नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति कोई भी कठिन से कठिन, असम्भव से असम्भव कार्य भी यदि चाहे तो करने में समर्थ है, किन्तु दुराग्रही हठी मूर्ख व्यक्ति के मन को प्रसन्न करना एकदम असम्भव है। इस प्रसंग में कवि तीन असम्भव कार्यों की पूर्ति की सम्भावना अभिव्यक्त करते हुए कहता है कि व्यक्ति यदि चाहे तो मगरमच्छ के भयावह मुख में स्थित दाढ़ों के बीच में रखी हुई मणि को भी सम्भव है प्रयत्न करने पर निकाल ले।
हो सकता है वह प्रयास करने पर ऊँची-ऊँची उठती हुई लहरों वाले समुद्र को भी तैर कर पार कर ले। इतना ही नहीं, सम्भव है व्यक्ति किसी क्रोध से पागल भयंकर सर्प को भी निडर होकर पुष्पमाला के समान अपने मस्तक पर धारण कर ले। हालांकि ये उपर्युक्त तीनों कार्य एकदम असम्भव हैं, किन्तु कवि की दृष्टि में व्यक्ति इन्हें भी प्रयास करने पर सिद्ध कर सकता है, किन्तु मूर्ख, व्यक्ति का हठी चित्त प्रसन्न करना पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि वह तो “करेला और नीम” चढ़ा कहावत के अनुसार किसी की भी बात सुनने को तैयार ही नहीं होगा। अतः उसे तो मनाया ही नहीं जा सकता है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने तीन अत्यन्त कठिन कार्यों— (१) मगर के मुख से मणि निकालना, (२) ऊँची-ऊँची लहरों से भरे हुए समुद्र को भी तैर कर पार करना, (३) भयंकर और क्रुद्ध सर्प को भी सहज ही माला के समान सिर पर धारण करना जैसे पूर्णतया असम्भव कार्यों को भी परिश्रम अथवा दुःसाहस आदि द्वारा सम्भव बताया; किन्तु एक तो मूर्ख, फिर ऊपर से हठी व्यक्ति का प्रसन्न होना पूर्णतया असम्भव है।
२. एक यूरोपीय विद्वान् लावेल ने भी कहा है— केवल मूर्ख और मृतक अपनी राय नहीं बदलते।
३. प्रस्तुत श्लोक में अत्यन्त व्यावहारिक तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।
४. पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है; लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथिवी गुरुः।
५. उपमा और रूपकातिशयोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कोपितम् = √कुप् + णिच् + क्त (द्वितीया विभक्ति, एकवचन)
२. मालाकुलम् = माला + आकुलम् (आ + आ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः)
३. प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तम् = प्रतिनिविष्टः यः मूर्खजनः तस्य चित्तम्।
४. वक्त्र = √वच् + त्र, दंष्ट्रा = √दंश् + ष्ट्रन्, प्रसह्य = प्र + √सह + ल्यप्, संतरेत् = सम् + √तॄ + तिप् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन), भुजङ्गं = भुज् + √गम् + ख (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन), प्रतिनिविष्ट = प्रति + नि + √विश् + क्त, आराधयेत् = आ √राध् + तिप् (विधिलिंग प्रथम पुरुष, एकवचन)।