नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यवहारसमुद्देशः १५१ विलास भोग में रत होना वेश्यागामी की पवित्रता तथा तत्त्वज्ञान अर्थात् ब्रह्मज्ञान से पूर्व जानने योग्य बातों को जाने बिना तत्त्वज्ञान के लिये आग्रह करना ये पांच किसके लिये 'शिरदर्द' नहीं होते अर्थात् इन बातों से सबको कष्ट होता है । स हि पञ्च-महापातकी योऽशस्त्रमशास्त्रं वा पुरुषमभियुञ्जीत ॥३४॥ जो व्यक्ति शस्त्र रहित अथवा शास्त्र ज्ञान से शून्य पुरुष से युद्ध अथवा शास्त्रार्थ के लिये प्रवृत्त होता है उसे पांच महापापों के करने का पाप होता है । स्त्री, बालक, गो, ब्राह्मण और अपना स्वामी इनका वध पंच महा- पातक है । उपश्रुति श्रोतुमिव कार्यवशान्नीचमपि स्वयमुपसर्पेत् ॥ ३५ ॥ उपश्रुति सुनने के समान ही कार्य-वश नीच के घर भी स्वयं जाना चाहिए । नक्तं निर्गत्य यत्किञ्चिच्छुभाशुभकरं वचः । श्रूयते तद्विदुर्वीरा दैवप्रश्नमुपश्रुतिम् ॥ ( हारावली ) भविष्य का शुभ अशुभ बताने के लिये देवगण रात्रि में कुछ शब्द करते हैं इस विश्वास से रात्रि के समय घर से निकल कर उस शब्द को सुनने के लिये जो गम्य अगम्य स्थान पर जाकर उस शकुन को सुनते हैं उस दैव प्रश्न को विद्वान् उपश्रुति कहते हैं । वेश्यागमो गृहिणीं गृहपति वा प्रत्यवसादयति ॥ ३६ ॥ वेश्या के समागम से गृहिणी अथवा गृहपति का विनाश हो जाता है । वेश्यासंग्रहो देवद्विजगृहिणीबन्धूनामुच्चाटनमन्त्रः ॥ ३७ ॥ वेश्या से व्यवहार रखना देवता, ब्राह्मण अपनी स्त्री और बन्धुओं के लिये उच्चाटन मन्त्र के प्रयोग के समान है । अहो लोकस्य पापं यन्निजस्त्री रतिरपि भवति निम्बसमा, परगृहीता शुन्यपि भवति रम्भासमा ॥ ३८ ॥ पाप के विषय में लोगों की यह कैसी विडम्बना है कि कामदेव की स्त्री रति के समान भी अपनी स्त्री नीम के समान कड़वी अथवा अप्रिय लगती है और परपुरुष की स्त्री कुतिया के समान क्षुद्र होने पर भी रम्भा देवलोक की अप्सरा के समान प्रिय लगती है । स सुखी यस्य एकदैव दारपरिग्रहः ॥ ३६ ॥ सुखी वही है जिसकी एक ही स्त्री होती हैं ।