भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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व्यवहारसमुद्देशः १५३ सा तीर्थयात्रा यस्यामकृत्यनिवृत्तिः ॥ ५१ ॥ तीर्थ यात्रा वही सफल है जिसमें मनुष्य दुष्कृत्य का परित्याग कर दे । तत् पाण्डित्यं यत्र वयोविद्योचितमनुष्ठानम् ॥ ५२ ॥ पाण्डित्य वही सफल है जिसमें अवस्था और विद्या के अनुरूप आचरण किया जाय । तच्चातुर्यं यत् परप्रीत्या कार्यसाधनम् ॥ ५३ ॥ चतुराई वही है जिसमें दूसरे को प्रसन्न रख कर अपना कार्य सिद्ध किया जाय । तल्लोकोचितत्वं यत् सर्वजनादेयत्वम् ॥ ५४ ॥ लोकोचित वही कर्म है जिससे मनुष्य सबका प्रिय पात्र बन जाय । तत् सौजन्यं यत्र नास्ति परोद्वेगः ॥ ५५ ॥ सज्जनता वही है जिसमें दूसरे को किसी प्रकार का उद्वेग ( भय और त्रास ) न प्रतीत हो । तद्धीरत्वं यत्र यौवने नापवादः ॥ ५६ ॥ धीरता वही है जिसमें युवावस्था में कोई अपयश न हो । तत्सौभाग्यं यत्रादानेन वशीकरणम् ॥ ५७ ॥ मनुष्य का सौभाग्य वही है कि वह किसी को कुछ दे भी नहीं और लोग उसके वश में रहें । सा सभारण्यानी यस्यां न सन्ति विद्वांसः ॥ ५८ ॥ वह सभा अरण्यस्थली है जिसमें विद्वान् न हों । किं तेनात्मनः प्रियेण यस्य न भवति स्वयं प्रियः ॥ ५६ ॥ कोई व्यक्ति अपना प्रिय तो हो, किन्तु उसके लिये आप प्रिय न हों तो उस प्रियता से क्या लाभ ? अर्थात् प्रीति दोनों ओर से समान होनी चाहिए । स किं प्रभुर्यो न सहते ॰परिजनसम्बाधम् ॥ ६० ॥ वह स्वामी श्लाघनीय नहीं है जो सेवकों की बाधाओं और आवश्यकताओं को नहीं सहन कर सकता, अर्थात् सेवकों की आवश्यकता के अनुकूल यदि व्यय न कर सके तो वह स्वामी ठीक नहीं है । न लेखाद्वचनं प्रमाणम् ॥ ६१ ॥ लेख से बढ़कर वचन को प्रमाण नहीं माना जाता । अनभिज्ञाते लेखेऽपि नास्ति सम्प्रत्ययः ॥ ६२ ॥ बिना हस्ताक्षर आदि का अपरिचित लेख भी विश्वसनीय नहीं होता । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu