भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 715, कुल 1018 में से

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पृष्ठ 715

६९८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण **********************************************************************

७४ मायापतिः—मायाके स्वामी, ७५ योगपतिः—योगपालक, योगेश्वर, ७६ कैवल्यपतिः—मोक्ष प्रदान करनेका अधिकार रखनेवाले, मुक्तिके स्वामी, ७७ आत्मभूः—स्वतः प्रकट होनेवाले, स्वयम्भू, ७८ जन्ममृत्युजरातीतः—जन्म, मरण और वृद्धावस्था आदि शरीरके धर्मोंसे रहित, ७९ कालातीतः—कालके वशमें न आनेवाले, ८० भवातिगः—भवबन्धनसे अतीत ॥ १३२ ॥

पूर्णः सत्यः शुद्धबुद्धस्वरूपो नित्यचिन्मयः ।
योगप्रियो योगगम्यो भवबन्धैकमोचकः ॥ १३३ ॥

८१ पूर्णः—समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, ८२ सत्यः—भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें सदा समानरूपसे रहनेवाले, सत्यस्वरूप, ८३ शुद्धबुद्धस्वरूपः—स्वाभाविक शुद्ध और ज्ञानसे सम्पन्न, प्रकृतिके संसर्गसे रहित बोधस्वरूप परमात्मा, ८४ नित्यचिन्मयः—नित्य चैतन्यस्वरूप, ८५ योगप्रियः—चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगके प्रेमी, ८६ योगगम्यः—ध्यान अथवा समाधिके द्वारा अनुभवमें आनेयोग्य, ८७ भवबन्धैकमोचकः—संसार-बन्धनसे एकमात्र छुड़ानेवाले ॥ १३३ ॥

पुराणपुरुषः प्रत्यक्चैतन्यः पुरुषोत्तमः ।
वेदान्तवेद्यो दुर्ज्ञेयस्तापत्रयविवर्जितः ॥ १३४ ॥

८८ पुराणपुरुषः—ब्रह्मा आदि पुरुषोंकी अपेक्षा भी प्राचीन, आदि पुरुष, ८९ प्रत्यक्चैतन्यः—अन्तर्यामी चेतन, ९० पुरुषोत्तमः—क्षर और अक्षर पुरुषोंसे श्रेष्ठ, ९१ वेदान्तवेद्यः—उपनिषदोंके द्वारा जाननेयोग्य, ९२ दुर्ज्ञेयः—कठिनतासे अनुभवमें आनेवाले, ९३ तापत्रयविवर्जितः—आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों तापोंसे रहित ॥ १३४ ॥

ब्रह्मविद्याश्रयोऽनघः स्वप्रकाशः स्वयम्प्रभुः ।
सर्वोपाय उदासीनः प्रणवः सर्वतः समः ॥ १३५ ॥

९४ ब्रह्मविद्याश्रयः—ब्रह्मविद्याके आश्रय, उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले ब्रह्म, ९५ अनघः—पापरहित, शुद्ध, ९६ स्वप्रकाशः—अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले, ९७ स्वयम्प्रभुः—दूसरेकी सामर्थ्यकी अपेक्षासे रहित, स्वयं समर्थ, ९८ सर्वोपायः—सर्वसाधनरूप, ९९ उदासीनः—रागद्वेषसे ऊपर उठे हुए, पक्षपातरहित, १०० प्रणवः—ओंकाररूप शब्दब्रह्म, १०१ सर्वतः समः—सब ओर समान दृष्टि रखनेवाले ॥ १३५ ॥

सर्वानवद्यो दुष्प्राप्यस्तुरीयस्तमसः परः ।
कूटस्थः सर्वसंश्लिष्टो वाङ्मनोगोचरातिगः ॥ १३६ ॥

१०२ सर्वानवद्यः—सबकी प्रशंसाके पात्र, सबके द्वारा स्तुत्य, १०३ दुष्प्राप्यः—अनन्य चित्तसे भजन न करनेवालोंके लिये दुर्लभ, १०४ तुरीयः—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत चतुर्थावस्थास्वरूप, १०५ तमसः परः—तमोगुण एवं अज्ञानसे परे, १०६ कूटस्थः—निहाईकी भाँति अविचल रूपसे स्थिर रहनेवाला निर्विकार आत्मा, १०७ सर्वसंश्लिष्टः—सर्वत्र व्यापक होनेके कारण सबसे संयुक्त, १०८ वाङ्मनोगोचरातिगः—वाणी और मनकी पहुँचसे बाहर ॥ १३६ ॥

संकर्षणः सर्वहरः कालः सर्वभयंकरः ।
अनुल्लङ्घ्यश्चित्रगतिमर्हारुद्रो दुरासदः ॥ १३७ ॥

१०९ संकर्षणः—कालरूपसे सबको अपनी ओर खींचनेवाले, चतुर्व्यूहमें सङ्कर्षणरूप, शेषावतार बलराम, ११० सर्वहरः—प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले, १११ कालः—युग, वर्ष, मास, पक्ष आदि रूपसे सम्पूर्ण विश्वको अपना ग्रास बनानेवाले, कालपदवाच्य यमराज, ११२ सर्वभयंकरः—मृत्युरूपसे सबको भय पहुँचानेवाले, ११३ अनुल्लङ्घ्यः—काल आदि भी जिनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकते, ऐसे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर, ११४ चित्रगतिः—विचित्र लीलाएँ करनेवाले लीलापुरुषोत्तम अथवा विचित्र गतिसे चलनेवाले, ११५ महारुद्रः—महान् दुःखोंको दूर भगानेवाले, ग्यारह रुद्रोंकी अपेक्षा भी महान् महेश्वररूप, ११६ दुरासदः—बड़े-बड़े दानवोंके लिये भी जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे दुर्धर्ष वीर ॥ १३७ ॥

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