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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् ५

प्रकार दूसरी श्रेणी के, बात को भलीभाँति समझने वाले व्यक्ति को आप संकेतमात्र से ही किसी बात को सरलतम रूप में समझा सकते हैं, किन्तु किसी विषय में अल्पज्ञान प्राप्त कर स्वयं को विद्वान् समझने वाले पण्डितमन्य को तो यदि स्वयं ब्रह्मा भी आकर विषय समझाना चाहे तो भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि कदम-कदम पर उसका अहंकार विषय को समझने में बाधा उत्पन्न करता रहेगा। उसका समझाने वाले व्यक्ति के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न नहीं हो सकेगा।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में प्रतिपादन किया गया है कि अहंकार ज्ञानप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। २. इसमें संसार के सभी लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है— अज्ञ, विशेषज्ञ तथा पण्डितमानी। ३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ— 'यस्याः पादे प्रथमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या।'

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. ब्रह्मा + अपि (आ + अ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः) २. सुखम् + आराध्यः (अज्झीनं परे संयोज्यम्) ३. अज्ञः = न जानाति इति (नञ् समास) न + √ज्ञा + क ४. विशेषज्ञः, विशेषेण जानाति इति। विशेष + √ज्ञा + क (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. ज्ञानलवेन = ज्ञानस्य लवेन (षष्ठी तत्पुरुष) ६. दुर्विदग्धम् = दुर् + वि + √दह् + क्त ७. रञ्जयति = √रञ्ज् + तिप् (लट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन)

प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्र दंष्ट्राङ्कुरात्,
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदूर्मिमालाकुलम्।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद् धारयेत्,
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्॥५॥

अन्वय- (जनः) मकरवक्त्रदंष्ट्रांकुरात् प्रसह्य मणिम् उद्धरेत्, प्रचलद् ऊर्मिमालाकुलम् समुद्रम् अपि सन्तरेत्, कोपितम् भुजंगम् अपि शिरसि पुष्पवद् धारयेत्, तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तम् न आराधयेत्।

अनुवाद- (व्यक्ति) सम्भव है मगर के मुँह में दाढ़ की नोक से बलपूर्वक मणि को निकाल ले, सम्भव है (वह) अत्यन्त चञ्चल लहरों के समूह से व्याप्त समुद्र को भी पार कर ले, क्रुद्ध भयंकर सर्प को भी (सम्भव है वह) सिर पर पुष्प के समान धारण कर ले, किन्तु दुराग्रही मूर्ख व्यक्ति के (हठी) मन को प्रसन्न नहीं कर सकता।

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