भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९७


२६ निरालम्बः—आधारशून्य, स्वयं ही सबके आधार, २७ निर्लेपः—जलसे कमलकी भाँति राग-द्वेषादि दोषोंसे अलिप्त, २८ निरवग्रहः—विघ्न-बाधाओंसे रहित ॥ १२६ ॥

निर्गुणो निष्कलोजनन्तोऽभयोऽचिन्त्योऽचलोऽञ्चितः ।
अतीन्द्रियोऽमितोऽपारो नित्योऽनीहोऽव्ययोऽक्षयः ॥ १२७ ॥

२९ निर्गुणः—सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे रहित परमात्मा, ३० निष्कलः—अवयवशून्य ब्रह्म, ३१ अनन्तः—असीम एवं अविनाशी परमेश्वर, ३२ अभयः—काल आदिके भयसे रहित, ३३ अचिन्त्यः—मनकी गतिसे परे होनेके कारण चिन्तनमें न आनेवाले, ३४ अचलः—अपनी मर्यादासे विचलित न होनेवाले, ३५ अञ्चितः—सबके द्वारा पूजित, ३६ अतीन्द्रियः—इन्द्रियोंके अगोचर, ३७ अमितः—माप या सीमासे रहित, महान्, अपरिच्छिन्न, ३८ अपारः—पाररहित, अनन्त, ३९ नित्यः—सदा रहनेवाले, सनातन, ४० अनीहः—चेष्टारहित ब्रह्म, ४१ अव्ययः—विनाशरहित, ४२ अक्षयः—कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १२७ ॥

सर्वज्ञः सर्वगः सर्वः सर्वदः सर्वभावनः ।
सर्वशास्ता सर्वसाक्षी पूज्यः सर्वस्य सर्वदृक् ॥ १२८ ॥

४३ सर्वज्ञः—परोक्ष और अपरोक्ष सबके ज्ञाता, ४४ सर्वगः—कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, ४५ सर्वः—सर्वरूप, ४६ सर्वदः—भक्तोंको सर्वस्व देनेवाले, ४७ सर्वभावनः—सबको उत्पन्न करनेवाले, ४८ सर्वशास्ता—सबके शासक, ४९ सर्वसाक्षी—भूत, भविष्य और वर्तमान—सबपर दृष्टि रखनेवाले, ५० सर्वस्य पूज्यः—सबके पूजनीय, ५१ सर्वदृक्—सबके द्रष्टा ॥ १२८ ॥

सर्वशक्तिः सर्वसारः सर्वात्मा सर्वतोमुखः ।
सर्ववासः सर्वरूपः सर्वादिः सर्वदुःखहा ॥ १२९ ॥

५२ सर्वशक्तिः—सब प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न, ५३ सर्वसारः—सबके बल, ५४ सर्वात्मा—सबके आत्मा, ५५ सर्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले, विराट्रूप, ५६ सर्ववासः—सम्पूर्ण विश्वके वासस्थान, ५७ सर्वरूपः—सब रूपोंमें स्वयं ही उपलब्ध होनेवाले, विश्वरूप, ५८ सर्वादिः—सबके आदि कारण, ५९ सर्वदुःखहा—सबके दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १२९ ॥

सर्वार्थः सर्वतोभद्रः सर्वकारणकारणम् ।
सर्वातिशयितः सर्वाध्यक्षः सर्वेश्वरेश्वरः ॥ १३० ॥

६० सर्वार्थः—समस्त पुरुषार्थरूप, ६१ सर्वतोभद्रः—सब ओरसे कल्याणरूप, ६२ सर्वकारणकारणम्—विश्वके कारणभूत प्रकृति आदिके भी कारण, ६३ सर्वातिशयितः—सबसे सब बातोंमें बढ़े हुए, ब्रह्मा और शिव आदिसे भी अधिक महिमावाले, ६४ सर्वाध्यक्षः—सबके साक्षी, सबके नियन्ता, ६५ सर्वेश्वरेश्वरः—सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर, ब्रह्मादि देवताओंके भी नियामक ॥ १३० ॥

षड्विंशको महाविष्णुर्महागुह्यो महाविभुः ।
नित्योदितो नित्ययुक्तो नित्यानन्दः सनातनः ॥ १३१ ॥

६६ षड्विंशकः—पचीस<sup></sup> तत्त्वोंसे विलक्षण छब्बीसवाँ तत्त्व, पुरुषोत्तम, ६७ महाविष्णुः—सब देवताओंमें महान् सर्वव्यापी भगवान् विष्णु, ६८ महागुह्यः—परम गोपनीय तत्त्व, ६९ महाविभुः—प्राकृत आकाश आदि व्यापक तत्त्वोंसे भी महान् एवं व्यापक, ७० नित्योदितः—सूर्य आदिकी भाँति अस्त न होकर नित्य-निरन्तर उदित रहनेवाले, ७१ नित्ययुक्तः—चराचर प्राणियोंसे नित्य संयुक्त अथवा सदा योगमें स्थित रहनेवाले, ७२ नित्यानन्दः—नित्य आनन्दस्वरूप, ७३ सनातनः—सदा एकरस रहनेवाले ॥ १३१ ॥

मायापतिर्योगपतिः कैवल्यपतिरात्मभूः ।
जन्ममृत्युजरातीतः कालातीतो भवातिगः ॥ १३२ ॥


१. पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियोंके विषय, मन, पाँच भूत, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा)—ये पचीस तत्त्व हैं। इनसे भिन्न सर्वज्ञ परमात्मा छब्बीसवाँ तत्त्व है। इसीलिये इसे 'षड्विंशक' कहा गया है।