पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०१
असुरान्तकः—संसारमें अशान्ति फैलानेवाले असुरोंके प्राणहन्ता, २०३ सर्वदुष्टान्तकृत्—समस्त दुष्टोंका अन्त करनेवाले, २०४ सर्वसज्जनानन्यपालकः—सम्पूर्ण साधु पुरुषोंके एकमात्र पालक ॥ १५० ॥
सप्तलोकैकजठरः सप्तलोकैकमण्डनः ।
सृष्टिस्थित्यन्तकृच्चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ १५१ ॥
२०५ सप्तलोकैकजठरः—भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—इन सातों लोकोंको अपने एकमात्र उदरमें स्थापित करनेवाले, २०६ सप्तलोकैकमण्डनः—सातों लोकोंके एकमात्र शृङ्गार—अपनी ही शोभासे समस्त लोकोंको विभूषित करनेवाले, २०७ सृष्टिस्थित्यन्तकृत्—संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, २०८ चक्री—सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, २०९ शार्ङ्गधन्वा—शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले, २१० गदाधरः—कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले ॥ १५१ ॥
शङ्खभृन्नन्दकी पद्मपाणिर्गरुडवाहनः ।
अनिर्देश्यवपुः सर्वपूज्यस्त्रैलोक्यपावनः ॥ १५२ ॥
२११ शङ्खभृत्—एक हाथमें पाञ्चजन्य नामक शङ्ख लिये रहनेवाले, २१२ नन्दकी—नन्दक नामक खड्ग (तलवार) बाँधनेवाले, २१३ पद्मपाणिः—हाथमें कमल धारण करनेवाले, २१४ गरुडवाहनः—पक्षियोंके राजा विनतानन्दन गरुड़पर सवारी करनेवाले, २१५ अनिर्देश्यवपुः—जिसके दिव्यस्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन या संकेत न किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले, २१६ सर्वपूज्यः—देवता, दानव और मनुष्य आदि—सबके पूजनीय, २१७ त्रैलोक्यपावनः—अपने दर्शन और स्पर्श आदिसे त्रिभुवनको पावन बनानेवाले ॥ १५२ ॥
अनन्तकीर्तिर्निःसीमपौरुषः सर्वमङ्गलैः ।
सूर्यकोटिप्रतीकाशो यमकोटिदुरासदः ॥ १५३ ॥
२१८ अनन्तकीर्तिः—शेष और शारदा भी जिनकी कीर्तिका पार न पा सकें—ऐसे अपार सुयशवाले, २१९ निःसीमपौरुषः—असीम पुरुषार्थवाले, अमितपराक्रमी, २२० सर्वमङ्गलः—सबका मङ्गल करनेवाले अथवा सबके लिये मङ्गलरूप, २२१ सूर्यकोटिप्रतीकाशः—करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी, २२२ यमकोटिदुरासदः—करोड़ों यमराजोंके लिये भी दुर्धर्ष ॥ १५३ ॥
कन्दर्पकोटिलावण्यो दुर्गाकोट्यरिमर्दनः ।
समुद्रकोटिगम्भीरस्तीर्थकोटिसमाह्वयः ॥ १५४ ॥
२२३ कन्दर्पकोटिलावण्यः—करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर कान्तिवाले, २२४ दुर्गाकोट्यरिमर्दनः—करोड़ों दुर्गाओंके समान शत्रुओंको रौंद डालनेवाले, २२५ समुद्रकोटिगम्भीरः—करोड़ों समुद्रोंके समान गम्भीर, २२६ तीर्थकोटिसमाह्वयः—करोड़ों तीर्थोंके समान पावन नामवाले ॥ १५४ ॥
ब्रह्मकोटिजगत्स्रष्टा वायुकोटिमहाबलः ।
कोटीन्दुजगदानन्दी शम्भुकोटिमहेश्वरः ॥ १५५ ॥
२२७ ब्रह्मकोटिजगत्स्रष्टा—करोड़ों ब्रह्माओंके समान संसारकी सृष्टि करनेवाले, २२८ वायुकोटिमहाबलः—करोड़ों वायुओंके तुल्य महाबली, २२९ कोटीन्दुजगदानन्दी—करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले, २३० शम्भुकोटिमहेश्वरः—करोड़ों शङ्करोंके समान महेश्वर (महान् ऐश्वर्यशाली) ॥ १५५ ॥
कुबेरकोटिलक्ष्मीवाञ्छक्रकोटिविलासवान् ।
हिमवत्कोटिनिष्कम्पः कोटिब्रह्माण्डविग्रहः ॥ १५६ ॥
२३१ कुबेरकोटिलक्ष्मीवान्—करोड़ों कुबेरोंके समान सम्पत्तिशाली, २३२ शक्रकोटिविलासवान्—करोड़ों इन्द्रोंके सदृश भोग-विलासके साधनोंसे परिपूर्ण, २३३ हिमवत्कोटिनिष्कम्पः—करोड़ों हिमालयोंकी भाँति अचल, २३४ कोटिब्रह्माण्डविग्रहः—अपने श्रीविग्रहमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले, महाविराड्रूप ॥ १५६ ॥
कोट्यश्वमेधपापघ्नो यज्ञकोटिसमार्चनः ।
सुधाकोटिस्वास्थ्यहेतुः कामधुक्कोटिकामदः ॥ १५७ ॥
२३५ कोट्यश्वमेधपापघ्नः—करोड़ों अश्वमेध