भारतकोश
संग्रह पर लौटें

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

व्यवहारसमुद्देशः १५३ सा तीर्थयात्रा यस्यामकृत्यनिवृत्तिः ॥ ५१ ॥ तीर्थ यात्रा वही सफल है जिसमें मनुष्य दुष्कृत्य का परित्याग कर दे । तत् पाण्डित्यं यत्र वयोविद्योचितमनुष्ठानम् ॥ ५२ ॥ पाण्डित्य वही सफल है जिसमें अवस्था और विद्या के अनुरूप आचरण किया जाय । तच्चातुर्यं यत् परप्रीत्या कार्यसाधनम् ॥ ५३ ॥ चतुराई वही है जिसमें दूसरे को प्रसन्न रख कर अपना कार्य सिद्ध किया जाय । तल्लोकोचितत्वं यत् सर्वजनादेयत्वम् ॥ ५४ ॥ लोकोचित वही कर्म है जिससे मनुष्य सबका प्रिय पात्र बन जाय । तत् सौजन्यं यत्र नास्ति परोद्वेगः ॥ ५५ ॥ सज्जनता वही है जिसमें दूसरे को किसी प्रकार का उद्वेग ( भय और त्रास ) न प्रतीत हो । तद्धीरत्वं यत्र यौवने नापवादः ॥ ५६ ॥ धीरता वही है जिसमें युवावस्था में कोई अपयश न हो । तत्सौभाग्यं यत्रादानेन वशीकरणम् ॥ ५७ ॥ मनुष्य का सौभाग्य वही है कि वह किसी को कुछ दे भी नहीं और लोग उसके वश में रहें । सा सभारण्यानी यस्यां न सन्ति विद्वांसः ॥ ५८ ॥ वह सभा अरण्यस्थली है जिसमें विद्वान् न हों । किं तेनात्मनः प्रियेण यस्य न भवति स्वयं प्रियः ॥ ५६ ॥ कोई व्यक्ति अपना प्रिय तो हो, किन्तु उसके लिये आप प्रिय न हों तो उस प्रियता से क्या लाभ ? अर्थात् प्रीति दोनों ओर से समान होनी चाहिए । स किं प्रभुर्यो न सहते ॰परिजनसम्बाधम् ॥ ६० ॥ वह स्वामी श्लाघनीय नहीं है जो सेवकों की बाधाओं और आवश्यकताओं को नहीं सहन कर सकता, अर्थात् सेवकों की आवश्यकता के अनुकूल यदि व्यय न कर सके तो वह स्वामी ठीक नहीं है । न लेखाद्वचनं प्रमाणम् ॥ ६१ ॥ लेख से बढ़कर वचन को प्रमाण नहीं माना जाता । अनभिज्ञाते लेखेऽपि नास्ति सम्प्रत्ययः ॥ ६२ ॥ बिना हस्ताक्षर आदि का अपरिचित लेख भी विश्वसनीय नहीं होता । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

१५४ नीतिवाक्यामृतम् त्रीणि पातकानि सद्यः फलन्ति, स्वामिद्रोहः, स्त्रीवधो बालवध- श्चेति ॥ ६३ ॥ अपने स्वामी से द्रोह, स्त्री और बालक का वध ये तीन पाप तत्काल अनिष्ट फलदायक होते हैं । अप्लवस्य समुद्रावगाहनमिवाबलस्य बलवता सह विग्रहाय टिरिटि- ल्लितम् ॥ ६४ ॥ बिना नाव के समुद्र में प्रवेश के समान निर्बल का बलवान् के साथ वैर विनाशकारी होता है । बलवन्तमाश्रित्य विकृति-भजनं सद्यो मरणकारणम् ॥ ६५ ॥ बलवान् के आश्रय में रहकर उससे बिगाड़ करना तत्काल मरण का कारण होता है । प्रवासः चक्रवर्त्तिनमपि सन्तापयति किं पुनरन्यम् ॥ ६६ ॥ प्रवास चक्रवर्तियों को भी दुःख देता है तो स्वल्प साधन सम्पन्न दूसरों को क्यों न दुःखकर होगा । अर्थात् परदेश में सबको क्लेश होता है । बहुपाथेयं, मनोऽनुकूलः परिजनः, सुविहितश्चोपस्करः प्रवासे दुःखो- त्तरणतरण्डको वर्गः ॥ ६७ ॥ पाथेय ( रास्ते का कलेवा ) प्रचुर मात्रा में हो मन के अनुकूल सेवक हों, प्रवास की सब सामग्री सुव्यवस्थित रूप से हो इतनी वस्तुएँ प्रवास रूप समुद्र में दुःखों से उद्धार पाने के लिए जहाज के समान हैं । [ इति व्यवहार-समुद्देशः ] २८. विवाद-समुद्देशः गुणदोषयोस्तुलादण्डसमो राजा, स्वगुणदोषाभ्यां जन्तुषु गौरव- लाघवे ॥ १ ॥ विवाद में गुण और दोषों का निर्णय करने के लिये राजा तराजू की डांडी के समान निर्णायक है और प्रजा की गुरुता और लघुता—निर्दोष अथवा सदोष सिद्ध होना उसके अपने गुण दोषों पर निर्भर करता है । राजा त्वपराद्धालिङ्गितानां समवर्त्ती तत्फलमनुभावयति ॥ २ ॥ राजा पुत्र और सामान्य प्रजा में समदृष्टि होकर अपराधियों को उनके अपराधों के अनुकूल फल-दण्ड-का भोग कराता है—विधान बनाता है। आदित्यवद्यथावस्थितार्थप्रकाशनप्रतिभाः सभ्याः ॥ ३ ॥

विवादसमुद्देशः १५५ राजा की सभा के सभासद सूर्य के समान यथार्थ तत्त्व को प्रकाशित करने की प्रतिभा से सम्पन्न होते हैं । अदृष्टश्रुतव्यवहाराः परिपन्थिनः सामिषाः न सभ्याः ॥ ४ ॥ लोक व्यवहार (कानून) के अनुभव और अध्ययन से शून्य वादी प्रति- वादी अथवा राजा के शत्रु एवं सहज ईर्ष्या द्वेषयुक्त व्यक्ति राजा के न्यायालय के सदस्य होने योग्य नहीं होते । लोभपक्षपाताभ्यामयथार्थवादिनः सभ्याः सभापतिश्च सद्यो मानार्थ- हानिं लभेरन् ॥ ५ ॥ लोभ अथवा पक्षपातपूर्ण दृष्टि के कारण अयथार्थवादी—ठीक निर्णय न देनेवाले सभासदों और सभापति-न्यायाधीश अथवा राजा की तत्काल मान- हानि और अर्थहानि होती है । तत्रालं विवादेन यत्र स्वयमेव सभापतिः प्रत्यर्थी ॥ ६ ॥ जिस विवाद में स्वयं सभापति=न्यायाधीश ही विरोधी अथवा पक्षपात- पूर्ण हो जाय वह विवाद अथवा मुकदमा व्यर्थ है । क्योंकि न्यायाधीश के अनु- कूल सब सभासद बोलेंगे । सभ्यसभापत्योरसामञ्जस्येन कुतो जयः, किं बहुभिश्च्छगलः श्वा न क्रियते ॥ ७ ॥ सभासदों और सभापति में जब ऐकमत्य न होगा तब विजय की आशा करना व्यर्थ है । क्या बहुत से आदमी कह कर बकरे को कुत्ता नहीं बना देते । यहां हितोपदेश की उस कथा का सन्दर्भ है जिसमें एक ब्राह्मण जब बकरे को लादे हुए जा रहा था तब धूर्तों ने सलाह करके उस बकरे को अपने खाने के लिये छीनना चाहा । वे एक एक करके थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़े हो गये और अपने पास आते ही उस ब्राह्मण से कहते हैं कि क्या ब्राह्मण होकर कुत्ते को ढोते फिरते हो ? इस प्रकार लगातार कई आदमियों के कहने पर ब्राह्मण को संशय हो गया और उसने बकरे को मार्ग में ही छोड़ दिया जिसे धूर्त लोग ले गये । मुकदमें में भी जब बहुसंख्यक सभासद किसी असत् पक्ष को भी सत् सिद्ध करने लगेंगे तो उन्हीं की जीत होगी । पराजित व्यक्ति के चिह्न— विवादमास्थाय यः सभायां नोपतिष्ठेत, समाहूतोऽपसरति, पूर्वोक्त- मुत्तरोक्तेन बाधते, निरुत्तरः पूर्वोक्तेषु युक्तेषु, युक्तमुक्तं न प्रतिपद्यते, स्वदोषमनुवृत्य परदोषमुपालभते, यथार्थवादेऽपि द्वेष्टि सभामिति परा- जितलिङ्गानि ॥ ७ ॥

१५६ नीतिवाक्यामृतम् विवाद-मुकदमा प्रारम्भ करके जो न्यायालय में उपस्थित न हों, पुकार होने पर चला जाय, उसका प्रथम वक्तव्य आगे के वक्तव्य से विरुद्ध पड़ता हो, पूर्वकथित युक्तियुक्त बात का उत्तर देने में असमर्थ हो और युक्तियुक्त को न माने, अपना दोष न मान कर दूसरे का दोष निकाले यथार्थ न्याय होने पर भी न्यायालय का अनौचित्य बतलावे यह सब पराजित के लक्षण हैं। छलेनाप्रतिभासेन ✻ वचनाकौशलेन चार्थहानिः ॥ ८ ॥ विवाद में यदि सभासद छलकपट करें, अथवा अभियोग के विषय में ठीक परामर्श और अनुसन्धान न करें बोलने में निपुण न हों तो वादी प्रति- वादी की व्यर्थ हानि होती है । भुक्तिः, साक्षी, शासनं प्रमाणम् ॥ ६ ॥ विवाद में तीन चीज प्रमाण मानी जाती है भुक्ति अर्थात् जमीन जायदाद पर बारह वर्ष तक का कब्जा, गवाह, और न्यायालयीय लेख दस्ता- वेज आदि । भुक्तिः सापवादा, साक्रोशाः साक्षिणः शासनं च कूटलिखितमिति न विवादं समापयन्ति ॥ १० ॥ अधिकार अथवा कब्जा बलात् किया गया हो, गवाह सदोष हों, और (दस्तावेज) अधिकार पत्र साफ लिखा पढ़ा न हो तो विवाद का मुकदमे का अन्त नहीं हो पाता । बलात्कृतमन्यायकृतं राजोपधिकृतं च न प्रमाणम् ॥ ११ ॥ जो बात बलात् कराई गई हो, अन्याय से हुई हो अथवा राज-बल से हुई हो वह प्रमाणभूत नहीं होती । वेश्याकितवयोरुक्तं ग्रहणानुसारितया प्रमाणयितव्यम् ॥ १२ ॥ वेश्या और जुआड़ी का वचन जितना ग्राह्य हो उतना प्रमाणित मानना चाहिये । असत्यंकारे व्यवहारे नास्ति विवादः ॥ १४ ॥ सर्वथा झूठे व्यवहार में विवाद नहीं होता । अर्थात् जब वादीप्रतिवादी दोनों ही झूठे होंगे तो अभियोग क्या चलेगा ? । नीवीविनाशेषु विवादः पुरुषप्रामाण्यात् सत्यापयितव्यो दिव्य- क्रिया वा ॥ १४ ॥ धरोहर के रूप में रखे गये मूलद्रव्य (पूंजी) के विवाद में जिसके यहां वह वस्तु रखी गई अथवा जिसने रखी उस पुरुष की विख्यात प्रामा- ✻ प्रतिभास के अनुसन्धान और परामर्श अर्थ के लिये देखिए काव्य प्रकाश दशम उल्लास प्रारम्भ—वाच्यवैचित्र्यप्रतिभासादेव पर वामन टीका ॥

विवादसमुद्देशः १५७ णिकता अप्रामाणिकता के आधार पर सत्य का निर्णय करना चाहिए अथवा शपथ ग्रहण अथवा दण्ड के द्वारा सत्य का निर्णय करना चाहिए। यादृशे तादृशे वा साक्षिणि नास्ति दैवी क्रिया किं पुनरुभयसम्मते मनुष्ये नीचेऽपि ॥ १५ ॥ जब कि जैसे-तैसे अर्थात् साधारण अथवा निकृष्ट चरित्र के गवाह से शपथ नहीं कराई जाती तब वादी और प्रतिवादी दोनों से सम्मत नीच गवाह से शपथ कैसे कराई जायगी। यः परद्रव्यमभियुञ्जीताभिलुम्पते वा तस्य शपथः क्रोशो दिव्यं वा ॥ १६ ॥ जो कोई दूसरे का द्रव्य अपहरण कर ले अथवा नष्ट करदे तो उस विवाद में शपथ, कुड़की अथवा दण्ड का भय दिखाकर निर्णय करना चाहिए। अभिचारयोगैर्विशुद्धस्याभियुक्तार्थसंभावनायां प्राणावशेषोऽर्थाप- हारः ॥ १७ ॥ शपथ आदि प्रयोगों के द्वारा अपने को निर्दोष सिद्ध करनेवाले व्यक्ति का अपराध यदि पुनः सिद्ध हो तो उसके प्राणों को छोड़कर उसका शेष समस्त धन राजा को ग्रहण कर लेना चाहिए। लिङ्गिनास्तिकस्वाचाराच्च्युतपतितानां दैवी क्रिया नास्ति ॥ १८ ॥ संन्यासी, वैरागी आदि चिह्नधारी, नास्तिक और अपने आचार से भ्रष्ट तथा पतित पुरुषों के वाद-विवाद के निर्णय में शपथ क्रिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये झूठी शपथ भी ले लेते हैं। तेषां युक्तितोऽर्थसिद्धिरसिद्धिर्वा ॥ १९ ॥ उनके विवाद का निर्णय युक्तियों द्वारा करके उनको दोषी अथवा निर्दोष ठहरावे। सन्दिग्धे पत्रे साक्ष्ये वा विचार्य परिच्छिन्द्यात् ॥ २० ॥ दस्तावेज आदि शासकीय अभिलेख अथवा गवाह जब सन्दिग्ध हों तब बहुत विचारपूर्वक निर्णय करना चाहिए। परस्परविवादे न युगैरपि विवादसमाप्तिरानन्त्याद् विपरीतप्रत्युक्ती- नाम् ॥ २१ ॥ वादी प्रतिवादी यदि स्वयं ही तर्क-वितर्क (बहस) करने लगे तो प्रश्नों और उत्तरों तथा युक्तियों की अनन्तता के कारण युगों तक अभियोग का निर्णय नहीं हो सकता अतः धर्माधिकारी अथवा वकीलों के माध्यम से विवाद का निर्णय करना चाहिए।

१५८ नीतिवाक्यामृतम् ग्रामे पुरे वा वृत्तो व्यवहारस्तस्य विवादे तथा राजानमुपेयात् ॥२२॥ ग्राम अथवा तहसील में झगड़ा निपट जाने पर भी यदि पुनः विवाद उपस्थित हो जाय तो ऐसे विवाद में राजा के पास आना चाहिए। राज्ञा दृष्टे व्यवहारे नास्त्यनुबन्धः ॥ २३ ॥ राजा के द्वारा अभियोग का निर्णय हो जाने पर अपील नहीं होती। अनुबन्ध का अर्थ दोष किया गया है जिसके अनुसार अर्थ होगा राजाके निर्णय में दोष नहीं होता। राजाज्ञां मर्यादाम् वाऽतिक्रामन् सद्यः फलेन दण्डेनोपहन्तव्यः ॥२४॥ राजा की आज्ञा अथवा न्याय की मर्यादा का उल्लङ्घन करने वालेको तात्कालिक दण्ड से दण्डित करना चाहिए। न हि दण्डादन्योऽस्ति विनयोपायोऽग्निसंयोग एव वक्रं काष्ठं सर- लयति ॥ २५ ॥ प्रजा को अनुशासन में लाने के लिये दण्ड के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। टेढ़ा काष्ठ अग्नि के संयोग से ही सीधा होता है। ऋजुं सर्वेऽपि परिभवन्ति नहि तथा वक्रः संछिद्यते यथा सरलः ॥ २६ ॥ सीधे को सब दबा लेते हैं। वन में खड़ा टेढ़ा पेड़ वैसा नहीं काटा जाता जैसा कि सीधा। स्वोपालम्भपरिहारेण परमुपालभेत स्वामिनमुत्कर्षयन् गोष्ठीमव- तारयेत् ॥ २७ ॥ राजा की ओर से नियुक्त धर्माधिकारी सरकारी वकील को राजकीय पक्ष को प्रबल सिद्ध करते हुए राज्य के ऊपर लगाया गया आरोप दूर कर दूसरे को दोषी ठहराते हुए समझौता करा देना चाहिए। न हि भर्तुरभियोगात् परं सत्यमसत्यं वा वदन्तम् अवगृह्णीयात् ॥ २८ ॥ स्वामी का पक्षपात करके सत्य अथवा असत्य कहनेवाले के अनुसार किसी को दोषी नहीं सिद्ध करना चाहिए। अर्थात् राजनियुक्त पुरुष को विवाद में पक्षपात नहीं करना चाहिए। अर्थसम्बन्धः सहवासश्च नाकलहः संभवति ॥ २८ ॥ एक ही साथ रहकर पैसे का लेन देन बिना झगड़ा के नहीं चल सकता। अर्थात् ऐसी स्थिति में कलह, अवश्य होगा। अतः दो पृथक् व्यक्ति यदि एक साथ शान्ति से रहना चाहें तो आपस में पैसे का लेन-देन नहीं करना चाहिए।

विवादसमुद्देशः १५६ निधिराकस्मिको वाऽर्थलाभः प्राणैः सह सञ्चितमप्यर्थमपहार- यति ॥ २९ ॥ पूर्वजों से संचित अथवा प्राप्त निधि अथवा अकस्मात् मिला हुआ धन प्राणों के साथ सञ्चित अर्थ को भी नष्ट कर देता है। ब्राह्मणानां हिरण्ययज्ञोपवीतस्पर्शनं च शपथः ॥ ३० ॥ ब्राह्मण की शपथ सुवर्ण अथवा यज्ञोपवीत के स्पर्श से होती है। शस्त्ररत्नभूमिवाहनपल्याणानां तु क्षत्रियाणाम् ॥ ३१ ॥ शस्त्र, रत्न मोती, हीरा आदि, पृथ्वी, सवारी घोड़ा, हाथी आदि और सवारी की जीन का स्पर्श कराकर क्षत्रियों से शपथ कराई जाती है। श्रवणपोतस्पर्शनात् काकिणीहिरण्ययोर्वा वैश्यानाम् ॥ ३२ ॥ कान, छोटा बच्चा, तीस कौड़ियां अथवा सुवर्ण के स्पर्श से वैश्यों की शपथ होती है। शूद्राणां क्षीरबीजयोर्वल्मीकस्य वा ॥ ३३ ॥ शूद्रों की शपथ, क्रिया, दूध, अन्न और वांबी के स्पर्श से होती है। कारूणां यो येन कर्मणा जीवति तस्य तत्कर्मोपकरणानाम् ॥३४॥ जो जिस शिल्प से जीवन निर्वाह करता हो उसके साधनभूत औजारों को स्पर्श करके शिल्पी की शपथक्रिया होती है। व्रतिनामन्येषां चेष्टदेवतापादस्पर्शनात् प्रदक्षिणा, दिव्यकोशात्तन्दुल- तुलारोहणैर्विशुद्धिः ॥ ३५ ॥ व्रती, तपस्वी तथा अन्य पुरुषों की शपथक्रिया उनके इष्ट देवता के पाद- स्पर्श से, उनकी प्रदक्षिणा से, देव-निधि के स्पर्श से चावलों के स्पर्श से और तुला पर आरोहण-पैर रखने से होती है। व्याधानां तु धनुर्लङ्घनम् ॥ ३६ ॥ बहेलियों की शपथ धनुष के लांघने से होती है। अन्त्यवर्णावसायिनामार्द्रचर्मारोहणम् ॥ ३७ ॥ शूद्र, चाण्डाल आदि की शपथक्रिया गीले चमड़े पर पैर रखकर खड़े होने से होती है। वेश्या महिला, भृत्यो भण्डः, क्रीणिनियोगो, नियोगिमित्रं चत्वार्य- शाश्वतानि ॥ ३८ ॥ वेश्या का किसी की पत्नी बनना, धूर्त सेवक का होना, चुङ्गी, टैक्स आदि की आय और अधिकारी की मैत्री ये चार अस्थिर वस्तुएं हैं।

१६० नीतिवाक्यामृतम् क्रीतेष्वाहारेष्विव परस्त्रीषु क आस्वादः ॥ ३९ ॥ खरीदे हुए भोजन के समान बाजारू स्त्री अर्थात् वेश्या में क्या स्वाद मिल सकता है ? यस्य यावानेव परिग्रहस्तस्य तावानेव सन्तापः ॥ ४० ॥ जिसका जितना बड़ा परिवार है उसको उतना ही दुःख है । गजे गर्दभे च राजरजकयोः सम एव चिन्ताभारः ॥ ४१ ॥ राजा और धोबी को हाथी और गदहे की चिन्ता समान रूप से होती है । मूर्खस्याग्रहो नापायमनवाप्य निवर्त्तते ॥ ४२ ॥ मूर्ख पुरुष का आग्रह ( मिथ्या हठ ) बिना उसके नाश के नहीं दूर होता । कार्पासाग्नेरिव मूर्खस्य शान्तावुपेक्षणमौषधम् ॥ ४३ ॥ कपास में लगी आग जिस प्रकार शान्त नहीं की जा सकती उसी प्रकार मूर्ख का दुराग्रह नहीं दूर किया जा सकता । अतः उसकी उपेक्षा करना ही उसकी ओषध है । मूर्खस्याभ्युपपत्तिकरणमुद्दीपनपिण्डः ॥ ४४ ॥ मूर्ख को समझाना उसे और उकसाना है । कोपाग्निप्रज्वलितेषु मूर्खेषु तत्क्षणप्रशमनं घृताहुतिनिक्षेप इव ॥ ४५ ॥ क्रोध की आग में जलते हुए मूर्ख को तत्काल शान्त करने की चेष्टा आग में घी की आहुति देने के समान है । अनस्तिकोऽनड्वानिव ध्रियमाणो मूर्खः परमाकर्षति ॥ ४६ ॥ जिस तरह बिना नकेल के बैल को पकड़ने में वह पकड़ने वाले को ही घसीट ले जाता है उसी प्रकार कुपित मूर्ख को समझाना भी आपत्ति में पड़ना है । स्वयमगुणं वस्तु न खलु पक्षपाताद् गुणवद्भवति न गोपालस्नेहा- दुक्षा क्षरति क्षीरम् ॥ ४७ ॥ निर्गुण वस्तु किसी के पक्षपात से गुणवान् नहीं बन जाती । ग्वाले के स्नेह से बैल नहीं दूध देने लगता । [ इति विवादसमुद्देशः ]

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६१ २९. षाड्गुण्यसमुद्देशः शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ॥ १ ॥ शम और व्यायाम योग क्षेम के कारण हैं। कर्मफलोपभोगानां क्षेमसाधनः शमः, कर्मणां योगाराधनो व्यायामः ॥ २ ॥ अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त फल को भोगने में सहायक कल्याणकारी साधनों का नाम शम है, और नवीन कर्म करने के उद्योग का नाम व्यायाम है। दैवं धर्माधर्मौ ॥ ३ ॥ अपना ही पूर्व जन्म का किया हुआ धर्म अथवा अधर्म, सुकृत अथवा दुष्कृत 'दैव' है। मानुषं नयानयौ ॥ ४ ॥ अपना ही नीतिपूर्ण अथवा अनीतिपूर्ण व्यवहार मानुष कर्म है। दैवं मानुषं च कर्म लोकं यापयति ॥ ५ ॥ दैव और मानुष दोनों कर्मों के योग से मनुष्य का दैनिक जीवन निर्वाह होता है। तच्चिन्त्यमचिन्त्यं वा दैवम् ॥ ६ ॥ मनुष्य चाहे तो दैव कर्म की चिन्ता करे चाहे न करे क्योंकि वह तो होकर ही रहेगा। अतः उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। अचिन्तितोपस्थितोऽर्थसम्बन्धो दैवायत्तः ॥ ७ ॥ बिना सोच विचार के प्राप्त विषयों से सम्बन्ध होना दैवाधीन है। बुद्धिपूर्वं हिताहितप्राप्तिपरिहारसम्बन्धो मानुषायतः ॥ ८ ॥ ज्ञानपूर्वक हितकर कार्य करना और अहितकर से बचना मनुष्य के अधीन है। सत्यपि दैवेऽनुकूले न निष्कर्मणो भद्रमस्ति ॥ ९ ॥ दैव के अनुकूल होने पर भी बिना कर्म किये मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता। न खलु दैवमीहमानस्य कृतमप्यन्नं मुखे स्वयं प्रविशति ॥ १० ॥ दैव वादी के समक्ष उपस्थित भोजन स्वयं ही उसके मुखमें नहीं प्रविष्ट हो जाता। न हि दैवमवलम्बमानस्य धनुः स्वयमेव शरान् सन्धत्ते ॥ ११ ॥ दैववादी का धनुष अपने आप बाणों को नहीं चढ़ा लेता। ११ नी०

१६२ नीतिवाक्यामृतम् पौरुषमवलम्बमानस्यार्थानर्थयोः सन्देहः ॥ १२ ॥ उद्योगी पुरुष का कार्य सिद्ध होगा अथवा असिद्ध रहेगा इसमें सन्देह स्वाभाविक है । निश्चित एवानर्थो दैवपरस्य ॥ १३ ॥ दैववादी के लिये तो अनर्थ निश्चित ही रहता है । आयुरौषधयोरिव दैवपुरुषकारयोः परस्परसंयोगः समीहितमर्थं साधयति ॥ १४ ॥ जिस प्रकार आयु शेष रहने पर औषध के संयोग से मनुष्य का रोग दूर होता है उसी प्रकार दैव और उद्योग दोनों के परस्पर-सहयोग से ही मनुष्य अपना मनोरथ पूर्ण करने में समर्थ होता है । अनुष्ठीयमानः स्वफलमनुभावयन्न कश्चिद् धर्मोऽधर्ममनुबध्नाति ॥१५॥ किसी भी धर्म का अनुष्ठान मनुष्य को उस धर्माचरण का शुभ फल देता है और उसे अधर्म से बचाता है । त्रिपुरुषमूर्त्तिवान्न भूभुजः प्रत्यक्षं दैवमस्ति ॥ १६ ॥ राजा ब्रह्मा विष्णु महेश की मूर्त्ति होता है अतः उसका कोई प्रत्यक्ष देवता नहीं होता । प्रतिपन्नप्रथमाश्रमः, परे ब्रह्मणि निष्णातमतिः, उपासितगुरुकुलः, सम्यग् विद्यायामधीती, कौमारवयोऽलंकुर्वन् क्षत्रपुत्रो भवति ब्रह्मा ॥१७॥ प्रथम अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट परब्रह्म, के चिन्तन में संलग्न, गुरु कुल में रहकर गुरुओं की उपासना किये हुए, वेद विद्या अथवा ब्रह्मविद्या का अध्ययनशील कुमारावस्था को अलंकृत करता हुआ, क्षत्रिय पुत्र ब्रह्मा के समान होता है । संजातराज्यलक्ष्मीदीक्षाभिषेकं स्वगुणैः प्रजास्वनुरागं जनयन्तं राजानं नारायणमाहुः ॥ १८ ॥ राज्य लक्ष्मी की दीक्षा से अभिषिक्त अर्थात् राज्याभिषेक हो जाने के अनन्तर प्रजा का प्रेम प्राप्त करता हुआ राजा नारायण का रूप कहा गया है । प्रवृद्धप्रतापतृतीयलोचनानलः, परमैश्वर्यमातिष्ठमानो राष्ट्रकण्टकान् द्विषद, दानवान् छेतुं यतते विजिगीषुभूपतिर्भवति पिनाकपाणिः ॥१९॥ धधकती हुई प्रतापाग्नि रूप तृतीय नेत्रवाला, परम ऐश्वर्य का उपभोग करता हुआ राष्ट्र के लिये कण्टक स्वरूप शत्रु रूप दानवों का नाश करने के लिये उद्यत, विजय की कामना करने वाला राजा पिनाकपाणि महादेव का स्वरूप है ।

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६३ उदासीन-मध्यम-विजिगीषु-अरि-मित्र-पार्ष्णिग्राह-आक्रन्द-आसार अन्तर्धयो यथासंभवगुणविभवतारतम्यान्मण्डलानामधिष्ठातारः ॥२०॥ उदासीन, मध्यम, विजिगीषु, अरि, मित्र, पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, आसार और अन्तर्धि ये यथासंभव गुण और ऐश्वर्य के अनुपात से राजमण्डल के अधि- ष्ठाता होते हैं । अग्रतः पृष्ठतः कोणे वा सन्निकृष्टे वा मण्डले स्थितो मध्यमादीनां विगृहीतानां निग्रहे संहितानामनुग्रहे समर्थोऽपि केनचित् कारणेना- न्यस्मिन् भूपतौ विजिगीषुमाणे य उदास्ते स उदासीनः ॥ २१ ॥ राजमण्डल में जो प्रधान राजा के आगे पीछे किसी कोने में अथवा अत्यन्त समीप स्थित होकर 'मध्यम' आदि युद्ध करनेवालों को रोकने में और युद्ध के लिये सुसंगठितों को युद्ध का आदेश देने में समर्थ होते हुए भी किसी कारण-वश जो दूसरे जय के इच्छुक राजा के प्रति उपेक्षा करता है उसे 'उदा- सीन' कहते हैं । उदासीनवदनियतमण्डलोऽपरभूपापेक्षया समधिकबलोऽपि कुतश्चित् कारणादन्यस्मिन् नृपतौ विजिगीषुमाणे यो मध्यस्थभावमवलम्बते स मध्यस्थः ॥ २२ ॥ उदासीन के समान ही जिसकी आगे पीछे अथवा कोने में स्थिति निश्चित न हो तथा अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक बलशाली होकर भी जो किसी कारणवश अन्य विजयाभिलाषी राजा के प्रति मध्यमवृत्ति अर्थात् न शत्रु न मित्र का व्यवहार करे वह 'मध्यस्थ' है । राजात्मदैवद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नोऽनयविक्रमयोरधिष्ठानं विजिगीषुः ॥२३॥ जिसका राज्याभिषेक हो चुका हो, और जिसको प्राक्तन शुभकर्मों का भोग प्राप्त हो, ऐश्वर्य और अमात्य आदि से जो सम्पन्न हो और जिसमें नीति तथा पराक्रम का वास हो ऐसा राजा 'विजिगीषु' कहा गया है । य एव स्वस्याहितानुष्ठानेन प्रातिकूल्यमियर्त्ति स एवारिः ॥ २४ ॥ जो अपने आत्मीय का अपकार करके प्रतिकूलता को प्राप्त कर ले वह 'अरि' है । मित्रलक्षणमुक्तमेव पुरस्तात् ॥ २५ ॥ मित्र समुद्देश्य में मित्र का लक्षण कहा जा चुका है । यो विजिगीषौ प्रस्थितेऽपि प्रतिष्ठमाने वा पश्चात् कोपं जनयति स पार्ष्णिग्राहः ॥ २६ ॥ शत्रु पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से प्रस्थान किये हुए या करते हुए

१६४ नीतिवाक्यामृतम् राजा के चले जाने के अनन्तर जो क्षोभकर उस विजिगीषु के देश का मर्दन कर डाले वह पाष्णिग्राह' है । पाष्णिग्राहाद्यः पश्चिमः स आक्रन्दः ॥ २७ ॥ पाष्णिग्राह के लक्षणों से विपरीत लक्षण जिसमें हो वह 'आक्रन्द' है । पाष्णिग्राहामित्रभासार आक्रन्दमित्रं च ॥ २८ ॥ जो पाष्णिग्राह का शत्रु और आक्रन्द का मित्र है वह "आसार" संज्ञक है । अरिविजिगीषोर्मण्डलान्तर्विहितवृत्तिरुभयवेतनः पर्वताटवीकृताश्रय- श्चान्तर्धिः ॥ २६ ॥ जो अरि और विजिगीष इन दोनों के मण्डल के मध्यवर्ती होकर जीवन निर्वाह करे और दोनों ओर से वेतन ग्रहण करे तथा पर्वत अथवा अरण्य में निवास करे वह "अन्तर्धि" है । अराजबीजी लुब्धः क्षुद्रो विरक्तप्रकृतिरन्यायपरो व्यसनी विप्रतिपन्न- मित्रामात्यसामन्तसेनापतिः शत्रुरभियोक्तव्यः ॥ ३० ॥ जो राजा से न उत्पन्न हो, लोभी, क्षुद्र, विरक्त स्वभाव वाला, अन्यायी, मद्य द्यूत आदि दुर्गुणों का व्यसनी हो तथा जिसके मित्र, अमात्य, सामन्त और सेनापति उसके विरुद्ध हो गये हों ऐसे शत्रु पर आक्रमण कर देना चाहिए । अनाश्रयो दुर्बलाश्रयो वा शत्रुरुच्छेद्नीयः ॥ ३१ ॥ जिसका कोई सहायक न हो या हो भी तो हीनशक्ति वाला हो तो ऐसे शत्रु का उन्मूलन कर देना चाहिए । विपर्ययो निष्पीडनीयः कर्षयेद्वा ॥ ३२ ॥ शत्रु यदि मित्र बन जाय तो भी उसे विभवहीन कर दे अर्थात् उसका धन छीन ले अथवा उसे मार डाले । समाभिजनः सहजशत्रुः ॥ ३३ ॥ अपने दायाद पट्टीदार सहज शत्रु होते हैं । विरोधी विरोधयिता वा कृत्रिमः शत्रुः ॥ ३४ ॥ जो किसी कारणवश विरोध करता हो या विरोध करानेवाला हो वह कृत्रिम शत्रु है । अनन्तरः शत्रुरेकान्तरं मित्रमिति नैष एकान्ततः कार्य हि मित्रता- मित्रत्वयोः कारणं न पुनर्विप्रकर्षसन्निकर्षौ ॥ ३५ ॥ दूर सीमान्तवर्त्ती आदि राजा शत्रु होते हैं और समीपवर्ती मित्र यह Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६५ निश्चित सिद्धान्त नहीं है क्योंकि शत्रुता और मित्रता के कारण कार्य हैं न कि दूरी और सामीप्य । बुद्धिशक्तिरात्मशक्तेरपि गरीयसी ॥ ३६ ॥ बुद्धिबल आत्मबल से भी श्रेष्ठ है । शशकेनेव सिंहव्यापादनमत्र दृष्टान्तः ॥ ३७ ॥ शशक के द्वारा सिंह का मारा जाना इसका दृष्टान्त है । कोशदण्डबलं प्रभुशक्तिः ॥ ३८ ॥ कोशबल और सैन्यबल का होना प्रभुशक्ति है । शूद्रकशक्तिकुमारौ दृष्टान्तौ॥ ३६ ॥ इसमें शूद्रक और शक्तिकुमार दृष्टान्त हैं । राजा शूद्रक ने अपने विपुलकोष और प्रचुर सैन्यबलसे शक्तिकुमार का नाश कर दिया था । विक्रमोबलं चोत्साहशक्तिस्तत्र रामो दृष्टान्तः ॥ ४० ॥ पराक्रम और बल का होना उत्साहशक्ति है, जिसमें राम दृष्टान्त हैं । शक्तित्रयोपचितो ज्यायान् , शक्तित्रयापचितो हीनः, समान- शक्तित्रयः समः ॥ ४१ ॥ तीनों शक्तियों से अभ्युदय को प्राप्त श्रेष्ठ, उक्त शक्तित्रय से हीन हीन और सम शक्तित्रय वाला व्यक्ति सम है । सन्धि-विग्रह-यानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गुण्यम् ॥ ४२ ॥ मैत्री, वैर, आक्रमण, उपेक्षा करके बैठे रहना, आत्मसमर्पण और दो शत्रुओं में एक के साथ मैत्री करने के अनन्तर दूसरे पर आक्रमण = द्वैधीभावः राजा के लिये यह छह गुण समूह हैं । अपराधो विग्रहः ॥ ४४ ॥ विजयेच्छु राजा के प्रति कोई अनुचित करना विग्रह ( वैर ) है । अभ्युदयो यानम् ॥ ४५ ॥ शत्रु पर चढ़ाई कर देना अथवा पलायन कर जाना 'यान' है । उपेक्षणमासनम् ॥ ४५ ॥ शत्रु के प्रति उपेक्षा भाव रख लेना 'आसन' है । परस्यात्मार्पणं संश्रयः ॥ ४७ ॥ शत्रु को आत्मसमर्पण करना संश्रय है । एकेन सह सन्धायान्येन सह विग्रहकरणमेकेन वा शत्रौ सन्धानपूर्वं विग्रहो द्वैधीभावः ॥ ४८ ॥ जब राज्य पर एक साथ दो शत्रु चढ़ाई कर दे तब एक अपेक्षाकृत

१६६ नीतिवाक्यामृतम् बलवान् के साथ सन्धि करके अन्य पर चढ़ाई कर देना 'द्वैधीभाव' है। अथवा अकेले ही शत्रु से सन्धि करके अनन्तर विग्रह—युद्ध-करना द्वैधीभाव है। प्रथमपक्षे सन्धीयमानो विगृह्यमाणो विजिगीषुरिति द्वैधीभावो बुद्ध्याश्रयः ॥ ४९ ॥ प्रथम पक्ष में सन्धि करते हुए, वैर करते हुए विजय की इच्छा करना बुद्धि के आश्रित रहता है अर्थात् मन में सन्धि और विग्रह तथा विजय का विकल्प द्वैधीभाव है। हीयमानः पणबन्धेन सन्धिमुपेयात् यदि नास्ति परेषां विपणितेऽर्थे मर्यादोल्लङ्घनम् ॥ ५० ॥ शत्रु की अपेक्षा यदि स्वयं क्षीण शक्ति हो रहा हो तो किसी शर्त के साथ उससे सन्धि कर लेनी चाहिए किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि 'शर्त' के विषय में आगे चलकर शत्रु पक्ष द्वारा मर्यादा का उल्लङ्घन न हो। अभ्युचीयमानः परं विगृह्णीयाद् यदि नास्त्यात्मबलेषु क्षोभः ॥ ५१ ॥ यदि शत्रु की अपेक्षा शक्तिशाली होने की प्रतीति हो रही हो और अपनी सेना में किसी प्रकार का क्षोभ न हो तो शत्रु से लड़ते ही रहना चाहिए। न मां परो हन्तुं नाहं परं हन्तुं शक्त इत्यासीत यथायत्यामस्ति कुशलम् ॥ ५२ ॥ शत्रु न मुझे मार सकने में समर्थ होगा न मैं शत्रु को मार सकने में समर्थ हूं ऐसा समझ में आने पर तटस्थ होकर बैठ जाय, किन्तु भविष्य की कुशल का ध्यान रखे। गुणातिशययुक्तो यायाद् यदि न सन्ति राष्ट्रकण्टका मध्ये, न भवति (च)पश्चात् क्रोधः ॥ ५३ ॥ यदि सैन्य एवं कोश बल के कारण शत्रु की अपेक्षा स्वयं अधिक शक्ति शाली हो तो यह निश्चय करके कि उसके आक्रमण के निमित्त प्रस्थान कर देने के अनन्तर कुछ राष्ट्र द्वेषी कोई हानि तो न करेंगे अथवा बाद में कोई उपद्रव तो न होगा तो आक्रमण करने के निमित्त प्रस्थान कर दे। स्वमण्डलम् अपरिपालयतः परदेशाभियोगो विवसनस्य शिरोवेष्टन- मिव ॥ ५४ ॥ अपने मण्डल की रक्षा न करके शत्रु के देश पर आक्रमण कर बैठना नंगे का साफा बांधने के समान है। अर्थात् शिर पर तो पगड़ी बांध ले और सारा शरीर नंगा हो तो वह जैसे उपहास पात्र होता है वैसे ही स्वदेश को अरक्षित छोड़ परदेश में जाना हास्यास्पद है।

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६७ रज्जुवलनमिव शक्तिहीनः संश्रयं कुर्याद् यदि न भवति परेषामा- मिषम् ॥ ५५ ॥ रस्सी बटने के समान, शक्तिहीन राजा शत्रु को आत्मसमर्पण कर दे यदि इससे वह किसी दूसरे राजा का भक्ष्य अथवा वध्य न होता हो । रस्सी में पतले-पतले अनेक सूत्र मिलकर उसे सुदृढ बना देते हैं उसी प्रकार शक्तिहीन भी दूसरे का आश्रय ग्रहण कर पुष्ट हो जाय । बलवद् भयादबलवदाश्रयणं हस्तिभयादेरण्डाश्रयणमिव ॥ ५६ ॥ बलवान् शत्रु के भय से शक्तिहीन का आश्रय ग्रहण करना वैसा ही उपहासास्पद है जैसे हाथी के भय से रेंड के पेड़ का आश्रय लेना । स्वयमस्थिरेणास्थिराश्रयणं नद्यां वहमानेन वहमानस्याश्रयण- मिव ॥ ५७ ॥ शत्रु के भय से जब राजा स्वयम् अस्थिर हो तब अन्य किसी अस्थिर राजा का आश्रय लेना वैसा ही है जैसा कि नदी में बहते या डूबते हुए व्यक्ति का दूसरे बहते या डूबते व्यक्ति को पकड़ना । वरं मानिनो मरणं न परेच्छानुवर्त्तनादात्मविक्रयः ॥ ५८ ॥ शत्रु की इच्छाओं का अनुसरण करते हुए जीवित रहना आत्मविक्रय हैं । मानी पुरुष के लिये मर जाना उससे अच्छा है : आयतिकल्याणे सति कस्मिंश्चित् सम्बन्धे परसंश्रयः श्रेयान् ॥ ५६ ॥ परिणाम काल में यदि कल्याण सुनिश्चित हो तो किसी कार्य के सम्बन्ध में शत्रु का संश्रय श्रेयस्कर है । निधानादिव न राजकार्येषु कालनियमोऽस्ति ॥ ६० ॥ कहीं पर शोध में अकस्मात् मिली हुई निधि जिस प्रकार तत्काल ग्रहण कर ली जाती है उसी प्रकार राजकीय कार्य में समय का कोई नियम नहीं है किसी समय भी राजाज्ञा-वश कोई भी काम करना पड़ सकता है तथा राज- कार्य तत्काल ही कर डालना चाहिए । मेघवदुत्थानं राजकार्याणामन्यत्र च शत्रोः सन्धिविग्रहा- भ्याम् ॥ ६१ ॥ जिस प्रकार बहुधा आकाश में अकस्मात् बादल छा जाते हैं उसी प्रकार राजकार्य भी अकस्मात् उठ खड़े होते हैं और किये जाते हैं, किन्तु शत्रु से सन्धि और विग्रह सम्बन्धी कार्य सहसा नहीं किन्तु विचारपूर्वक करना चाहिए । द्वैधीभावं गच्छेद् यदन्योऽवश्यमात्मना सहोत्सहते ॥ ६२ ॥ यदि शत्रु का शत्रु निश्चित रूप से अपने प्रति उत्साहयुक्त हो अर्थात् साथ

१६८ नीतिवाक्यामृतम् देने को तैयार हो तो 'द्वैधीभाव" अर्थात् बलिष्ठ से सन्धि एवं निर्बल से युद्ध की नीति का आश्रय लेना चाहिए। अथवा मन में कुछ और तथा ऊपर से कुछ और की नीति का आश्रय लेकर स्थिति के अनुकूल विजय प्राप्त करनी चाहिए। बलद्वयमध्यस्थितः शत्रुरुभयसिंहमध्यस्थितः करीव भवति सुख- साध्यः ॥ ६३ ॥ दो बलशाली राजाओं के बीच पड़ा हुआ शत्रु दो सिंहों के बीच पड़े हुए हाथी के समान सुखपूर्वक नष्ट किया जा सकता है। भूम्यर्थिनं भूफलप्रदानेन सन्दध्यात् ॥ ६४ ॥ शत्रु अथवा अन्य व्यक्ति यदि भूमिका प्रार्थी हो तो उसे भूमि न देकर उसकी उपज देना चाहिए। भूफलदानम् अनित्यं, परेषु भूमिर्गता गतैव ॥ ६५ ॥ भूमि की उपज देनेवाली बात अनित्य है, किन्तु दूसरे के पास भूमि जाने पर वह सदा के लिये चली जाती है। अवज्ञायापि भूमावारोपितस्तरुर्भवति बद्धतलः ॥ ६६ ॥ भूमि में उपेक्षा के साथ भी लगाया गया वृक्ष जड़ जमाकर दृढ़ हो हो जाता है। उपायोपपन्नविक्रमोऽनुरक्तप्रकृतिरल्पदेशोऽपि भूपति र्भवति सार्व- भौमः ॥ ६७ ॥ साम, दान, दण्ड, भेद इन उपायों के साथ पराक्रम करने वाला और अनुरक्त प्रजावाला राजा थोड़े ही प्रदेश का स्वामी होने पर भी चक्रवर्ती के तुल्य होता है। न हि कुलागता कस्यापि भूमिः किन्तु वीरभोग्या वसुन्धरा ॥ ६८ ॥ वंश परम्परा से प्राप्त भूमि किसी की भूमि नहीं होती, किन्तु यह वसु- न्धरा वीरों के द्वारा भोगी जाती है। अर्थात् वंश परम्परा से अथवा अन्य प्रकार से प्राप्त पृथ्वी का भोग वही मनुष्य कर सकता है जो वीर और उत्साह सम्पन्न होता हैं अन्यथा उसके कारण अन्य व्यक्ति उस पृथ्वी या' राज्य पर अपना अधिकार कर लेते है। सामोपप्रदानभेददण्डा उपायाः ॥ ६६ ॥ साम, उपप्रदान, भेद और दण्ड यह चार उपाय हैं। तत्र पञ्चविधं साम, गुणसंकीर्तनं सम्बन्धोपाख्यानं, परोपकारदर्शन- मायतिप्रदर्शनमात्मोपनिबन्धनमिति ॥ ७० ॥ साम पाँच प्रकार का है, गुण संकीर्तन अर्थात् शत्रु को वश में करने के

लिये उसके गुणों का वर्णन करना, सम्बन्धोपाख्यान अर्थात् परस्पर सम्बन्ध दृढ़ होने में सहायक उपाख्यानों को सुनाना, परोपकार का प्रदर्शन, आयति प्रदर्शन, अर्थात् अपनी मैत्री को भविष्य के लिये शुभावह बताना ओर आत्मोपनिबन्धन । यन्मम द्रव्यं तद्भवता स्वकृत्येषु प्रयुज्यतामित्यात्मोपनिधानम् ॥ ७१ ॥ मेरे पास जो कुछ रुपया पैसा आदि हैं उसे आप अपने कामों में लगाइये इसका नाम आत्मोपनिधान है । बह्वर्थसंरक्षणायाल्पार्थप्रदानेन परप्रसादनमुपप्रदानम् ॥ ७२ ॥ शत्रु के प्रचुर द्रव्य की सुरक्षा के निमित्त थोड़ी द्रव्यराशि देकर उसे सन्तुष्ट करना उपप्रदान है । योगतीक्ष्णगूढ़पुरुषोभयवेतनैः परबलस्य परस्परशङ्काजननं निर्भ- त्सनं वा भेदः ॥ ७३ ॥ विषादि का प्रयोग करके तथा तीक्ष्ण अर्थात् क्रूर प्रकृति के पुरुष, गुप्तचर तथा दोनों ओर से वेतन भोगी व्यक्तियों के द्वारा शत्रु सैन्य में परस्पर शङ्का उत्पन्न करना, तिरस्कार की भावना भरना-भेद है ! वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं च दण्डः ॥ ७४ ॥ शत्रु का वध, उसे पीड़ित करना, उसका धन छीन लेना इनका नाम दण्ड है । शत्रोरागतं साधु परीक्ष्य कल्याण·बुद्धिमनुगृह्णीयात् ॥ ७५ ॥ शत्रु के पास से आये हुये व्यक्ति की अच्छी तरह परीक्षा करे अनन्तर यदि वह कल्याण बुद्धि अर्थात् अपना भला चाहने वाला हो तो उस पर अनुग्रह करे-दान मानादि से उसे सन्तुष्ट करे । किमरण्यजमौषधं न भवति क्षेमाय ॥ ७६ ॥ क्या जंगल में उत्पन्न हुई औषध कल्याणकारक नहीं होती ? इस दृष्टान्त से तात्पर्य यह है कि शत्रु के आदमी पर सर्वथा अविश्वास ही न करना चाहिए; वह भला भी हो सकता है । गृहप्रविष्टकपोत इव स्वल्पोऽपि शत्रुसम्बन्धी लोकस्तन्त्रोद्वा- सयति ॥ ७७ ॥ गृह में प्रविष्ट कबूतर जिस प्रकार घर को उजाड़ बना देता है उसी प्रकार शत्रु का क्षुद्र से क्षुद्र व्यक्ति भी सैन्य में विद्रोह उत्पन्न कर देता है । मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्तरोत्तरलाभः श्रेयान् ॥ ७८ ॥ मित्र, सुवर्ण और भूमि इन लाभों में उत्तरोत्तर लाभ अधिक कल्याण

१७० नीतिवाक्यामृतम् कारक है । अर्थात् मित्र प्राप्ति से सुवर्ण प्राप्ति अच्छी और उससे भी अच्छी भूमि की प्राप्ति है । हिरण्यं भूमिलाभाद् भवति मित्रञ्च हिरण्यलाभादिति ॥ ७६ ॥ भूमि के लाभ से सुवर्ण होता है और सुवर्ण अर्थात् धन से मित्र प्राप्ति होती है । शत्रोर्मित्रत्वकारणं विमृश्य तथा चरेद् यथा न वञ्च्यते ॥ ८० ॥ शत्रु यदि मित्रता करना चाहे तो उसकी मित्रता के कारणों पर विचार करके उसके साथ ऐसा सतर्क व्यवहार रखे जिससे वञ्चित न होना पड़े । गूढोपायेन सिद्धकार्यस्यासंवित्तिकरणं सर्वा शङ्कां दुरपवादं च करोति ॥ ८१ ॥ जिस व्यक्ति ने गूढ़ उपायों द्वारा राजा का कार्य सिद्ध किया हो उसका अनादर करने से उस कार्य सिद्ध करने वाले के मन में अनेक प्रकार की आशङ्काएं उत्पन्न होती हैं और राजा का भी कृतघ्न के रूप में अपयश होता है । गृहीतपुत्रदारानुभयवेतनान् कुर्यात् ॥ ८२ ॥ दोनों ओर से वेतन पाने वाले के स्त्री पुत्रों का संरक्षण राजा को करना चाहिए । उभय वेतन ऐसा चतुर वह व्यक्ति है जो एक राजा का वेतन भोगी गुप्तचर होकर दूसरे राज्य में भेद लेने जाय किन्तु वहां भी कुछ ऐसा व्यव- हार प्रदर्शित करे जिससे वहां विश्वस्त बनकर वहां भी वेतन मिले । शत्रुमपकृत्य भूदानेन तद्दायादानात्मनः सफलयेत् क्लेशयेद्वा ॥८३॥ शत्रु का अपकार अर्थात् उसकी धन-धरती छीन कर उसे उसके दायादों को देकर उन्हें अपना बना ले अथवा वे बलिष्ठ होकर सर उठावें तो उनको दण्डित और पीड़ित करे । परविश्वासजनने सत्यं शपथः प्रतिभूः प्रधानपुरुषप्रतिग्रहो वा हेतुः ॥ ६४ ॥ शत्रु पर विश्वास चार कारणों से किया जा सकता है—उसका सत्य-व्य- वहार, शपथग्रहण, जमानत, और उसके प्रधान अमात्य आदि का अपनी ओर ग्रहण अर्थात् पूर्णरूप से मिल जाना । सहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभः शतैकीयः पश्चात् कोप इति न यायात् ॥ ८५ ॥ प्रथम तो प्रचुर लाभ हो किन्तु अन्तमें कुछ उपद्रव की संभावना हो तो शत्रु पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान न करे ।

षाड्गुण्यसमुद्देशः १७१ सूचीमुखा ह्यनर्था भवन्त्यल्पेनापि सूचीमुखेन महान् दवरकः प्रविशति ॥ ८६ ॥ उपद्रव सुई के छेद के सदृश होते हैं। सुई का छेद छोटा ही होता है किन्तु उस में बहुत लम्बा डोरा चला जाता है इसी प्रकार बहुत लाभ की आशा से किये गये प्रस्थान में लाभ के अनन्तर थोड़ा भी संभावित उपद्रव बढ़ जाता है और तब पराये देश में बड़ी कठिनाई होती है । न पुण्यपुरुषापचयः, क्षयोहिरण्यस्य, धान्यापचयः, व्ययः शरीरस्य- ( एवम् ) आत्मनो लाभमन्विच्छेद्येन सामिषक्रव्याद इव न परैरवरु- ध्यते ॥ ८७ ॥ अपने किसी प्रभावशाली अथवा प्रतापी अमात्य आदि का नाश न हो, कोश का नाश न हो, धान्य की क्षीणता न हो और अपना शरीर संशय में न पड़ जाय-इन बातों का ध्यान रख कर तब राजा अपने लाभ की इच्छा करे । इसमें उस मांस भक्षी पक्षी का उदाहरण है जो मांस का टुकड़ा मुंह में दबाकर जब उड़ता है तब उसके मांस के लोभ से अन्य पक्षी उसका पीछा करते हैं इसी प्रकार राजा का अनायास लाभ देखकर अन्य प्रतिपक्षी राजा उसका पीछा करेंगे । शक्तस्यापराधिषु या क्षमा सा तस्यात्मनस्तिरस्कारः ॥ ८८ ॥ जो राजा दण्ड देने में समर्थ होकर भी अपराधियों को क्षमा करता है वह मानों अपना ही तिरस्कार करता है । अर्थात् दण्ड न पाकर अपराधी पुनः उसका अपराध करेगा । अतः अपराधी को दण्डित अवश्य करना चाहिए । अतिक्रम्यवतिषु निग्रहं कर्तुः, सर्पादिव दृष्टप्रत्यवायः, सर्वोऽपि विभेति जनः ॥ ८६ ॥ राजाज्ञा का उल्लङ्घन करने वालों को दण्ड देने वाले राजा से लोग उसी प्रकार डरते हैं जिस प्रकार सर्प से । अनायकां बहुनायकां वा सभां न प्रविशेत् ॥ ६० ॥ बिना सभापति की अथवा जहाँ बहुत से सभापति अथवा मुखिया हों उस सभा में नहीं जाना चाहिए । गणपुरश्चारिणः सिद्धे कार्ये स्वस्य न किञ्चिद् भवति, असिद्धे पुन- र्ध्रुवमपवादः ॥ ६१ ॥ किसी गण अथवा संघ का नेता बनकर आगे चलने में काम सिद्ध हो जाने पर अपना कोई विशेष लाभ नहीं होता और काम बिगड़ता है तो निन्दा अवश्य होती है ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १७२ नीतिवाक्यामृतम् सा गोष्ठी न प्रस्तोतव्या यत्र परेषामपायः ॥ ६२ ॥ किसी कार्य विशेष के लिये ऐसी गोष्ठी का प्रस्ताव नहीं करना चाहिये जिस के लिये प्रस्तावित अथवा चुने गये लोगों से पक्षपात आदि के कारण लोगों की हानि हो अर्थात् निष्पक्ष व्यक्तियों की कमेटी बनानी चाहिए। गृहागतमर्थं केनापि कारणेन नावधीरयेद् । यदैवार्थार्गमस्तदैव सर्वतिथिनक्षत्रग्रहबलम् ॥ ६३ ॥ घर आये हुए द्रव्य का किसी भी कारण वश अनादर न करे अर्थात् उसे लोटावे नहीं। जब ही पैसा आता है तब ही समस्त तिथि नक्षत्र और ग्रहों का बल प्राप्त हो जाता है। अर्थात् किसी से द्रव्य लेने में सदा शुभ मुहूर्त है। गजेन गजबन्धनमिवार्थेनार्थोपार्जनम् ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार शिक्षित हाथी के माध्यम से जंगल में दूसरा हाथी पकड़ा जाता है उसी प्रकार द्रव्य से ही द्रव्य का उपार्जन होता है। न केवलाभ्यां बुद्धिपौरुषाभ्यां महतो जनस्य संभूयोत्थाने सङ्घात- विधातेन दण्डं प्रणयेच्छतभवध्यं सहस्रमदण्ड्यं न प्रणयेत् ॥ ६५ ॥ महान् जन समूह यदि सुसंगठित होकर किसी पक्ष का उत्थापन करता है तो उस जन संघ को अवैध घोषित कर राजा को अपने बुद्धि और पौरुष के गर्व से दण्डित नहीं करना चाहिए। सो और हजार आदमियों का संघ तो अवश्य और अदण्ड्य ही है। अर्थात् सुसंगठित जनमत के विषय में बहुत गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए सहसा अपने सामर्थ्य के मद से कुछ दण्डका विधान नहीं करना चाहिए। सा राजन्वती भूमिर्यस्यां नासुरवृत्ती राजा ॥ ६६ ॥ राजा से भूमि अर्थात् देश की शोभा तभी होती है जब राजा आसुरी वृत्ति का न हो। परप्रणेयो राजाऽपरीक्षितार्थमानप्राणहरोऽसुरवृत्तिः ॥ ६७ ॥ दूसरे की बुद्धि पर चलने वाला तथा बिना सम्यक् परीक्षण के ही दूसरे के धन और प्राण का अपहरण करने वाला राजा 'असुरवृत्ति' का राजा है। परकोपप्रसादानुवृत्तिः परप्रणेयः ॥ ६८ ॥ दूसरों के कहने से क्रुद्ध और प्रसन्न होनेवाला राजा 'पर प्रणेय' है। तत्स्वामिच्छन्दोऽनुवर्त्तनं श्रेयो यन्न भवत्यायत्यामहिताय ॥ ६६ ॥ स्वामी की उस इच्छा का अनुसरण करना चाहिए जिससे भविष्य में अपना अहित न हो। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu