नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ नीतिवाक्यामृतम् व्यसनिनो यथा अभिसारिकासु सुखं न तथा अर्थवतीषु ॥ ४० ॥ लम्पट पुरुष को व्यभिचारिणी अभिसारिका से जैसा सुख मिलता है वैसा वेश्या से नहीं । महान् धन-व्ययस्तदिच्छानुवर्त्तनं दैन्यं चार्थवतीषु ॥ ४१ ॥ वेश्या के यहां जाने में बहुत धन का व्यय करना पड़ता है, उसकी इच्छा का अनुसरण करना होता है और विनम्र याचक बनना होता है । आस्तरणं, कम्बलो, जीवधनं, गर्दभः, परिग्रहो, वोढा, सर्वकर्माणश्च भृत्या इति कस्य नाम न सुखावहानि ॥ ४२ ॥ बिस्तर, कम्बल, पशुधन-गायबैल आदि, गदहा, स्त्री, बोझ ढोने वाला और सब प्रकार का काम करनेवाला सेवक ये किसके लिये सुखदायक नहीं होते ! अर्थात् इनसे सबको सुख मिलता है । न दारिद्र्यात् परं पुरुषस्य लाञ्छनमस्ति यत्संगेन सर्वे गुणा निष्फलतां यान्ति ॥ ४३ ॥ पुरुष के लिये दरिद्रता से बढ़कर दूसरा कोई कलंक नहीं है, जिसके संयोग से उसके सब गुण निष्फल हो जाते हैं । अलब्धार्थोऽपि लोको धनिनो भाण्डो भवति ॥ ४४ ॥ धन न मिलने पर भी लोग धनी पुरुष के सहायक हो जाते हैं । धनिनो यतयोऽपि चाटुकाराः ॥ ४५ ॥ सन्यासी भी धनी की चाटुकारिता-खुशामद करते हैं । न रत्नहिरण्यपूताज्जलात् परं पावनमस्ति ॥ ४६ ॥ रत्न और सुवर्ण से पवित्र किये गये जल से बढ़कर दूसरा कोई पवित्र करनेवाला पदार्थ नहीं है । स्वयं मेध्या आपो वह्नितप्ता विशेषतः ॥ ४७ ॥ जल स्वयं पवित्र है किन्तु अग्नि पर गरम किया गया जल विशेषरूप से पवित्र हैं । स एवोत्सवो यत्र बन्दिमोक्षो दीनोद्धरणं च ॥ ४८ ॥ उत्सव वही है जिसमें बन्दी छोड़े जायें और दीनों का उद्धार किया जाय । तानि पर्वाणि येष्वतिथिपरिजनयोः प्रकामं सन्तर्पणम् ॥ ४६ ॥ पर्व, त्योहार के वही दिन हैं जिनमें अतिथि और सेवकगण खिलापिला- कर पूर्ण रूप से सन्तुष्ट किये जायं । तास्तिथयो यासु नाधर्माचरणम् ॥ ५० ॥ प्रतिपद आदि तिथियों में मनुष्य के लिये वही तिथि तिथि है जिसमें वह किसी प्रकार का अधर्म का कार्य न करे ।