भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 717, कुल 1018 में से

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पृष्ठ 717

७०० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ************************************************************************************************************

१६० निश्चलश्रीदः—स्थिर सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, १६१ विष्णुः—सर्वत्र व्यापक, १६२ क्षीराब्धिमन्दिरः—क्षीरसागरको अपना निवासस्थान बनानेवाले ॥ १४३ ॥
कौस्तुभोद्भासितोरस्को माधवो जगदार्तिहा।
श्रीवत्सवक्षा निःसीमकल्याणगुणभाजनम् ॥ १४४ ॥
१६३ कौस्तुभोद्भासितोरस्कः—कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हृदयवाले, १६४ माधवः—जगन्माता लक्ष्मीके स्वामी अथवा मधुवंशमें प्रादुर्भूत भगवान् श्रीकृष्ण, १६५ जगदार्तिहा—समस्त संसारकी पीड़ा दूर करनेवाले, १६६ श्रीवत्सवक्षाः—वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले, १६७ निःसीमकल्याणगुणभाजनम्—सीमारहित कल्याणमय गुणोंके आधार ॥ १४४ ॥
पीताम्बरो जगन्नाथो जगत्त्राता जगत्पिता।
जगद्वन्धुर्जगत्स्रष्टा जगद्धाता जगन्निधिः ॥ १४५ ॥
१६८ पीताम्बरः—पीत वस्त्रधारी, १६९ जगन्नाथः—जगत्के स्वामी, १७० जगत्त्राता—सम्पूर्ण विश्वके रक्षक, १७१ जगत्पिता—समस्त संसारके जन्मदाता, १७२ जगद्वन्धुः—बन्धुकी भाँति जगत्के जीवोंकी सहायता करनेवाले, १७३ जगत्स्रष्टा—जगत्की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मारूप, १७४ जगद्धाता—अखिल विश्वका धारण-पोषण करनेवाले विष्णुरूप, १७५ जगन्निधिः—प्रलयके समय सम्पूर्ण जगत्को बीजरूपमें धारण करनेवाले ॥ १४५ ॥
जगदेकस्फुरद्वीर्यो नाहंवादी जगन्मयः।
सर्वाश्चर्यमयः सर्वसिद्धार्थः सर्वरञ्जितः ॥ १४६ ॥
१७६ जगदेकस्फुरद्वीर्यः—संसारमें एकमात्र विख्यात पराक्रमी, १७७ नाहंवादी—अहङ्काररहित, १७८ जगन्मयः—विश्वरूप, १७९ सर्वाश्चर्यमयः—जिनका सब कुछ आश्चर्यमय है—ऐसे अथवा सम्पूर्ण आश्चर्योंसे युक्त, १८० सर्वसिद्धार्थः—पूर्णकाम होनेके कारण जिनके सभी प्रयोजन सदा सिद्ध हैं—ऐसे परमेश्वर, १८१ सर्वरञ्जितः—देवता, दानव और मानव आदि सभी प्राणी जिन्हें रिझानेकी चेष्टामें लगे रहते हैं—ऐसे भगवान् ॥ १४६ ॥
सर्वामोघोद्यमो ब्रह्मरुद्राद्युत्कृष्टचेतनः।
शम्भोः पितामहो ब्रह्मपिता शक्राद्यधीश्वरः ॥ १४७॥
१८२ सर्वामोघोद्यमः—जिनके सम्पूर्ण उद्योग सफल होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते—ऐसे भगवान् विष्णु, १८३ ब्रह्मरुद्राद्युत्कृष्टचेतनः—ब्रह्मा और रुद्र आदिसे उत्कृष्ट चेतनावाले, १८४ शम्भोः पितामहः—शङ्करजीके पिता भगवान् ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले श्रीविष्णु, १८५ ब्रह्मपिता—ब्रह्माजीको उत्पन्न करनेवाले, १८६ शक्राद्यधीश्वरः—इन्द्र आदि देवताओंके स्वामी ॥ १४७ ॥
सर्वदेवप्रियः सर्वदेवमूर्तिरनुत्तमः।
सर्वदेवैकशरणं सर्वदेवैकदेवता ॥ १४८ ॥
१८७ सर्वदेवप्रियः—सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय, १८८ सर्वदेवमूर्तिः—समस्त देवरूप, १८९ अनुत्तमः—जिनसे उत्तम दूसरा कोई नहीं है, सर्वश्रेष्ठ, १९० सर्वदेवैकशरणम्—समस्त देवताओंके एकमात्र आश्रय, १९१ सर्वदेवैकदेवता—सम्पूर्ण देवताओंके एकमात्र आराध्य देव ॥ १४८ ॥
यज्ञभुग्यज्ञफलदो यज्ञेशो यज्ञभावनः।
यज्ञत्राता यज्ञपुमान्वनमाली द्विजप्रियः ॥ १४९ ॥
१९२ यज्ञभुक्—समस्त यज्ञोंके भोक्ता, १९३ यज्ञफलदः—सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाले, १९४ यज्ञेशः—यज्ञोंके स्वामी, १९५ यज्ञभावनः—अपनी वेदमयी वाणीके द्वारा यज्ञोंको प्रकट करनेवाले, १९६ यज्ञत्राता—यज्ञविरोधी असुरोंका वध करके यज्ञोंकी रक्षा करनेवाले, १९७ यज्ञपुमान्—यज्ञपुरुष, यज्ञाधिष्ठाता देवता, १९८ वनमाली—परम मनोहर वनमाला धारण करनेवाले, १९९ द्विजप्रियः—ब्राह्मणोंके प्रेमी और प्रियतम ॥ १४९ ॥
द्विजैकमानदो विप्रकुलदेवोऽसुरान्तकः।
सर्वदुष्टान्तकृत्सर्वसज्जनानन्यपालकः ॥ १५० ॥
२०० द्विजैकमानदः—ब्राह्मणोंको एकमात्र सम्मान देनेवाले, २०१ विप्रकुलदेवः— ब्राह्मणवंशको अपना आराध्यदेव माननेवाले, २०२

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