भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९९


मूलप्रकृतिरानन्दः प्रद्युम्नो विश्वमोहनः।
महामायो विश्वबीजं परशक्तिः सुखैकभूः॥ १३८॥
११७ मूलप्रकृतिः—सम्पूर्ण विश्वके महाकारण-स्वरूप, ११८ आनन्दः—सब ओरसे सुख प्रदान करनेवाले, आनन्दस्वरूप, ११९ प्रद्युम्नः—महान् बलवाले कामदेव, चतुर्व्यूहमें प्रद्युम्नस्वरूप, १२० विश्वमोहनः—अपने अलौकिक रूपलावण्यसे सम्पूर्ण विश्वको मोहित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, १२१ महामायः—मायावियोंपर भी माया डालनेवाले महान् मायावी, १२२ विश्वबीजम्—जगत्‌की उत्पत्तिके आदि कारण, १२३ परशक्तिः—महान् सामर्थ्यशाली, १२४ सुखैकभूः—सुखके एकमात्र उत्पत्ति-स्थान ॥ १३८ ॥
सर्वकाम्योऽनन्तलीलः सर्वभूतवशंकरः।
अनिरुद्धः सर्वजीवो हृषीकेशो मनःपतिः॥ १३९॥

१२५ सर्वकाम्यः—सबकी कामनाके विषय, १२६ अनन्तलीलः—जिनकी लीलाओंका अन्त नहीं है—ऐसे भगवान्, १२७ सर्वभूतवशंकरः—सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने वशमें करनेवाले, १२८ अनिरुद्धः—संग्राममें जिनकी गतिको कोई रोक नहीं सकता—ऐसे पराक्रमी, शूरवीर, चतुर्व्यूहमें अनिरुद्धस्वरूप, १२९ सर्वजीवः—सबको जीवन प्रदान करनेवाले, सबके आत्मा, १३० हृषीकेशः—इन्द्रियोंके स्वामी, १३१ मनःपतिः—मनके स्वामी, हृदयेश्वर ॥ १३९ ॥
निरुपाधिप्रियो हंसोऽक्षरः सर्वनियोजकः।
ब्रह्मप्राणेश्वरः सर्वभूतभृद् देहनायकः॥ १४०॥

१३२ निरुपाधिप्रियः—जिनकी बुद्धिसे उपाधिकृत भेदभ्रम दूर हो गये हैं, उन ज्ञानी परमहंसोंके भी प्रियतम, १३३ हंसः—हंसरूप धारण करके सनकादिकोंको उपदेश करनेवाले, १३४ अक्षरः—कभी नष्ट न होनेवाले, आत्मा, १३५ सर्वनियोजकः—सबको विभिन्न कर्मोंमें लगानेवाले, सबके प्रेरक, सबके स्वामी, १३६ ब्रह्मप्राणेश्वरः—ब्रह्माजीके प्राणोंके स्वामी, १३७ सर्वभूतभृत्—सम्पूर्ण भूतोंका भरण-पोषण करनेवाले, १३८ देहनायकः— शरीरका सञ्चालन करनेवाले ॥ १४० ॥
क्षेत्रज्ञः प्रकृतिस्वामी पुरुषो विश्वसूत्रधृक्।
अन्तर्यामी त्रिधामान्तःसाक्षी निर्गुण ईश्वरः॥ १४१॥

१३९ क्षेत्रज्ञः—सम्पूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) में स्थित होकर उनका ज्ञान रखनेवाले, १४० प्रकृतिस्वामी—जगत्‌की कारणभूता प्रकृतिके स्वामी, १४१ पुरुषः—समस्त शरीरोंमें शयन करनेवाले अन्तर्यामी, १४२ विश्वसूत्रधृक्—संसाररूपी नाटकके सूत्रधार, १४३ अन्तर्यामी—अन्तःकरणमें विराजमान परमेश्वर, १४४ त्रिधामा—भूः-भुवः-स्वःरूप तीन धामवाले, त्रिलोकीमें व्याप्त, १४५ अन्तःसाक्षी—अन्तःकरणके द्रष्टा, १४६ निर्गुणः—गुणातीत, १४७ ईश्वरः—सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न ॥ १४१॥
योगिगम्यः पद्मनाभः शेषशायी श्रियः पतिः।
श्रीशिवोपास्यपादाब्जो नित्यश्रीः श्रीनिकेतनः॥ १४२॥

१४८ योगिगम्यः—योगियोंके अनुभवमें आनेवाले, १४९ पद्मनाभः—अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले, १५० शेषशायी—शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, १५१ श्रियःपतिः—लक्ष्मीके स्वामी, १५२ श्रीशिवोपास्यपादाब्जः—पार्वतीसहित भगवान् शिव जिनके चरणकमलोंकी उपासना करते हैं, वे भगवान् विष्णु, १५३ नित्यश्रीः—कभी विलग न होनेवाली लक्ष्मीकी शोभासे युक्त, १५४ श्रीनिकेतनः—भगवती लक्ष्मीके हृदय-मन्दिरमें निवास करनेवाले ॥ १४२ ॥
नित्यवक्षःस्थलस्थश्रीः श्रीनिधिः श्रीधरो हरिः।
वश्यश्रीर्निश्छलश्रीदो विष्णुः क्षीराब्धिमन्दिरः॥ १४३॥

१५५ नित्यवक्षःस्थलस्थश्रीः—जिनके वक्षःस्थलमें लक्ष्मी सदा निवास करती हैं—ऐसे भगवान् विष्णु, १५६ श्रीनिधिः—शोभाके भण्डार, सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके आधार, १५७ श्रीधरः—जगज्जननी श्रीको हृदयमें धारण करनेवाले, १५८ हरिः—पापहारी, भक्तोंका मन हर लेनेवाले—१५९ वश्यश्रीः—लक्ष्मीको सदा अपने वशमें रखनेवाले,