उत्तुंगात् महीध्रात् अवनिम्, अवनेः च अपि जलधिम् (एवम् क्रमशः) अधः अधः स्तोकम् पदम् उपगता अथवा विवेकभ्रष्टानाम् विनिपातः शतमुखः भवति।
अनुवाद- इस गंगा ने, स्वर्ग से शिव के सिर को, शिव के सिर से पर्वत (हिमालय) को, ऊँचे पर्वत से पृथिवी को और पृथ्वी से भी समुद्र को (इस प्रकार क्रमशः) नीचे-नीचे स्थान को प्राप्त किया अथवा विवेक से भ्रष्ट हुए लोगों का पतन सैकड़ों प्रकार से होता है।
व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति जब विवेक भ्रष्ट होता है तो उसके पतन की कोई सीमा नहीं होती, इसी विचार को प्रतिपादित करते हुए कवि यहाँ गंगा का उदाहरण देते हुए कहता है कि यह गंगा प्रारम्भ में स्वर्ग जैसे ऊँचे एवं श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान थी, किन्तु जब इसका पतन होना प्रारम्भ हुआ तो यह स्वर्ग से कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव के सिर पर गिरी, वहाँ भी यह स्थिर नहीं रह सकी तथा वहाँ से इसका पतन हिमालय पर्वत पर हुआ। हिमालय पर्वत जैसे उत्तुंग स्थल पर भी यह नहीं टिक सकी, अपितु इसका वहाँ से पृथ्वी पर पतन हुआ और पृथ्वी से अन्त में सर्वाधिक नीचे स्थान समुद्र को प्राप्त करके ही इसने विराम लिया। जहाँ इसका अपना अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
इस प्रकार जब व्यक्ति विवेकरहित होता है तो उसका इतना आधिक पतन होता है कि अन्त में वह गंगा के समान ही अस्तित्वहीन हो जाता है। अतः व्यक्ति को अपना विवेक कभी भी नहीं त्यागना चाहिए। किसी भी कार्य को करने से पूर्व कर्तव्य अकर्तव्य का विचार अवश्य करना चाहिए।
विशेष- १. व्यक्ति को कोई भी कार्य भलीभाँति विचार कर, विवेकपूर्वक ही करना चाहिए।
१. पतति शिरस्तत्
नीतिशतकम् १५
२. अर्थान्तरन्यास और पर्याय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
३. यहाँ गंगा की उपमा विवेकभ्रष्ट व्यक्ति से दी गई है।
४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
५. यहाँ पाठभेद का अर्थ होगा— शिर से उस प्रसिद्ध हिमालय पर गिरती है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. शर्वस्य इदम्— शार्वम्, शर्व + अण् = शार्वम् (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)
२. जल + √धा + कि = जलधिः
३. विवेकात् भ्रष्टः विवेकभ्रष्टः तेषां विवेकभ्रष्टानां (पञ्चमी तत्पुरुष समास)
४. शतम् मुखानि यस्य सः शतमुखः (बहुव्रीहि समास)
५. वि + नि + √पत् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. क्षितेः धरः क्षितिधरस्तम् क्षितिधरम्।
७. उप + √गम् + क्त + टाप् = उपगता
८. महीध्रात् + उत्तुंगात् + अवनिम् + अवनेः + च + अपि (व्यञ्जन संधि, झलांजशोऽन्ते) (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः)
शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो,
नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
व्याधिर्भेषज संग्रहेश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं,
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्॥१२॥
अन्वय- हुतभुक् जलेन वारयितुम् शक्यः, सूर्यातपः छत्रेण, समदः नागेन्द्रः निशिताङ्कुशेन, गोगर्दभौ दण्डेन, व्याधिः भेषजसंग्रहैः च विषम् विविधैः मन्त्रप्रयोगैः (वारयितुम् शक्यते) सर्वस्य शास्त्रविहितम् औषधम् अस्ति (किन्तु) मूर्खस्य (किमपि) औषधम् न अस्ति।
अनुवाद- अग्नि को पानी के द्वारा रोका जा सकता है, सूर्य की धूप को छाते से, मदमस्त हाथी को तीक्ष्ण अंकुश से, बैल और गधे को डण्डे से, रोग को औषधियों के संग्रह द्वारा, विष को अनेक प्रकार के मन्त्र प्रयोग द्वारा (रोका जा सकता है, इस संसार में) सभी की शास्त्रों में (कोई न कोई) औषधि बताई गई है, (किन्तु ) मूर्ख की (कोई भी) औषधि नहीं है।
व्याख्या- यदि कहीं आग लग जाए तो उसे पानी डाल कर बुझाया जा सकता है, इसी प्रकार सूर्य की धूप को छाते के प्रयोग द्वारा रोका जा सकता है। मद से अंधे, उद्दण्ड
| १६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
हाथी को तेज धार वाले अंकुश से वश में किया जा सकता है, सांड या बैल को दण्डे के द्वारा वश में किया जा सकता है। इसी प्रकार औषधियों को इकट्ठा करके उनके प्रयोग से सभी प्रकार के रोगों का उपचार सम्भव है एवं किसी व्यक्ति पर विष के प्रभाव को अनेक प्रकार के मन्त्रों के प्रयोग से दूर करना भी सम्भव है।
इस प्रकार हमारे शास्त्रों में प्रत्येक कठिनाई के उपस्थित होने या कष्ट को दूर करने का कोई न कोई उपाय बताया गया है, किन्तु एक मात्र मूर्खता ही एक ऐसा कारण है कि उसका कोई उपचार नहीं है अर्थात् मूर्ख व्यक्ति की मूर्खता को दूर करने का कोई भी उपाय कारगर सिद्ध नहीं होता।
विशेष- १. मूर्खता को यहाँ पूर्णतया असाध्य माना गया है। वस्तुतः मूर्खता एक असाध्य रोग है। २. यहाँ मूर्ख से अभिप्राय उसकी मूर्खता से ही है। ३. इस श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. इसी प्रकार के विचार कवि ने पूर्व श्लोकों में भी व्यक्त किए हैं—
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।
५. एक अन्य स्थल पर भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए गये हैं—
इत्थं तद् भुवि नास्ति यस्य विधिना नोपायचिन्ताकृता।
मन्ये दुर्जनचित्तवृत्ति हरणे धातापि भग्नोद्यमः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. हुतम् भुङ्क्ते इति हुतभुक्। हुत + √भुज् + क्विप् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
२. √वृ + णिच् + तुमुन् = वारयितुम्
३. √शक् + यत् = शक्यः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. सूर्यस्य आतपः = सूर्यातपः (षष्ठी तत्पुरुष)
५. मदेन सह = समदः (अव्ययीभाव)
६. नगानाम् इन्द्रः = नगेन्द्रः (षष्ठी तत्पुरुष)
७. निशितेन अंकुशेन (कर्मधारय)
८. गोश्च गर्दभश्च गोगर्दभौ (द्वन्द्व समास)
९. वि + √धा + क्त = विहितम्
१०. भेषजानां संग्रहैः = भेदजसंग्रहैः (षष्ठी तत्पुरुष)
११. शास्त्रैः विहितम् = शास्त्रविहितम् (तृतीया तत्पुरुष)
१२. ओषः पाकः धीयते अस्याम् = औषधम्– ओष + √धा + कि
नीतिशतकम् १७
साहित्य-सङ्गीत-कलाविहीनः, साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः। तृणं न खादन्नपि जीवमानः, तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥१३॥
अन्वय- साहित्य-संगीत-कला-विहीनः (मनुष्यः) पुच्छ विषाणहीनः साक्षात् पशुः (एव अस्ति) तृणम् न खादन् अपि (सः) जीवमानः तत् पशूनाम् परमम् भागधेयम् (वर्तते)।
अनुवाद- साहित्य संगीत और कला से रहित (व्यक्ति) पूँछ, सींग से रहित साक्षात् पशु (ही है)। तिनके न खाता हुआ भी (वह) जीवित रहता है, वह पशुओं का परम सौभाग्य (ही है)।
व्याख्या- इस संसार में जिस व्यक्ति ने न तो साहित्य का अध्ययन किया, न ही संगीत की शिक्षा प्राप्त की और न ही कला को समझने का प्रयास किया अर्थात् साहित्य, संगीत अथवा कला इन तीनों में से किसी की भी शिक्षा प्राप्त नहीं की। ऐसा व्यक्ति इस संसार में बिना पूँछ एवं बिना सींग का पशु ही है।
और जो यह मनुष्य रूपी पशु बिना तिनके खाए भी जीवित रहता है, वह तो पशुओं का परम सौभाग्य ही है, क्योंकि यदि यह मनुष्य रूपी पशु भी तिनके खाने लग जाता तो निश्चय ही पशुओं के लिए खाद्य पदार्थों का अभाव हो जाता।
विशेष- १. यहाँ साहित्य, संगीत एवं कला को न जानने वाले मनुष्य को पशु के समान बताया है। २. इस संसार में आकर व्यक्ति को इन तीनों में से कम से कम किसी एक का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए अन्यथा उसका मनुष्य जीवन निरर्थक है। ३. नीतिशतकम् की कुछ प्रतियों में यह श्लोक प्राप्त नहीं होता है। ४. यहाँ उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण पूर्व श्लोक में दिया हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. सहित + ष्यञ् = साहित्य। सम् + √गै + क्त = संगीत। वि + √हा + क्त- विहीनः। साहित्यञ्च संगीतञ्च कलां च ताभिः विहीनः = साहित्यसंगीतकलाविहीनः (द्वन्द्व समास) २. पुच्छञ्च विषाणौ च पुच्छविषाणाः तैः हीनः = पुच्छविषाणहीनः। ३. √खाद् + शतृ = खादन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ४. √जीव् + शानच् = जीवमानः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
यहाँ शानच् प्रत्यय के स्थान पर शतृ प्रत्यय का प्रयोग करके जीवन् प्रयोग उचित था, क्योंकि जीव् धातु परस्मैपदी है।
| १८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥१४॥
अन्वय- येषाम् (जनानाम् समीपे) न विद्या, न तपः, न दानम् (न) ज्ञानम्, न शीलम्, न गुणः, न धर्मः (वर्तते) ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः (सन्ति) मनुष्यरूपेण (च) मृगाः चरन्ति।
अनुवाद- जिन (लोगों के पास) न विद्या (है), न तप (है) न दान (है), न ज्ञान (है) न सदाचार (है), न गुण है (और) न धर्म (है) वे (इस) मृत्युलोक में पृथिवी पर भारस्वरूप हैं (और) मनुष्य रूप में पशु (ही) घूम रहे हैं।
व्याख्या- इस संसार में जिन लोगों ने विद्या का अध्ययन नहीं किया अथवा तपस्या का आचरण भी नहीं किया, किसी भी प्राणी को कुछ भी दान नहीं दिया, ज्ञान का अर्जन भी अपने जीवन में नहीं किया, दैनिक जीवन में जो सदाचार का भी पालन नहीं करता है यहाँ तक कि उसके पास कोई गुण भी नहीं है, न ही वह धर्म का ही पालन करता है। ऐसा व्यक्ति इस मृत्युलोक में पृथिवी के ऊपर भार के समान निरर्थक है और ऐसे व्यक्तियों के लिए यदि हम कहें कि वे इस पृथिवी पर पशु ही घूम रहे हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि जिस प्रकार इस संसार में पशु का जीवन निरर्थक है, वैसा ही उस व्यक्ति का जीवन है।
विशेष-
१. व्यक्ति को अपना जीवन सार्थक करने के लिए उपरोक्त गुणों में से किसी भी एक को अपने आचरण में लाना चाहिए।
२. जिसके पास उपरोक्त विशेषताओं में से कोई विशेषता नहीं है, उसमें और पशु में कोई भी अन्तर नहीं है, अतः उनका जीवन पूर्णरूपेण निरर्थक है।
३. यहाँ विद्या का प्रथम उल्लेख के कारण उसकी सर्वाधिक महत्ता का कवि का अभिप्राय है।
४. प्रस्तुत श्लोक में प्रथम तीन चरणों में इन्द्रवज्रा तथा चतुर्थ में उपेन्द्रवज्रा होने से उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √दा + ल्युट् = दानम्
२. मर्त्यानां लोके मर्त्यलोके (षष्ठी तत्पुरुष)
३. भारः इव भूताः भारभूताः (कर्मधारय)
४. मनुष्यस्य रूपेण मनुष्यरूपेण (षष्ठी तत्पुरुष)
नीतिशतकम् १९
५. √चर् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन)
६. √ज्ञा + ल्युट् = ज्ञानम्
वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह।
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि॥१५॥
अन्वय- वनचरैः सह पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तम् वरम् (अस्ति), (किन्तु) मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेषु अपि वरम् न (वर्तते)।
अनुवाद- वनवासियों के साथ दुर्गम पर्वतों में विचरण करना श्रेष्ठ (है, किन्तु) मूर्ख लोगों के साथ इन्द्र के भवनों में भी (रहना) ठीक नहीं (है)।
व्याख्या- यदि व्यक्ति को किसी विशेष परिस्थिति में मूर्ख लोगों के साथ पूर्णतया ऐश्वर्य सम्पन्न सुख सुविधायुक्त स्थानों पर भी रहना पड़े तो व्यक्ति को कभी भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि मूर्खों के साथ रहने से व्यक्ति का किसी भी दृष्टि से भला नहीं हो सकता, किन्तु कुसंगति के कारण हानि की ही अधिक सम्भावना रहेगी।
इसलिए व्यक्ति को भले ही कितनी भी कठिनाइयों का सामना करते हुए, कष्ट का अनुभव करते हुए, दुर्गम पर्वत कन्दराओं में पूर्ण अविकसित भीलों के साथ भी क्यों न रहना पड़े, किन्तु उसे मूर्ख लोगों के साथ किसी भी स्थिति में निवास को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
विशेष-
१. यहाँ मूर्ख व्यक्ति की संगति की अपेक्षा अधिक से अधिक कष्ट उठाते हुए वनवासियों की संगति को भी श्रेष्ठ बताया है।
२. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयो ह्र्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र के अनुसार सह के योग में वनचरैः पद में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
२. वने चरन्ति इति वनेचराः, तैः वनचरैः (सप्तमी तत्पुरुष)
३. पर्वतानां दुर्गेशु, पर्वतदुर्गेषु (षष्ठी तत्पुरुष)
४. सुराणाम् इन्द्रः सुरेन्द्रः तस्य भवनेषु (षष्ठी तत्पुरुष)
विद्वत्पद्धतिः
शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः शिष्यप्रदेयागमाः,
विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभोर्निर्धनाः।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य, कवयस्त्वर्थं विनापीश्वराः,
२० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः॥१६॥
अन्वय- शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः, शिष्यप्रदेयागमाः, विख्याताः कवयः यस्य प्रभोः विषये निर्धनाः वसन्ति। तत् वसुधाधिपस्य जाड्यम् (एव)। कवयः तु अर्थम् विना अपि ईश्वराः (सन्ति)। यैः मणयः अर्घतः पातिताः ते कुपरीक्षकाः हि कुत्स्याः स्युः।
अनुवाद- शास्त्रपरिष्कृत शब्दों से सुन्दर वाणी से युक्त, शिष्यों को देने योग्य विद्या से युक्त, प्रसिद्ध कवि जिस राजा के राज्य में निर्धन होकर रहते हैं। वह (तो वस्तुतः) राजा की मूर्खता (ही है) कवि तो धन के बिना भी ऐश्वर्यसम्पन्न (हैं)। जिन (परीक्षकों द्वारा) मणियाँ मूल्य से गिरा दी गईं, वे बुरे परीक्षक ही (वस्तुतः) निन्दनीय हैं (न कि मणियाँ)।
व्याख्या- जिन कवियों के पास व्याकरण सम्मत, मनोरम वाणी है तथा जिनकी अथाह ज्ञानराशि शिष्यों को देने योग्य है अर्थात् जिनमें ज्ञान के साथ-साथ अभिव्यक्ति की सामर्थ्य भी है। इन विशेषताओं से युक्त दूर-दूर प्रदेशों में अपनी योग्यता के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध भी कवि यदि किसी राजा के राज्य में निर्धनता की अवस्था में निवास करते हैं, तो यह उस राजा की ही मूर्खता मानी जाएगी कवियों का इसमें कोई दोष नहीं है।
क्योंकि कवि तो धन के अभाव में भी राजाओं के समान ऐश्वर्य से युक्त हैं, उनका ज्ञान उनका सबसे बड़ा धन है कहा भी गया है- ‘विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्।' इसी प्रसंग में कवि एक उदाहरण देते हुए कहता है कि यदि राजा अपने राज्य में रहने वाले विद्वानों का सम्मान नहीं करता, उन्हें राजाश्रय प्रदान नहीं करता, तो इसके लिए निश्चय ही वह राजा ही ठीक उसी प्रकार दोषी है जैसे यदि कोई जौहरी मूल्यवान् मणियों को काँच करार दे दे, तो इसमें दोष जौहरी का माना जाएगा न कि मणियों का। मणियों में तो अपना गुण है ही उसकी परख करने वाले, वस्तुतः जौहरी कहलाने योग्य नहीं हैं, क्योंकि यदि उनमें सही परख की सामर्थ्य होती तो वे निश्चय ही मूल्यवान् मणियों को मूल्य-रहित करार नहीं देते।
विशेष- १. राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में स्थित विद्वानों को यथोचित सम्मान प्रदान करे, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें।
२. यदि कोई अज्ञानी हीरे को पत्थर समझ कर उसको उपेक्षापूर्वक कूड़े में फेंक देता है तो इसके लिए हीरा दोषी नहीं हो सकता।
३. यहाँ कवि से अभिप्राय अपने विषय के विशिष्ट विद्वान् एवं अभिव्यक्ति की सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति से है, कविता करने वाले व्यक्ति से नहीं।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग है—
नीतिशतकम् २१
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः: शार्दूलविक्रीडितम्।
५. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगमुदाहृतम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. शास्त्रैः उपस्कृतः शास्त्रोपस्कृतः, तैः शब्दैः सुन्दर्यः गिरः येषां
२. शिष्येभ्यः प्रदेयाः आगमाः येषां, ते
३. प्र + √दा + यत् = प्रदेयाः
४. वसुधायाः अधिपः, वसुधाधिपः (षष्ठी तत्पुरुष)
५. अर्ध + तसिल् = अर्धतः
६. √पत् + णिच् + क्त = पातित + टाप् = पातिता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)
७. स्युः = लट् लकार के अर्थ में यहाँ विधिलिङ् लकार का प्रयोग है।
८. उप + √कृ + क्त (सुट् का आगम)
९. √कुत्स् + ण्यत् = कुत्स्याः
हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा
ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम्।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं
येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते॥१७॥
अन्वय- हे! नृपाः, तान् प्रति मानम् उज्झत, येषाम् (समीपे) विद्याख्यम् अन्तःधनम् (अस्ति) यत् हर्तुः गोचरम् न याति, सर्वदा किम् अपि शम् पुष्णाति, अर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानम् अनिशम् हि पराम् वृद्धिम् प्राप्नोति, कल्पान्तेषु अपि निधनम् न प्रयाति, तैः सह कः स्पर्धते।
अनुवाद- हे राजाओं!, उन (लोगों) के प्रति अभिमान छोड़ दो, जिनके (पास) विद्या नामक गुप्त धन (है) जो चोर की इन्द्रियों का विषय नहीं होता, सदा ही किसी न किसी कल्याण को ही पुष्ट करता है, याचकों को दिया जाता हुआ (भी) निरन्तर अत्यधिक बढ़ता ही है, कल्पों के अन्त में भी विनष्ट नहीं होता है, (भला) उनके साथ कौन स्पर्धा कर सकता है?
व्याख्या- राजाओं को सम्बोधित करते हुए कवि विद्वानों के प्रति विनम्र व्यवहार करने का सुझाव देते हुए कहता है कि हे राजाओं! तुम इस प्रकार के विद्वानों के प्रति अपने अहंकार का परित्याग कर दो, जिनके पास विद्या नामक अत्यन्त अद्भुत एवं गुप्त धन है, जो चोरों की इन्द्रियों का विषय भी नहीं होता अर्थात् चोर इस धन को चुराने में समर्थ नहीं होते। इस धन के द्वारा किसी न किसी प्रकार के कल्याणों की ही प्राप्ति होती
२२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
है अर्थात् विद्या के द्वारा कभी भी अकल्याण की सम्भावना ही नहीं है। यह विद्या नामक गुप्त धन यदि याचकों को दिया जाए तो निरन्तर बढ़ता ही है। भले ही कल्प का अन्त क्यों न आ जाए, किन्तु इस धन के विनाश की कोई सम्भावना ही नहीं रहती। इस प्रकार के धनों से युक्त धनवानों के अर्थात् विद्वानों के साथ भला किसकी स्पर्धा करने की सामर्थ्य है। अतः हे राजाओं! तुम कभी भी इनके साथ बराबरी नहीं कर सकते हो। इसलिए इनके साथ अभिमान का त्याग कर विनम्रतापूर्वक व्यवहार करो।
विशेष- १. विद्वत्त्वं नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। इस भावना को अभिव्यक्त करते हुए यहाँ विद्वान् की उत्कृष्टता प्रतिपादित की गई है।
२. विद्या रूपी धन की चार विशेषताओं का यहाँ उल्लेख किया गया है।
३. प्रस्तुत श्लोक में उपमेय विद्या रूपी धन की, उपमान सामान्य लोक प्रसिद्ध धन से उत्कृष्टता प्रतिपादित करने से व्यतिरेक अलंकार है, लक्षण इस प्रकार है—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः॥
४. राजाओं का कर्तव्य है कि वे विद्वानों का सम्मान करें।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं, जो मनुष्यों के ४३२००००००० वर्षों के बराबर होता है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. हर्तुः + याति (विसर्ग संधि)
२. सर्वदा + अपि + अर्थिभ्यः (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि)
३. कल्प + अन्तेषु + अपि (दीर्घ, यण्)
४. कः + तैः = (विसर्ग— विसर्जनीयस्य सः)
५. √हृ + तृच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन)
६. गावः (इन्द्रियाणि) चरन्ति अस्मिन् इति, गोचरःतम्
७. अर्थ + इनि (पुल्लिंग, चतुर्थ विभक्ति, बहुवचन)
८. प्रति + √पद् + शानच् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
९. √उज्झ + सिप् (लोट् लकार, म.पु., एकवचन)
१०. प्रति के योग में तान् में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
११. ‘‘सहयुक्तेऽप्रधाने’’ सूत्र से सह के योग में तैः में तृतीया विभक्ति।
१२. √स्पर्ध् + तिप् (आत्मनेपद, लट्लकार (प्रथम पुरुष, एकवचन)
अधिगतपरमार्थान् पण्डितान् माऽवमंस्थाः,
तृणमिव लघु लक्ष्मीनैव तान् संरुणद्धि।