क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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नोट: प्रस्तुत पृष्ठ में फ़ॉन्ट/ग्लिफ़ लोड न होने (Missing font/Tofu) के कारण अधिकांश देवनागरी वर्ण खाली चौकोर बक्सों (Boxes/) के रूप में दिखाई दे रहे हैं, केवल विराम चिह्न और संख्याएँ ही दृश्यमान हैं।
दृश्यमान संरचना का पंक्तिबद्ध विवरण निम्न प्रकार है:
‘ , ?’ , ‘, ! ’ ‘, ?’ ‘ , ?’ - , , ‘ , ’ , ,
019/ ,
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इस पृष्ठ पर देवनागरी फ़ॉन्ट के सही प्रकार से एम्बेड/रेंडर न होने के कारण सभी अक्षर बॉक्स/प्रतीकों (Tofu/Glyph missing) के रूप में प्रदर्शित हो रहे हैं। दृश्यमान सामग्री का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:
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023/ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯!
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यह प्रश्न सुनकर सेठ को गुस्सा आया ‘तू ही तो सब कुछ करा रहा?’ नौकर बोला ‘जब से मूंछें आ गई हैं तब से मैं किसी का विश्वास नहीं कर रहा हूँ और मेरा काम खूब चल रहा है। इसलिए किसी गैर-मुस्लिम से अपनी दाढ़ी मत कटाओ-मुस्लिम को रोजी-रोटी भी मिलेगी क्योंकि यहाँ पर उनका राज है। इसलिए तू मुझे मत बहका क्योंकि तू मेरा भला तो कर नहीं सकता परंतु बुरा जरूर कर देगा।’ सो जो लोग यह सोच कर अपनी स्थिति ठीक नहीं करना चाहते हैं, वह मूर्ख हैं, वह रोगी हैं; वास्तव में उनकी सोच
024/ अहंकार का त्याग किए बिना, प्रभु मिलन का आनंद दूर
हर समय यह सोचना चाहिए कि यह सारा काम भगवान् करा रहा और मैं केवल उस काम को करने का एक साधन मात्र हूँ। जब यह मान लेते हैं कि अमुक काम मैंने किया अर्थात् अहंकार आ जाता है। उस समय हम भगवान् और खुद को दो या भिन्न-दो मानते हैं। भगवान् अलग और हम अलग मानकर बैठ जाते हैं। जब हम प्रभु को और खुद को एक नहीं मानेंगे तो प्रभु का आनंद कैसे आएगा? फिर तो यही ‘कहा जाएगा तू अलग मैं अलग’ यह सोचकर ही भगवान् का आनंद लेने से हम वंचित रह जाते हैं। क्या कभी सोचा है ‘जब तक भगवान् से दूरी बनी रहेगी?’ तो फिर यही कहेंगे ‘जब तक भगवान् से दूरी बनी रहेगी, तब तक प्रभु का भी आनंद प्राप्त नहीं होगा’ हम सब प्रभु के अंश हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रभु का अंश सब प्राणियों में ही है। ईश्वर-अंश को जान कर, फिर भी अहंकार करना किसी तरह ठीक नहीं है। हम भगवान् का, तो हमारे में प्रभु कैसे समाए? किस प्रकार समाए? क्या हम, या भगवान् बड़ा है? ऐसा सोचने से भगवान् का अंश समाप्त नहीं होता, केवल अहंकार पैदा होता है? इसलिए जो भगवान् को, भगवान् के स्वभाव को जान लेते हैं अर्थात् यह समझ लेते हैं कि यह काम भगवान् करा रहे हैं। प्रभु ही सारा काम करा रहे हैं तो समझो वह प्रभु का साक्षात्कार कर रहे हैं। प्रभु के अंश हैं। वह भगवान् को प्राप्त कर लेते हैं, सो अहंकार को त्याग कर प्रभु से प्रेम करो
025/ प्रभुदर्शन
‘प्रभुदर्शन कैसे हो?’ प्रभु-दर्शन! प्रभु, प्रभुदर्शन कैसे-कैसे होते हैं। प्रभु-दर्शन केवल, देखने से नहीं हो-सकते। प्रभु तो सब कुछ कर रहे हैं। प्रभुदर्शन करो, समझो हर काम को, समझो प्रभु काम कर रहे हैं। माता-पिता को, बड़ों को ‘प्रणाम’ करते समय प्रभु दर्शन करो कि प्रभु का स्वरूप प्रभु ही माता के रूप में, प्रभु ही पिता स्वरूप बनकर बैठे हैं। यही तो प्रभुदर्शन करना कहलाएगा। प्रभुदर्शन किस प्रकार से हो? किस तरह प्रभुदर्शन हो? भाई, प्रभुदर्शन केवल नाम, रूप देखने से ही समाप्त नहीं हो जाता। हर समय उनका ध्यान, प्रभुदर्शन बन कर रहा। प्रभुदर्शन केवल आँखों द्वारा ही नहीं होता है, बल्कि अपनी अंतरात्मा से भी प्रभु का अनुभव हो सकता है। मन का ध्यान उस समय प्रभु के चरणों में हो। जब अंतरात्मा के नेत्र खुलते हैं, अंतरात्मा का साक्षात्कार होने पर ही ‘प्रभु’ का दर्शन संभव होता है। अंतरात्मा ही तो ‘प्रभु’ का रूप बनकर हृदय में समाई हुई है। ‘अंतरात्मा को जानो, अपने प्रभु को जानो।’ ‘दर्शन करो, सब कुछ, प्रभु का दर्शन अंतरात्मा से, आत्मा से।’ तो प्रभुदर्शन अंत तक साथ चलता ही रहेगा। कभी न मिटने वाला यह प्रभु ‘दर्शन कैसे होगा?’ केवल यही ‘कहा गया कि प्रभु का ध्यान अंतरात्मा द्वारा प्रभु चरणों में लगा रहना चाहिए। प्रभु को याद करते-करते प्रभुमय हो जाना चाहिए, प्रभु चरणों में प्रभु को समर्पित कर देना ही प्रभु-दर्शन कहलाएगा। 19
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□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□, □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□-□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □ □□□ □□, □ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □ □□□□, □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □ □□□□, □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ ‘□□□□□’ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□, □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ 030/ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□! □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□- □□ □□□□□□□, □□ □□□□, □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□- □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□, □□□□ □□□- □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□ □□- □□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□; □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□, □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ 031/ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□; □□□□□□, □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □-□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ 22
□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ : ‘□□ □□□□ □□ □□□ □□□?’ □□□□ □□ □□□ : ‘□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□’ □□□□□□ □□ □□□ : ‘□□□ □□ □□□□! □□□□ □□□ □□□- □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□’ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ : ‘□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□? □□□ □□□□ □□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□, □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□’ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□-□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□, □□ □-□□ □□ □□□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□-□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ 032/ ‘□□□’ □□□□□□□□□□□□ □□! □□□□ □□, □□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □ □□ □□□ □□□, □ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□; □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□- □□ □□ □□□ □□ □□, □□□ □□ □□ □□□, □□ □□□ □□□ □□, □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ ‘□□□’ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ ‘□□□’ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□-□□□□□□, □□ □□□-□□□□, □□□-□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ 033/ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ : □□□□□□□□ □□□ □□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□! □□ □□, □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □ □□, □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□ □□□ □□, □□□□□ □□ □ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□, □□ □□□□□□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□, □ □□□□□□ □□, □ □□□□□ □□□ 23
□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□-□□□□□□ □□□□□ □□; □□□□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ : □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□? □□ □□□□□-□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□? □□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□? □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□? □□□ □□, □□ □□□□□□? □□□□ □□ □□ □□□□□□? □□□ □□□□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□, □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ ‘□□’ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ ‘□□□□□’ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□, □□ ‘□□□□□’ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□! □□□□ □□□□-□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□, □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□-□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ 034/ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□! □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□-□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□? □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□; □□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□-□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □ □□□□ □□□□ 24
035/ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ : ‘□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□! □□□-□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□’ □□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□□ □□ □□□□ : ‘□□□□□ □□□□□ □□□?’ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ ‘□□□□□’ □□□□□ □□□□ ‘□□□□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□’ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□, □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□- □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□-□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ 036/ □□□□□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□-□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□- □□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□ 037/ □□□□□ □□□□□ □□ ‘□□□□□’ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□- □□□□ □□□□□, □□□□□□, □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□- □□□□□□□, □□□□□□□, □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□- □□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□? □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ 25
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038/ ▯▯▯▯▯
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26
इस पृष्ठ पर मूल देवनागरी लिपि के स्थान पर फ़ॉन्ट/ग्लिफ़ त्रुटि (Unmapped Font/Tofu Boxes □) अंकित हैं। पृष्ठ पर प्रदर्शित सामग्री का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:
□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□; □□ □□□□□-□□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□-□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□-□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ ‘□□ □□.’□ □□□□□ □□□□- □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ 039/ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ 040/ □□ □□ □□□□□ ‘□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□, □□□□ □□ □□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□’ ‘□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□’ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ ‘□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□? □□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□ □□?’ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□-□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ ‘□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□’ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ 27
The text in the provided image appears as unrendered font glyph boxes (tofu characters, □) with only a few visible numerals and punctuation marks. Here is the line-by-line transcription of the visible page contents:
□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□ ‘□□□□ □□□ □□□□’ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□! 041/ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□-□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□-□□ □□□□! □□□□□□□ □ □□, □□□□ □□□□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□! □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□- □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□- □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□-□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □- □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□-□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□! □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□, □□□□□□□ □□□□ □□□□-□□□ □□ □□□□ □□□ 042/ □□□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□-□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ ‘□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□!’ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□, □□□□ □□ □□□□□? □□□□□ □□□□□□ □□, □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□, □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ 28
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The text in the provided image appears as missing glyph/unrendered boxes (tofu squares $\square$) due to a font encoding/rendering issue in the source document. Only punctuation, numbers, and symbols are visible:
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045/ 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 ‘🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯?’ 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 ‘🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯?’ 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 ‘🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯’ 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 ‘🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯; 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯’ 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯- 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯
046/ 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 ‘🄯🄯🄯’ 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯-🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯 🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯, 🄯🄯🄯🄯🄯 🄯🄯🄯🄯🄯🄯🄯
भगवान् की सेवा का प्रभाव यह हुआ कि सब प्रकार की आपत्तियां-विपत्तियां, क्लेश-कष्ट, दारिद्र्य अभाव-प्रमाद का नाम तक नष्ट होकर घर वैभवशाली बन गया और सब सुख से रहने लगे और समय पर सदानन्दजी सुख पूर्वक काल बिता कर इस लोक का परित्याग कर श्री शंकर लोक चले गये : ‘सब का कल्याण होगा!’ ‘सब का कल्याण होगा!’ ‘सब का कल्याण होगा!’ यह समाचार भगवान् की कृपा प्रभाव से, महाराजा युधिष्ठिर को मालूम हो गया उन्होंने भी समय पाकर यह सोचा ‘हे नाथ, आपने तो सदानन्दजी का उद्धार किया?’ प्रभु कृपा करो; महाराजा धर्म राज मन मन में नित्य ही ध्यान धरा करते थे तथापि वे स्वयं न बोले, न किसी रूप में दर्शन दिया और प्रभु प्रेम का स्वरूप भी ऐसा ही संतों ने वर्णन कर के प्रत्यक्ष किया प्रभु सदाशिव भक्त वत्सल दयालु कृपालु जब सब प्रकार परीक्षा समाप्त करके भक्त ऊपर सब कृपा दृष्टि करते हैं तथा उन पर कोई असर नहीं रहता बल्कि उनका ऐसा स्वरूप हो परिणत होता, जिसको ही भक्तजन नित्य स्मरण करते, पर वैसा स्वरूप मिलना दुर्लभ है, सदानन्द जी भाग्यवान् तथा परम तपस्वी, जो कि सब का सब उस प्रभुमय होकर अन्त ध्यान बने : मंगल दाता, सुखद पद सुखद फल
047/ भगवान् तथा भक्त
इस प्रकार श्री व्यास सत्यवतीनन्दन पराशर जी महाराज युधिष्ठिर को सब का सब सुना कर- सविस्तार यह समझा कर आगे कहना आरम्भ किया कि, जो भगवान् को अपने ही अन्तर्यामी रूप तथा रूप में निष्काम-अन्तर्यामी दर्शन करके अपने प्रभु का नाम लेता, उस भगवान् कर- दर्शन पाकर अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करता हुआ जो ‘ओ३म्’ का, अथवा किसी ऐसे नाम जप कर उस में लीन होना चाहता, न केवल यह ही प्रत्यक्ष कहा पर इस से भी महा-कठिन परीक्षा करके पूर्ण रूप से शरण होना पड़ता, जिसके न केवल शरीर का त्याग बल्कि हृदय का रूप तक भी भक्त का बदल जाता, सत्य स्वरूप हो जाता उसका रूप ही अपने स्वरूप जैसा भगवान् बना देते इस लिये, महा राज, आप मन लगा कर तन-मन-धन से ही भक्तराज बन कर सदा स्मरण कराया करो, जो कि सब का सब आपका यह राज समाज है! भगवान् तथा सत्य स्वरूप का स्मरणभजन ही केवल ‘सब बातों का फल है’ सब का तो भला हो पर स्वयं कल्याण का इच्छुक हो, कैसा काम? भला भी स्वयं करो सब को भी भला कहो सब प्रकार सेवा करके सन्तुष्ट रहना ही केवल का काम है? सन्तुष्ट होना कैसा होगा? सन्तुष्ट स्वरूप ही भगवान् का हो कर भक्त सन्तोष प्राप्त करेगा और सर्वस्व उस भगवान् पर वार देगा भगवान् का काम तो भक्त को सन्तोष रूपी अमृत देना ही रहा या फिर निर्विकल्प निर्विकार स्थिति का स्वरूप ही बना देना तथा सब तरह से ही सम्पूर्ण अभिलाषा त्याग कर जो केवल प्रभु शरण में न रहकर, केवल अपने भक्त स्वरूप को विस्तृत व्याख्यान रूप बनाकर प्रभु दर्शन चाहेगा कि, सब कार्य सर्व सुख के साधनयुक्त रूप न मिल जायगा तथा सब तरह से ही ऐसा, सब तरह निर्विकल्प स्वरूप बने केवल प्रेम ही प्राप्त हो भगवान् का दर्शन पा सकेनार्थाय मुक्ति- साधन का अभ्यासक्रम ही प्राप्त कर के सुख ले, वह सब न सब भगवान् का ही सन्तोष होगा जिस का परिणाम सब प्रकार स्वरूप से परमपद तथा मुक्ति फल-रूप भक्त रूपवान् हो सत्य स्वरूप बना कर भगवान् अपने धाम महा-वैकुण्ठ अथवा शिव जी के स्वरूप से मिला कर अपना स्वरूप देगा, भक्तजन को भगवान् का आशीर्वाद केवल मात्र यही ही वरदान का स्वरूप न होगा कि भक्त को संसार सागर तथा संसार के कल्याण का साधन रूप स्वरूप बनकर रहना ही पड़े तथा सब को भला ही भला सब प्रकार से सुख तथा शान्ति स्वरूपमयी स्थिति बनावे 31
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048/ □□□□ □□□□□
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049/ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□
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050/ □□□ □□ □□□
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051/ [अवाच्य / अनुपलब्ध फॉन्ट ग्लिफ] 052/ [अवाच्य / अनुपलब्ध फॉन्ट ग्लिफ] 34
(कृपया सही फॉन्ट/एन्कोडिंग वाली स्पष्ट या मूल छवि प्रदान करें ताकि इसका पूर्ण लिप्यंतरण किया जा सके।)