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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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आधार पर इन्हें अमरुक कवि से कुछ पूर्व अर्थात् छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध अथवा संप्तम शती के पूर्वार्द्ध में मानना उचित प्रतीत होता है।

अब हम उपर्युक्त तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में इस विषय पर विचार कर रहे हैं—

१. प्रथम तो हमें विचार करना होगा कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य को परस्पर जोड़ना कितना उचित है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर इतना तो स्पष्ट ही है कि उनका विक्रमादित्य के साथ सम्बन्ध अधिकांश विद्वानों द्वारा तथा जनश्रुतियों में स्वीकार किया गया है।

सिंहासनद्वात्रिंशिका तथा विक्रमांकदेव चरितम् में भर्तृहरि का विशेष उल्लेख करते हुए उन्हें राजा विक्रमादित्य का बड़ा भाई बताया गया है।

हाँ इस विषय में कुछ विद्वान् इन्हें सम्राट् विक्रमादित्य का बड़ा भाई स्वीकार नहीं करते, किन्तु उनके मत में— 'विक्रमादित्य से इन्हें बड़े भाई के समान सम्मान प्राप्त था।'

अतः इतना तो सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य का कोई सम्बन्ध अवश्य था। ई. पू. ५७ में स्थित विक्रमादित्य को भर्तृहरि से जोड़ना इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि उस स्थिति से बाकी किसी भी बात का तालमेल नहीं बैठ पाता है। अतः इन्हें ईसा की सप्तम शती में स्थित विक्रमादित्य मानना ही उचित प्रतीत होता है।

हाँ, इस विषय में इतना अवश्य निश्चय से कहा जा सकता है कि चीनी यात्री इत्सिंग द्वारा उल्लिखित वैयाकरण भर्तृहरि तथा शतकत्रय के रचयिता भर्तृहरि दोनों को एक मानना किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। इसके पक्ष में कुछ तर्क प्रस्तुत हैं—

१. चीनीयात्री इत्सिंग ने भर्तृहरि को बौद्ध मतावलम्बी माना है, किन्तु शतकत्रय का सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करने पर कोई एक भी प्रमाण उनके बौद्ध धर्मावलम्बी होने का प्राप्त नहीं होता, अपितु उनके आधार पर उन्हें वैदिक धर्मावलम्बी शिवभक्त अथवा वैष्णव अवश्य कहा जा सकता है।

२. उनकी रचनाओं में जो भाषा की सरलता दृष्टिगोचर होती है वह किसी वाक्यपदीयकार जैसे उच्चकोटि के वैयाकरण से अपेक्षित प्रतीत नहीं होती, क्योंकि वह अपने व्याकरण विषयक ज्ञान के प्रदर्शन के लोभ संवरण को रोकने में कैसे समर्थ हो सकता था, जाने अन्जाने में उसका प्रदर्शन स्वाभाविक भी था, किन्तु शतकत्रय में कहीं भी ऐसा नहीं हुआ है।

३. इत्सिंग के कथन में भी असत्यता नहीं है। यदि हम वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को शतकत्रय के रचयिता भर्तृहरि से भिन्न मान लेते हैं तो, यह गुत्थी स्वतः ही सुलझ जाती है।