नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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४. प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान् प्रोफेसर के. ए. सुब्रह्मण्य अय्यर¹ ने वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को शतकत्रय के भर्तृहरि से भिन्न ही स्वीकार किया है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि भर्तृहरि सम्राट् विक्रमादित्य (६४४ ई.) के समकालिक एवं उनके अत्यन्त निकट थे। ये शैव वेदान्ती थे। बौद्ध धर्मावलम्बी भर्तृहरि इनसे भिन्न और वाक्यपदीय ग्रन्थ के रचयिता हैं। इन्होंने जीवन में ऐश्वर्यों का अत्यधिक भोग किया तथा जीवन के अन्तिम क्षणों में इन्हें वैराग्य हुआ। इनका समय सप्तम शती का पूर्वार्द्ध मानना अधिक उचित प्रतीत होता है।
(च) भर्तृहरि की कृतियाँ- यों तो भर्तृहरि के नाम से अनेक ग्रन्थ¹ मिलते हैं, किन्तु हमारे विवेच्य महाकवि भर्तृहरि के मुक्तक पद्यों के तीन संकलन ही उपलब्ध होते हैं— शृंगारशतक, नीतिशतक और वैराग्यशतक। भारतीय परम्परा के अनुसार ये तीनों शतक एक ही कवि द्वारा प्रणीत हैं। अब हम यहाँ इनका संक्षेप में परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं—
१. शृंगारशतकम्- इसमें कवि ने सुमधुर शैली में रमणियों के मनमोहक सौन्दर्य के आकर्षण को चित्रित किया है। इसके अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने स्त्रियों की शृंगारिक चेष्टाओं एवं हावभावों का सूक्ष्म अध्ययन किया था।
साथ ही इस रचना के अन्त में उन्होंने सुन्दरता एवं प्रेम को सर्वोच्च न मानकर उसकी निस्सारता और प्रेम की दुःखद परिणति का भी चित्रण किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस रचना का प्रारम्भ उन्होंने अपनी युवावस्था में किया और समाप्ति प्रौढावस्था में। यही कारण है कि यहाँ कवि आकर्षण से विकर्षण की ओर, अतिप्रणय से अप्रणय की ओर बढ़ता हुआ दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः इस शतक में सांसारिक भोग और वैराग्य इन दोनों विकल्पों के मध्य अनिश्चय की मनःस्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है, जो धीरे-धीरे वैराग्य के प्रति निश्चयात्मक स्वरूप में बदल गई है।
२. नीतिशतकम्- इस शतक के सौ से अधिक श्लोकों में कवि ने विद्या, परोपकार, वीरता, परिश्रम, साहस और उदारता आदि उदात्त मनोभावों का सरल भाषा में मनोहारी चित्रण किया है। इसमें कवि के ऐश्वर्यसम्पन्न राजाओं की निष्ठुरता, हृदयहीनता, अहंकारिता, दुर्जनों एवं मूर्खों के द्वारा सज्जनों को दिए जाने वाले कष्टों एवं अपमान का चित्रण करते हुए, उसके प्रति विद्रोहात्मक स्वर को मुखरता मिली है। अनेक नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए, मानवतावादी दृष्टिकोण को अत्यन्त हृदयग्राही रूप में यहाँ चित्रित किया गया है। वस्तुतः नीतिशतकम् सम्पूर्ण सूक्ति-साहित्य का अलंकार स्वरूप ग्रन्थ है, जिसमें अनेक दीप्तिमान् माणिक स्थल-स्थल पर जड़े हुए हैं।
१. भर्तृहरि का वाक्यपदीय - अय्यर - राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी - १९८१
१. वाक्यपदीय, वाक्यपदीय टीका, महाभाष्यदीपिका, मीमांसाभाष्य, वेदान्तसूत्रवृत्ति, शब्दधातु समीक्षा, शृंगार, नीति और वैराग्यशतक।