नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ७
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्,
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत्,
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥६॥
अन्वय- यत्नतः पीडयन् (मनुष्यः) सिकतासु अपि तैलम् लभेत् पिपासार्दितः (सः) मृगतृष्णिकासु सलिलम् पिबेत्, पर्यटन् कदाचित् (कोऽपि जनः) शशविषाणम् अपि आसादयेत्, प्रतिनिविष्ट मूर्खजनचित्तम् तु न आराधयेत्।
अनुवाद- (सम्भव है व्यक्ति) यत्नपूर्वक दबाता हुआ रेत से भी तेल प्राप्त कर ले, प्यास से व्याकुल हुआ (सम्भव है) मृग तृष्णिकाओं में (भी) जल पी लेवे। (हो सकता है) घूमता हुआ कभी खरगोश के सींग भी प्राप्त कर ले, किन्तु (वह) मूर्ख व्यक्ति के हठी चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकता है।
व्याख्या- पूर्व श्लोक के समान ही कवि ने यहाँ भी तीन पूर्णतया असम्भव कार्यों के सम्पन्न होने की सम्भावना व्यक्त की है, किन्तु मूर्ख व्यक्ति के हठी चित्त को प्रसन्न करने के विषय में किसी भी प्रकार व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, यह बात यहाँ कही गई है।
कवि सम्भावना व्यक्त करता है कि यों तो रेत में तेल लेशमात्र भी नहीं होता, किन्तु हो सकता है कि व्यक्ति को, अत्यन्त परिश्रम से दबाने पर रेत के कणों से तेल की एक दो बूँद प्राप्त हो जाए। ठीक इसी प्रकार वैसे तो मृगतृष्णिका में किसी स्थिति में व्यक्ति को पानी की प्राप्ति सम्भव नहीं है, किन्तु हो सकता है कभी संयोग से उसे जल की प्राप्ति मृगतृष्णिका में भी हो जाए। इसी प्रकार यद्यपि खरगोश के सींग नहीं होते, किन्तु सम्भव है यों ही कभी जंगलादि में घूमते हुए उसे खरगोश के सींग भी प्राप्त हो जाएँ। अर्थात् उपर्युक्त तीनों कार्य यद्यपि असम्भव ही हैं, किन्तु हो सकता है किसी परिस्थिति विशेष में संयोगवश ये सम्भव भी हो जाए। लेकिन ऐसा व्यक्ति जो मूर्ख भी हो और साथ-साथ हठी भी हो, उसके चित्त को तो प्रसन्न करना एकदम असम्भव ही है। उसकी प्रसन्न होने की तो लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है।
विशेष- १. पूर्व श्लोक के समान ही इसमें भी कवि ने मूर्ख व्यक्ति यदि हठी भी हो तो उसका प्रसन्न किया जाना एकदम असम्भव बताया है।
२. यहाँ रेत से तेल प्राप्त करना, मृगमरीचिका में जल पीना तथा खरगोश के सींग प्राप्त करना तीनों बातें पूर्णतया असम्भव है; किन्तु फिर भी कवि ने उनकी पूर्ति की सम्भावना व्यक्त की है, इसका अभिप्राय केवल तुलनात्मक रूप में मूर्ख एवं हठी चित्त की प्रसन्नता की कठिनता के अतिरेक का प्रतिपादन करना मात्र है।
३. यहाँ भी पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षणपूर्ववत्।