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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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होते हैं तथा विरक्त व्यक्ति को उसकी रुचि के अनुरूप शान्तरस की अनुभूति होती है। यहाँ पर आचार, नीति, कर्तव्याकर्तव्य, परोपकार, दुर्जन, सज्जन, कर्म, भाग्य, मान, शौर्य, क्रौर्य, प्रेम, नश्वरता आदि सभी विषयों को कवि ने अपनी लेखनी का विषय बनाया है।

उनके श्लोक इतने मार्मिक हैं कि सीधे हृदय पर प्रभाव डालते हैं। रसों की दृष्टि से उनके काव्य में श्रृंगार, वीर और शान्त रस का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। वीभत्स रस का यहाँ प्रायः अभाव ही है।

महाकवि भर्तृहरि के काव्यों में सर्वाधिक शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त स्रग्धरा, आर्या, अनुष्टुप्, वसन्ततिलका, शिखरिणी, हरिणी, द्रुतविलम्बित, इन्द्र-वज्रा, उपेन्द्रवज्रा उपजाति, वंशस्थ आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है। उनके सभी छन्द प्रायः गेयात्मकता लिए हुए हैं।

अन्त में हम महाकवि भर्तृहरि की भाषाशैली के विषय में संक्षेप में इतना ही कह सकते हैं कि उनके काव्य में कलापक्ष की अपेक्षा भावपक्ष अधिक प्रबल रहा है। उनके काव्य का प्रमुख उद्देश्य है, मानव जीवन के विविध पक्षों को चित्रित करते हुए सम्पूर्ण समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करना। जिसमें उन्होंने अधिकांश रूप में सफलता भी अर्जित की है। सुभाषित तो उनके तीनों शतकों में पदे-पदे भरे पड़े हैं।

उपर्युक्त कथ्यों की पुष्टि में कुछ उदाहरण हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। भाषा का माधुर्य एवं सरल स्वरूप द्रष्टव्य है—

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥

प्रेम का अस्थिर स्वरूप ऐन्द्रिक सुख के प्रति वैराग्य तो स्वयं कवि के जीवन में भी हलचल पैदा कर देता है। विषय प्रतिपादन के साथ-साथ भाषा का प्रवाह द्रष्टव्य है—

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥२॥

धन के विषय में कवि की अभिव्यक्ति कितनी सुन्दर बन पड़ी है—

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥४३॥