नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
१६६ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
चाटुलः = बहुत बोलने वाला, छिन्धि = काटो, छेत्तुम् = काटने के लिए, छादनम् = छिपाने वाला, जम्बुकम् = गीदड़ को, जल्पकः = बकवादी, जहि = छोड़ दो, जुह्वानम् = हवन करते हुए को, जाड्यम् = मूर्खता को, जातेन = उत्पन्न होने से, जानीमहे = हम जानते हैं, जायते = उत्पन्न होता है, जीवमानः = जीवित रहता हुआ, जुगुप्सितम् = घृणित, ज्ञातिः = सम्बन्धी।
तनिम्ना = दुबलेपन से, तुतुषुः = संतुष्ट हुए, तृणलवप्रायाः = तिनके के टुकड़े के समान, दंष्ट्रांकुर = दाढ़ का अग्रभाग, दम्भः = अभिमान, दरी = कुरूप, गुफा, दाक्षिण्यम् = उदारता, दिवसधूसरः = दिन में मलिनकान्ति, दुधुक्षसि = दुहना चाहते हो, दुर्गतः = दुर्दशा को प्राप्त, दुर्विदग्धः = अभिमानी (व्यक्ति), दौर्मन्त्र्यात् = बुरी सलाह से, धरित्रीम् = पृथ्वी को, धात्रा = विधाता ने, धीवरः = मछुआरा, धृष्टः = ढीठ, ननु = निश्चयपूर्वक, निकृतिम् = अपमान को, निघ्नन्ति = नष्ट करते हैं, नितराम् = अत्यधिक, निधनम् = नाश को, निपत्य = गिरकर, निर्घृणता = निर्दयता, निर्व्याजता = निष्कपटता, निवारयति = रोकता है, निवृत्तः = हटा हुआ, निशितांकुशेण = तीक्ष्ण अंकुश से।
पक्षच्छेदः = पंखों का कटना, पञ्चषाः = पांच, छः, पत्तने = नगर में, पयसां पत्युः = जलों के स्वामी, परार्थम् = दूसरों के लिए, परिक्षीणः = निर्धन, परिग्रहफल्गुताम् = ग्रहण की गई वस्तु की निस्सारता को, परितुष्यति = व्याकुल होती है, परित्यज्य = त्यागकर, परिवाद = निन्दा, परिस्फुरित = देदीप्यमान, परिहर्त्तव्या = त्यागने योग्य, पयोनिधौ = समुद्र में, पर्यंकम् = पलंग को, पर्यटन् = घूमते हुए, पर्वतीकृत्य = पर्वत के समान बनाकर, पादाक्रान्त = पैरों (किरणों) से व्याप्त, पिण्डदस्य = अन्न देने वाले के, पिपासार्दितः = प्यास से व्याकुल, पिशुनता = चुगलखोरी, पीडयन् = दबाता हुआ, पीयूष = अमृत, पुरतः = सामने, पुरा = पहले, पुषाण = पुष्ट करो, पुष्णाति = पुष्ट करता है, प्रच्छादय = छिपाओ, प्रच्छन्नम् = अत्यन्त गुप्त, प्रणयिता = अनुराग करने वाला, प्रतिनिविष्ट = दुराग्रही और हठी, प्रतिपाद्यमानम् = दिया जाता हुआ, प्रथयति = विस्तार करती है, प्रभवति = प्रभावशाली होता है, प्रमादात् = आलस्य से, प्रमार्ष्टुम् = मिटाने के लिए, प्रययुः = प्राप्त हुए, प्रविचलन्ति = विचलित होते हैं, प्रसह्म = बलपूर्वक, प्रसादोन्मुखः = अनुग्रहशील, प्रसृतये = अंजलि के लिए, प्रहरणम् = अस्त्र, प्राज्ञः = बुद्धिमान्, प्राणाघातात् = प्राणों के विनाश से, प्रीणयन्तः = प्रसन्न करते हुए, प्रीणयेत् = प्रसन्न करे, बलभित् = इन्द्र, ब्रूहि = बोलो,
भिक्षाटनम् = भिक्षा के लिए घूमना, भागधेयम् = सौभाग्य, भाव्यम् = जो होना है, भुङ्क्ते = खाता है, भूरि = अनेक, भोगकरी = भोगों को देने वाली, भोगिनः = सर्प, भ्राम्यति = घूमता है, मज्जतु = डूब जाए, मण्डिता = सुशोभित, मतिमताम् = बुद्धिमानों की, महार्णवे = समुद्र में, महार्हैः = बहुमूल्य, मानोन्नतिम् = सम्मान और उन्नति को,
नीतिशतकम् १६७
मार्जितुम् = पोंछने के लिए, मूकभावः = चुप रहना, मूर्धजाः = केश, मूर्ध्नि = सिर पर, मृगाश्चरन्ति = पशु विचरण कर रहे हैं, म्लानेन्द्रियस्य = शिथिल इन्द्रियों वाले का।
यथेष्टम् = इच्छानुसार, यशः काये = यश रूपी शरीर में, योजयते = लगाता है, रञ्जयति = प्रसन्न करता हैं, रजताद्रिणा = चाँदी के पर्वत द्वारा, रुचिराकारः = सुन्दर आकृति वाला, रोद्धुम् = रोकने के लिए, लब्ध्वा = प्राप्त करके, लाङ्गलाग्रैः = हलों के अग्रभागों द्वारा, लाङ्गूल = पूँछ, लालनात् = लाड प्यार से, लालाक्लिन्नम् = लार से भीगा हुआ, लुनन्ति = काटते हैं, लुब्धक = बहेलिया, लोकस्थितिः = लोक मर्यादा, लोकापवात् = लोक निन्दा से।
वनचरैः = वनवासियों के द्वारा, वयः = आयु, वहल = घनी, वाञ्छति = चाहता है, वाञ्छा = इच्छा, वारणम् = रोकने वाला, वारणानाम् = हाथियों का, वाराङ्गना = वेश्या, विकचीकरोति = खिलाता है, विगन्धि = दुर्गन्धयुक्त, वित्तवत्सु = धनवानों में, विद्याख्य = विद्यानाम वाला, विद्यावदातम् = विद्या से उज्ज्वल, विनिपातः = पतन, विनिर्मितम् = बनाया गया, विभाति = सुशोभित होता है, विमतिता = बुद्धिहीनता, विमृशन्तः = सोचते हुए, विरमन्ति = रुक जाते हैं, विलिखति = खोदता है, विलोकयति = देखता है, विशिखाः = बाण, विशीर्यते = नष्ट हो जाता है, विषमम् = कठोर, विषये = राज्य में, विष्टपं = संसार, विहीनम् = रहित, वैदग्ध्यकीर्तिम् = निपुणता के यश को, व्यालं = हाथी को, व्यसनम् = शौक, व्यपगत = दूर हो गया।
शक्त्या = शक्ति के अनुसार, शतमुखः = सैकड़ों प्रकार से, शल्यतुल्यः = कांटे के समान, शाठ्यम् = दुष्टता, शाणोल्लीढः = शान पर चढ़ाई हुई, शाम्यति = शान्त हो जाता है, शार्वम् = शिव को, शाल्योदन = भात, शास्त्रोपस्कृत = शास्त्रों द्वारा शोधित, शिखरिणाम् = पर्वतों का, शीर्यते = नष्ट हो जाती है, शीर्षावशेषाकृतिः = सिर मात्र शेष आकृति वाला, शीलम् = अच्छा स्वभाव, शुचौ = पवित्रता में, शैलतटात् = पर्वत की चोटी से, श्यानपुलिनाः = सूखे तटों वाली, श्वा = कुत्ता, श्रुतौ = वेदों में, श्रूयताम् = सुनो।
संघात = समूह, संदह्यताम् = जला डाले, संनह्यते = सन्नद्ध होता है, संरुणद्धि = रोकती है, सञ्चितानि = एकत्रित, सन् = होते हुए, सत्त्ववतां = शक्तिशाली लोगों का, सत्वानुरूपम् = स्वभाव के अनुरूप, सदसि = सभा में, सन्तप्यन्ते = दुःखी होते हैं, समक्रियाम् = समान आचरण वाला, समन्तात् = चारों ओर, समाविशतु = प्रवेश करे, समुन्मीलति = प्रकट होता है, सम्पातः = गिरना, सम्भाविताः = प्रतिष्ठित।
सिकतासु = बालू में, सिञ्चति = सींचती है, सुकृत = अच्छी प्रकार किया गया, सुकृतिनः = पुण्यात्मा, सुचरितैः = सुन्दर आचरणों से, सुजनता = सज्जनता,
१६८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
सुधास्यन्दिभिः = अमृतवर्षी, सुरतमृदिता = सम्भोग में मर्दन की गई, सूनुः = पुत्र, सूर्यातपः = सूर्य की धूप, सृजति = रचना करता है।
स्पृष्टः = स्पर्श किया गया, स्युः = होने चाहिएँ, स्पृहा = इच्छा, हतविधेः = दुष्ट विधाता, हर्तुः = हरण करने वाले के, ह्रीमति = लज्जा से, हुत्भुक् = अग्नि, हेतिनिहतः = शस्त्रों द्वारा घायल।
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ | श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अकरुणत्वम् | ५१ | ६७ | छिन्नोऽपि रोहति | ९३ | १२१ |
| अज्ञः सुखमाराध्यः | ४ | ४ | जयन्ति ते | २५ | ३३ |
| अधिगतपरमार्थान् | १८ | २२ | जाड्यं धियो हरति | २४ | ३२ |
| अप्रियवचन दरिद्रैः | ७१ | ९४ | जाड्यं हिमर्ति | ५३ | ६९ |
| अम्भोजिनी वारविलास | १९ | २४ | जात कूर्मः सः | ८१ | १०६ |
| अयममृतनिधानं | १०२ | १३३ | जातिर्यातु रसातलं | ४० | ५२ |
| आज्ञाकीर्तिः पालनं | ४८ | ६४ | तानीन्द्रियाणि | ५० | ६६ |
| आरम्भगुर्वी क्षयिणी | ५९ | ७८ | तृष्णां छिन्धि भज | ८२ | १०८ |
| आलस्यं हि मनुष्याणां | १२१ | १५९ | त्वमेव चातकाधारो | ७३ | ९५ |
| इतः स्वपिति केशवः | ८० | १०४ | दानं भोगो नाशः | ४३ | ५७ |
| उद्भासिताखिलखलस्य | ५८ | ७६ | दाक्षिण्यं स्वजने | २३ | ३० |
| एकेनापि हि शूरेण | ३८ | ५० | दिक्कालाद्यनवच्छिन्न | १ | १ |
| एके सत्पुरुषाः | ७७ | १०० | दुर्जनः परिहर्तव्यः | ५२ | ६८ |
| एको देवः केशवो | ७२ | ९५ | देवेन प्रभुणा स्वयं | १०५ | १२९ |
| ऐश्वर्यस्य विभूषणं | ९४ | १२२ | दौर्मन्त्र्यान्नृपतिः | ४२ | ५५ |
| कदर्थितस्यापि हि | ९० | ११८ | न कश्चिच्चण्डकोप | ५६ | ७४ |
| करे श्लाघ्यस्त्यागः | ६३ | ८२ | नमस्यामो देवान् | ११० | १४४ |
| कर्मायत्तं फलं पुंसां | १२० | १५८ | नम्रत्वेनोन्नमन्तः | ७० | ९२ |
| कान्ताकटाक्षविशिखाः | ६७ | ११४ | निन्दन्तु नीतिनिपुणा | ८९ | ११६ |
| कृमिकुलचितं | १० | १२ | नेता यस्य बृहस्पतिः | ९६ | १२५ |
| किं तेन हेमगिरिणा | ८४ | ११० | नैवाकृतिः फलति | ११६ | १५३ |
| कुसुमस्तबकस्येव | ३१ | ४२ | पत्रं नैव यदा | १०८ | १४१ |
| केयूराणि न भूषयन्ति | २० | २५ | पद्माकरं दिनकरो | ७६ | ९९ |
| को लाभो गुणिसंगमः | २६ | ३५ | परिक्षीणः कश्चित् | ४५ | ५९ |
| क्वचित्भूमौ शय्या | ८८ | ११५ | परिवर्तिनि संसारे | ३० | ४१ |
| क्षान्तिश्चेत् | २२ | २९ | पतितोऽपि कराघातैः | १०६ | १३९ |
| क्षुत्क्षामोऽपि | २७ | ३६ | पापात्निवारयति | ७८ | १०२ |
| क्षीरेणात्मगतो | ७९ | १०२ | प्रदानं प्रच्छन्नं | ६७ | ८६ |
| खल्वाटो दिवसे | ९९ | १३० | प्रसह्य मणिमुद्धरेत् | ५ | ५ |
| गुणवद्गुणवद्वा | ११४ | १५८ | प्राणाघातान्निवृत्तिः | ६४ | ८४ |
१७० •श्रीभर्तृहरिविरचितम्
| श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ | श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रारभ्यते न खलु | ८६ | ११३ | लोभश्चेदगुणेन किं | ५४ | ७१ |
| प्रिय सखे विपद् | १०३ | १३४ | वने रणे शत्रुः | ११८ | १५६ |
| प्रिया न्याय्यावृत्तिः | ६६ | ८६ | वरं पक्षच्छेदः | ३४ | ४६ |
| बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः | ३ | ३ | वरं पर्वतदुर्गेषु | १५ | १९ |
| ब्रह्मा येन कुलाल | १११ | १४६ | वरं शृङ्गोत्संगात् | ९१ | ११८ |
| भग्नाशस्य करण्ड | ९७ | १२७ | वहति भुवनश्रेणीं | ३३ | ४४ |
| भवन्ति नम्रास्तरवः | ७४ | ९६ | वह्निस्तस्य जलायते | ९२ | १२० |
| भीमं वनं भवति | ११९ | १५७ | वाञ्छा सज्जनसंगमे | ६१ | ८० |
| मज्जत्वम्भसि | ११७ | १५५ | विद्या नाम नरस्य रूपं | २१ | २७ |
| मणिः शाणोल्लीढः | ४४ | ५३ | विपदि धैर्यमथा | ६२ | ८१ |
| मनसि वचसि काये | ८३ | १०९ | विरम विरमायासाद् | १०४ | १३६ |
| मालती कुसुमस्येव | ३७ | ४९ | व्यालं बालमृणाल | ७ | ८ |
| मृगमीनसज्जनानां | ६० | ७९ | शक्यो वारयितुं | १२ | १५ |
| मौनान्मूकः प्रवचन | ५७ | ७० | शशिदिवाकरयोः | १०७ | १४० |
| यथा कन्दुकपातेन | ९८ | १२९ | शशीदिवसधूसरो | ५५ | ७३ |
| यदचेतनोऽपि | ३५ | ४८ | शास्त्रोपस्कृतशब्द | १६ | १९ |
| यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं | ९ | ११ | शिरः शार्वं स्वर्गात् | ११ | १४ |
| यद् धात्रा निजभालपट्ट | ४९ | ६५ | शुभ्रं सद्मसविकमा | ११३ | १४९ |
| यः प्रीणयेत्सुचरितैः | ६९ | ९१ | श्रोत्रं श्रुतेनैव | ७५ | ९८ |
| यस्यास्ति वित्तं | ४१ | ५३ | सत्यानृता च | ४७ | ६२ |
| यां चिन्तयामि सततं | २ | २ | सन्तप्तायसि | ६८ | ९० |
| यां साधूंश्च खलान् | ११२ | १४७ | सन्त्यन्येऽपि | ३२ | ४३ |
| येनैवाम्बरखण्डेन | १०१ | १३२ | सम्पत्सु महतां | ६५ | ८६ |
| येषां न विद्या | १४ | १८ | साहित्यसंगीतकला० | १३ | १७ |
| रत्नैर्महार्हैः | ८५ | १११ | सिंहशिशुरपि | ३६ | ४८ |
| राजन्दुधुक्षसि | ४६ | ६१ | सूनुः सच्चरितः | १०९ | १४२ |
| रे-रे चातक सावधान | ९५ | १२४ | सृजति तावदशेष | १०० | १३१ |
| लज्जागुणौघजननीं | ३९ | ५१ | स्थाल्यां वैदुर्य | ११५ | १५२ |
| लभेत सिकतासु | ६ | ७ | स्वल्पस्नायुवसा | २८ | ३८ |
| लाङ्गूलचालनमधः | २९ | ४० | स्वायत्तमेकान्त | ८ | १० |
| हर्तुर्याति | १७ | २१ |
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