पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
नमस्कार है, विशुद्ध सत्त्वमय महाहंसस्वरूप श्रीविष्णुका हम ध्यान करते हैं; अतः श्रीविष्णु देवता हमें सत्कार्यमें प्रेरित करें ॥ ११८ ॥
ह्रीं कृष्णाय विद्महे, ह्रीं रामाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥ ११९ ॥
'ह्रीं' रूप श्रीकृष्णतत्त्वको समझनेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं; 'ह्रीं' रूप श्रीरामका हम ध्यान करते हैं; वे देव श्रीरघुनाथजी हमें प्रेरित करें ॥ ११९ ॥
शं नृसिंहाय विद्महे, श्रीकण्ठाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १२० ॥
शम्—कल्याणमय भगवान् नृसिंहका तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीकण्ठका ध्यान करते हैं; वे श्रीनृसिंहरूप भगवान् विष्णु हमें प्रेरित करें ॥ १२० ॥
ॐ वासुदेवाय विद्महे, देवकीसुताय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥ १२१ ॥
ॐकाररूप श्रीवासुदेवका तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीदेवकीनन्दन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं, वे श्रीकृष्ण हमें प्रेरित करें ॥ १२१ ॥
ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय नमः स्वाहा ॥ १२२ ॥
ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः क्लीं—सच्चिदानन्दस्वरूप, गोपीजनोंके प्रियतम भगवान् गोविन्दको नमस्कार है; हम उनकी तृप्तिके लिये उत्तम रीतिसे हवन करते हैं—अपना सब कुछ अर्पण करते हैं ॥ १२२ ॥
इति मन्त्र समुच्चार्य यजेद् वा विष्णुमव्ययम् ।
श्रीनिवासं जगन्नाथं ततः स्तोत्रं पठेत् सुधीः ॥
ॐ वासुदेवः परं ब्रह्म परमात्मा परात्परः ॥ १२३ ॥
—उपर्युक्त मन्त्रोंका उच्चारण करके लक्ष्मीके निवासस्थान और संसारके स्वामी अविनाशी भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे; इसके बाद विद्वान् पुरुष सहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ वासुदेवः—सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा समस्त भूतोंमें सर्वात्मरूपसे बसनेवाले, चतुर्व्यूहमें वासुदेवस्वरूप, २ परं ब्रह्म—सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म—निर्गुण परमात्मा, ३ परमात्मा—परम श्रेष्ठ, नित्य-शुद्ध-बुद्ध—मुक्तस्वभाव, ४ परात्परः—पर अर्थात् प्रकृतिसे भी परे विराजमान परमात्मा ॥ १२३ ॥
परं धाम परं ज्योतिः परं तत्त्वं परं पदम् ।
परः शिवः परो ध्येयः परं ज्ञानं परा गतिः ॥ १२४ ॥
५ परं धाम—सर्वोत्तम वैकुण्ठधाम, निर्गुण परमात्मा, ६ परं ज्योतिः—सूर्य आदि ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाले सर्वोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप, ७ परं तत्त्वम्—परम तत्त्व, उपनिषदोंसे जाननेयोग्य सर्वोत्तम रहस्य, ८ परं पदम्—प्राप्त करनेयोग्य सर्वोत्कृष्ट पद, मोक्षस्वरूप, ९ परः शिवः—परम कल्याणरूप, १० परो ध्येयः—ध्यान करनेयोग्य सर्वोत्तम देव, चिन्तनके सर्वश्रेष्ठ आश्रय, ११ परं ज्ञानम्—भ्रान्तिशून्य उत्कृष्ट बोधस्वरूप परमात्मा, १२ परा गतिः—सर्वोत्तम गति, मोक्षस्वरूप ॥ १२४ ॥
परमार्थः परश्रेष्ठः परानन्दः परोदयः ।
परोऽव्यक्तात्परं व्योम परमर्द्धिः परेश्वरः ॥ १२५ ॥
१३ परमार्थः—मोक्षरूप परम पुरुषार्थ, परम सत्य १४ परश्रेष्ठः—श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ, १५ परानन्दः—परम आनन्दमय, असीम आनन्दकी निधि, १६ परोदयः—सर्वाधिक अभ्युदयशाली, १७ अव्यक्तात्परः—अव्यक्तपदवाच्य मूलप्रकृतिसे परे, १८ परं व्योम—नित्य एवं अनन्त आकाशस्वरूप निर्गुण परमात्मा, १९ परमर्द्धिः—सर्वोत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न, २० परेश्वरः—पर अर्थात् ब्रह्मादि देवताओंके भी ईश्वर ॥ १२५ ॥
निरामयो निर्विकारो निर्विकल्पो निराश्रयः ।
निरञ्जनो निरालम्बो निर्लेपो निरवग्रहः ॥ १२६ ॥
२१ निरामयः—रोग-शोकसे रहित, २२ निर्विकारः—उत्पत्तिः, सत्ता, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश—इन छः विकारोंसे शून्य, २३ निर्विकल्पः—सन्देहरहित, संकल्पशून्य, २४ निराश्रयः—स्वयं ही सबके आश्रय होनेके कारण अन्य किसी आश्रयसे रहित, २५ निरञ्जनः—वासना और आसक्तिरूपी मलसे शून्य, तमोगुणरहित,