भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७०२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


यज्ञोंके समान पापनाशक, २३६ यज्ञकोटिसमर्चनः—करोड़ों यज्ञोंके तुल्य पूजन-सामग्रीसे पूजित होनेवाले, २३७ सुधाकोटिस्वास्थ्यहेतुः—कोटि-कोटि अमृतके तुल्य स्वास्थ्य-रक्षाके साधन, २३८ कामधुक्कोटिकामदः—करोड़ों कामधेनुओंके समान मनोरथ पूर्ण करनेवाले ॥ १५७ ॥

ब्रह्मविद्याकोटिरूपः शिपिविष्टः शुचिश्रवाः ।
विश्वम्भरस्तीर्थपादः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १५८ ॥

२३९ ब्रह्मविद्याकोटिरूपः—करोड़ों ब्रह्मविद्याओंके तुल्य ज्ञानस्वरूप, २४० शिपिविष्टः—सूर्य-किरणोंमें स्थित रहनेवाले, २४१ शुचिश्रवाः—पवित्र यशवाले, २४२ विश्वम्भरः—सम्पूर्ण विश्वका भरण-पोषण करनेवाले, २४३ तीर्थपादः—तीर्थोंकी भाँति पवित्र चरणोंवाले, अथवा अपने चरणोंमें ही समस्त तीर्थोंको धारण करनेवाले, २४४ पुण्यश्रवणकीर्तनः—जिनके नाम, गुण, महिमा तथा स्वरूप आदिका श्रवण और कीर्तन परम पवित्र एवं पावन है—ऐसे भगवान् ॥ १५८ ॥

आदिदेवो जगज्जैत्रो मुकुन्दः कालनेमिहा ।
वैकुण्ठोऽनन्तमाहात्म्यो महायोगेश्वरोत्सवः ॥ १५९ ॥

२४५ आदिदेवः—आदि देवता, सबके आदि कारण एवं प्रकाशमान, २४६ जगज्जैत्रः—विश्वविजयी, २४७ मुकुन्दः—मोक्षदाता, २४८ कालनेमिहा—कालनेमि नामक दैत्यका वध करनेवाले, २४९ वैकुण्ठः—परमधामस्वरूप, २५० अनन्तमाहात्म्यः—जिनकी महिमाका अन्त नहीं है—ऐसे महामहिम परमेश्वर, २५१ महायोगेश्वरोत्सवः—बड़े-बड़े योगेश्वरोंके लिये जिनका दर्शन उत्सवरूप है—ऐसे भगवान् ॥ १५९ ॥

नित्यतृप्तो लसद्भावो निःशङ्को नरकान्तकः ।
दीनानाथैकशरणं विश्वैकव्यसनापहः ॥ १६० ॥

२५२ नित्यतृप्तः—अपने-आपमें ही सदा तृप्त रहनेवाले, २५३ लसद्भावः—सुन्दर स्वभाववाले, २५४ निःशङ्कः—अद्वितीय होनेके कारण भय-शङ्कासे रहित, २५५ नरकान्तकः—नरकके भयका नाश अथवा नरकासुरका वध करनेवाले, २५६ दीनानाथैकशरणम्—दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले, २५७ विश्वैकव्यसनापहः—संसारके एकमात्र संकट हरनेवाले ॥ १६० ॥

जगत्कृपाक्षमो नित्यं कृपालुः सजनाश्रयः ।
योगेश्वरः सदोदीर्णो वृद्धिक्षयविवर्जितः ॥ १६१ ॥

२५८ जगत्कृपाक्षमः—सम्पूर्ण विश्वपर कृपा करनेमें समर्थ, २५९ नित्यं कृपालुः—सदा स्वभावसे ही कृपा करनेवाले, २६० सजनाश्रयः—सत्पुरुषोंके शरणदाता, २६१ योगेश्वरः—सम्पूर्ण योगों तथा उनसे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंके स्वामी, २६२ सदोदीर्णः—सदा अभ्युदयशील, नित्य उदार, सदा सबसे श्रेष्ठ, २६३ वृद्धिक्षयविवर्जितः—वृद्धि और ह्रासरूप विकारसे रहित ॥ १६१ ॥

अधोक्षजो विश्वरेताः प्रजापतिशताधिपः ।
शक्रब्रह्मर्चितपदः शम्भुब्रह्मोर्ध्वधामगः ॥ १६२ ॥

२६४ अधोक्षजः—इन्द्रियोंके विषयोंसे ऊपर उठे हुए, अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले, २६५ विश्वरेताः—सम्पूर्ण विश्व जिनके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, वे परमेश्वर, २६६ प्रजापतिशताधिपः—सैकड़ों प्रजापतियोंके स्वामी, २६७ शक्रब्रह्मर्चितपदः—इन्द्र और ब्रह्माजीके द्वारा पूजित चरणोंवाले, २६८ शम्भुब्रह्मोर्ध्वधामगः—भगवान् शङ्कर और ब्रह्माजीके धामसे भी ऊपर विराजमान वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाले ॥ १६२ ॥

सूर्यसोमेक्षणो विश्वभोक्ता सर्वस्य पारगः ।
जगत्सेतुर्धर्मसेतुधरो विश्वधुरन्धरः ॥ १६३ ॥

२६९ सूर्यसोमेक्षणः—सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले, २७० विश्वभोक्ता—विश्वका पालन करनेवाले, २७१ सर्वस्य पारगः—सबसे परे विराजमान, २७२ जगत्सेतुः—संसार-सागरसे पार होनेके लिये सेतुरूप, २७३ धर्मसेतुधरः—धर्म-मर्यादाका पालन करनेवाले, २७४ विश्वधुरन्धरः—शेषनागके रूपसे समस्त विश्वका भार वहन करनेवाले ॥ १६३ ॥