भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 194 में से

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३. वैराग्यशतकम्- इस संरचना में कवि की सांसारिक भोगों एवं आकर्षणों के प्रति उदासीनता की भावना को सुन्दर अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। इसमें कवि ने संसार की निस्सारता, विषमता, भोगतृष्णा की विभीषिका तथा यौवन की अस्थिरता का मार्मिक चित्रण करते हुए अपने सहृदय पाठक को वैराग्य की ओर उन्मुख करने का सफल प्रयास किया है। वस्तुतः तीनों शतकग्रन्थ संस्कृत गीतिकाव्य साहित्य की अग्रणी एवं उत्कृष्ट रचनाएँ कही जा सकती हैं।

(छ) भर्तृहरि की भाषा-शैली- महाकवि भर्तृहरि के ग्रन्थों में सर्वत्र भाषा का अत्यन्त सरल स्वरूप देखने को मिलता है। उन्होंने भाषा में सर्वत्र शब्दों का उचित प्रयोग किया है। यहाँ हमें भाषा में स्वाभाविकता के दर्शन होते हैं। उन्होंने प्रसाद एवं माधुर्य गुणों का सर्वाधिक प्रयोग किया है। वाक्ययोजना इतनी सरल प्रयुक्त हुई है कि पढ़ते ही अर्थ हृदयंगम हो जाता है। इनका प्रत्येक पद्य स्वयं में पूर्ण है।

महाकवि ने जीवन के सभी पक्षों को अत्यन्त निकट से देखा और अनुभव किया है, इसलिए उनका वर्णन अत्यन्त स्वाभाविक एवं हृदयग्राही बन पड़ा है। उन्होंने सर्वत्र भावों के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है। वस्तुतः संस्कृत-कविता का सुन्दरतम स्वरूप हमें महाकवि की कविता में सर्वत्र देखने को मिलता है। यद्यपि उन्होंने सर्वत्र वैदर्भी रीति का प्रयोग किया है, किन्तु कुछ स्थलों पर गौड़ी रीति के दर्शन भी हमें सहज ही होते हैं—

क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि कष्टां दशामापन्नोऽपि,
शिथिलप्रायोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि।
मत्तेभेन्द्रविभिन्नकुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः,
किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी॥२७॥

उनकी भाषा में सर्वत्र अलंकारों का अत्यन्त स्वाभाविक प्रयोग हुआ है, कहीं भी उन्होंने अलंकारों से भाषा को सजाने का सायास प्रयास नहीं किया है। उनके शतकत्रय में हमें अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, दीपक, दृष्टान्त, समुच्चय, परिसंख्या, अर्थापत्ति, अप्रस्तुत-प्रशंसा, स्वभावोक्ति, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग देखने को मिलता है। अर्थान्तरन्यास एवं पर्यायोक्ति अलंकारों का उन्होंने सर्वाधिक प्रयोग किया है।

व्यंग्यार्थ उनकी सबसे बड़ी विशेषता है जिसके द्वारा वे अपने पाठक को सहज ही कोई न कोई उपदेश प्रदान कर देते हैं। वस्तुतः उनकी शैली में रोचकता, तार्किकता, उक्ति-वैचित्र्य की निपुणता, भावों की स्वाभाविकता, भाषा का लालित्य सहज ही देखने को मिलते हैं।

उनके काव्य की विशेषता है कि यहाँ आदर्शवादी व्यक्ति को नीतिपरक श्लोकों की उपलब्धि होती है, शृंगारिक वृत्ति वाले पाठक को शृंगाररस से ओतप्रोत काव्य के दर्शन