नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ नीतिशतकम्
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय¹ नमः शान्ताय तेजसे²॥१॥
अन्वय– दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये, स्वानुभूत्येकमानाय शान्ताय तेजसे नमः।
पदच्छेद– दिक् + कालादि + अनवच्छिन्न + अनन्त + चिन्मात्रमूर्तये, स्वानुभूति + एकमानाय शान्ताय तेजसे नमः।
अनुवाद– दिशा, काल आदि से आच्छन्न न होने वाले, अन्तरहित, चैतन्यमात्र स्वरूप वाले, स्वानुभूतिमात्र प्रमाण वाले, शान्तस्वरूप, तेजोस्वरूप (परमपिता, परमब्रह्म) को नमस्कार है।
व्याख्या– जिस परमब्रह्म को देश, काल आदि सीमित सांसारिक तत्त्वों द्वारा आच्छादित नहीं किया जा सकता अर्थात् उसे देश अथवा समय की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता, जिसका कभी भी अन्त नहीं होता है। चैतन्य ही जिसका स्वरूप है, शान्तस्वरूप वाले, ज्योतिपुत्र स्वरूप वाले परमपिता परमात्मा को नमस्कार है।
विशेष– १. ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए संस्कृत काव्यों में मंगलाचरण की परम्परा रही है। जिसका निर्वाह महाकवि ने यहाँ प्रथम श्लोक में निराकार परमात्मा को प्रणाम करके किया है।
मंगलाचरण तीन प्रकार का होता है— आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक तथा वस्तु-निर्देशात्मक। इनमें से प्रथम मंगलाचरण में कवि श्रोताओं अथवा दर्शकों के लिए ‘वः पातु’ आदि पदों का प्रयोग करके मंगलकामना करता है। द्वितीय में कवि अपने इष्ट देव को ‘नमः’ आदि पदों का प्रयोग करते हुए प्रणाम निवेदन करता है। तृतीय मंगलाचरण में कथावस्तु का संक्षेप में प्रतिपादन करना भी वस्तुनिर्देशात्मक के अन्तर्गत आता है, जैसे मेघदूत में।
२. ‘नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च’ सूत्र से ‘नमः’ पद के योग में परमात्मा के सभी विशेषणों में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
१. स्वानुभूत्येकसाराय
२. अमूर्तये नमस्तस्मै गुणातीतगुणात्मने॥