पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 712, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९५
सुखपूर्वक जिस गतिको प्राप्त करते हैं, उसे समस्त धार्मिक भी नहीं पा सकते। अतः सदा भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये, इन्हें कभी भी भूलना नहीं चाहिये। क्योंकि सभी विधि और निषेध इन्हींके किङ्कर हैं—इन्हींकी आज्ञाका पालन करते हैं।* प्रिये ! अब मैं तुमसे भगवान् विष्णुके मुख्य-मुख्य हजार नामोंका वर्णन करूँगा, जो तीनों लोकोंको मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।
विनियोग
अस्य श्रीविष्णुर्नामसहस्रस्तोत्रस्य श्रीमहादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, परमात्मा देवता, ह्रीं बीजम्, श्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, चतुर्वर्गधर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥ १९४ ॥
इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रके महादेवजी ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, परमात्मा देवता, ह्रीं बीज, श्रीं शक्ति और क्लीं कीलक हैं। चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षकी प्राप्तिके निमित्त जप करनेके लिये इस स्तोत्रका विनियोग (प्रयोग) किया जाता है ॥ १९४ ॥
ॐ वासुदेवाय विद्महे, महाहंसाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १९५ ॥
हम श्रीवासुदेवका तत्त्व समझनेके लिये ज्ञान प्राप्त करते हैं, महाहंसस्वरूप नारायणके लिये ध्यान करते हैं, श्रीविष्णु हमें प्रेरित करें—हमारी मन, बुद्धिको प्रेरणा देकर इस कार्यमें लगायें ॥ १९५ ॥
'अङ्गन्यासकरन्यासविधिपूर्वं यदा पठेत् ।
तत्फलं कोटिगुणितं भवत्येव न संशयः ॥ १९६ ॥
यदि पहले अङ्गन्यास और करन्यासकी विधि पूर्ण करके सहस्रनामस्तोत्रका पाठ किया जाय तो निस्सन्देह उसका फल कोटिगुना होता है ॥ १९६ ॥
अङ्गन्यास
श्रीवासुदेवः परं ब्रह्मेति हृदयम्। मूलप्रकृतिरिति शिरः। महावराह इति शिखा। सूर्यवंशध्वज इति कवचम्। ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशव इति नेत्रम्। पार्थार्थखण्डिताशेष इत्यस्त्रम्। नमो नारायणायेति न्यासं सर्वत्र कारयेत् ॥ १९७ ॥
'श्रीवासुदेवः परं ब्रह्म' (श्रीवासुदेव परब्रह्म हैं)—यह कहकर दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे। 'मूलप्रकृतिः' (मूल प्रकृति) का उच्चारण करके सिरका स्पर्श करे। 'महावराहः' (महान् वराहरूपधारी भगवान् विष्णु)—यह कहकर शिखाका स्पर्श करे। 'सूर्यवंशध्वजः' (सूर्यवंशके ध्वजारूप भगवान् श्रीराम) यों कहकर दोनों हाथोंसे दोनों भुजाओंके मूलभागका स्पर्श करे। 'ब्रह्मादि-काम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः' (अवतार धारण करनेपर जिनका शिशुरूप अपने अनुपम सौन्दर्यसे संसारको आश्चर्यमें डाल देता है तथा ब्रह्मा आदि देवता भी उस रूपमें जिनकी झाँकी करनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे भगवान् विष्णु धन्य हैं) यह कहकर नेत्रोंका स्पर्श करे। 'पार्थार्थखण्डिताशेषः' (अर्जुनके लिये महाभारतके समस्त वीरोंका संहार करानेवाले श्रीकृष्ण) यों कहकर ताली बजाये। अन्तमें 'नमो नारायणाय' (श्रीनारायणको नमस्कार है)—ऐसा बोलकर सर्वाङ्गका स्पर्श करे ॥ १९७ ॥†
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने, विशुद्धसत्त्वाय महाहंसाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥ १९८ ॥
ॐकाररूप सर्वान्तर्यामी महात्मा नारायणको
* स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्। सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतस्यैव हि किङ्कराः॥ (७२।१००)
† यहाँ अङ्गन्यासकी विधिका उल्लेख किया गया है; इन्हीं मन्त्रोंसे करन्यास भी किया जा सकता है, उसकी विधि इस प्रकार है। 'श्रीवासुदेवः परं ब्रह्म' यह कहकर दोनों हाथोंके अँगूठोंको परस्पर मिलाये; इसी तरह 'मूलप्रकृतिः' कहकर दोनों तर्जिनियोंको, 'महावराहः'का उच्चारण करके दोनों बीचकी अँगुलियोंको, 'सूर्यवंशध्वजः' कहकर दोनों अनामिकाओंको, 'ब्रह्मादिकाम्यलालित्य-जगदाश्चर्यशैशवः'का उच्चारण करके दोनों कनिष्ठिका अँगुलियोंको, 'पार्थार्थखण्डिताशेषः' कहकर दोनों हथेलियोंको तथा 'नमो नारायणाय'का उच्चारण करके हथेलियोंके पृष्ठभागोंको परस्पर स्पर्श कराये।