भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तरखण्ड ]
*** नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन *** ७०३


निर्ममोऽखिललोकेशो निःसङ्गोऽद्भुतभोगवान् ।
वश्यमायो वश्यविश्वो विष्वक्सेनः सुरोत्तमः ॥ १६४ ॥
२७५ निर्ममः—आसक्तिमूलक ममतासे रहित, २७६ अखिललोकेशः—सम्पूर्ण लोकोंका शासन करनेवाले, २७७ निःसङ्गः—आसक्तिरहित, २७८ अद्भुतभोगवान्—आश्चर्यजनक भोगसामग्रीसे सम्पन्न, २७९ वश्यमायः—मायाको अपने वशमें रखनेवाले, २८० वश्यविश्वः—समस्त जगत्‌को अपने अधीन रखनेवाले, २८१ विष्वक्सेनः—युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालनेवाले, २८२ सुरोत्तमः—समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ ॥ १६४ ॥

सर्वश्रेयःपतिर्दिव्योऽनर्घ्यभूषणभूषितः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यः सर्वदैत्येन्द्रदर्पहा ॥ १६५ ॥
२८३ सर्वश्रेयःपतिः—समस्त कल्याणोंके स्वामी, २८४ दिव्यः—लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, २८५ अनर्घ्यभूषणभूषितः—अमूल्य आभूषणोंसे विभूषित, २८६ सर्वलक्षणलक्षण्यः—समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त, २८७ सर्वदैत्येन्द्रदर्पहा—समस्त दैत्यपतियोंका दर्प दलन करनेवाले ॥ १६५ ॥

समस्तदेवसर्वस्वं सर्वदैवतनायकः ।
समस्तदेवकवचं सर्वदेवशिरोमणिः ॥ १६६ ॥
२८८ समस्तदेवसर्वस्वम्—सम्पूर्ण देवताओंके सर्वस्व, २८९ सर्वदैवतनायकः—समस्त देवताओंके नेता, २९० समस्तदेवकवचम्—सब देवताओंकी कवचके समान रक्षा करनेवाले, २९१ सर्वदेवशिरोमणिः—सम्पूर्ण देवताओंके शिरोमणि ॥ १६६ ॥

समस्तदेवतादुर्गः प्रपन्नाशनिपञ्जरः ।
समस्तभयहन्नामा भगवान् विष्टरश्रवाः ॥ १६७ ॥
२९२ समस्तदेवतादुर्गः—मजबूत किलेके समान समस्त देवताओंकी रक्षा करनेवाले, २९३ प्रपन्नाशनिपञ्जरः—शरणागतोंकी रक्षाके लिये वज्रमय पिंजड़ेके समान, २९४ समस्तभयहन्नामा—जिनका नाम सब प्रकारके भयोंको दूर करनेवाला है—ऐसे विष्णु, २९५ भगवान्—पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न, २९६ विष्टरश्रवाः—कुशाकी मुष्टिके समान कानोंवाले ॥ १६७ ॥

विभुः सर्वहितोदर्कः हतारिः स्वर्गतिप्रदः ।
सर्वदैवतजीवेशो ब्राह्मणादिनियोजकः ॥ १६८ ॥
२९७ विभुः—सर्वत्र व्यापक, २९८ सर्वहितोदर्कः—सबके लिये हितकर भविष्यका निर्माण करनेवाले, २९९ हतारिः—जिनके शत्रु नष्ट हो चुके हैं, शत्रुहीन, ३०० स्वर्गतिप्रदः—स्वर्गीय—उच्चगति प्रदान करनेवाले, ३०१ सर्वदैवतजीवेशः—समस्त देवताओंके जीवनके स्वामी, ३०२ ब्राह्मणादिनियोजकः—ब्राह्मण आदि वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करनेवाले ॥ १६८ ॥

ब्रह्मशम्भुपराधायुर्ब्रह्मज्येष्ठः शिशुस्वराट् ।
विराड् भक्तपराधीनः स्तुत्यः स्तोत्रार्थसाधकः ॥ १६९ ॥
३०३ ब्रह्मशम्भुपराधायुः—ब्रह्मा और शिवकी अपेक्षा भी अनन्तगुनी आयुवाले, ३०४ ब्रह्मज्येष्ठः—ब्रह्माजीसे भी ज्येष्ठ, ३०५ शिशुस्वराट्—बालमुकुन्द-रूपसे शोभा पानेवाले, ३०६ विराद्—विशेष शोभा-सम्पन्न, अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् रूपधारी भगवान्, ३०७ भक्तपराधीनः—प्रेमविवश होकर भक्तोंके अधीन रहनेवाले, ३०८ स्तुत्यः—स्तुति करने योग्य, ३०९ स्तोत्रार्थसाधकः—स्तोत्रमें कहे हुए अर्थको सिद्ध करनेवाले ॥ १६९ ॥

परार्थकर्ता कृतज्ञः स्वार्थकृत्यसदोज्झितः ।
सदानन्दः सदाभद्रः सदाशान्तः सदाशिवः ॥ १७० ॥
३१० परार्थकर्ता—परोपकार करनेवाले, ३११ कृतज्ञः—कर्तव्यका ज्ञान रखनेवाले, ३१२ स्वार्थकृत्यसदोज्झितः—स्वार्थसाधनके कार्योंसे सदा दूर रहनेवाले, ३१३ सदानन्दः—सदा आनन्दमग्न, सत्पुरुषोंको आनन्द प्रदान करनेवाले अथवा सत् एवं आनन्दस्वरूप, ३१४ सदाभद्रः—सर्वदा कल्याणरूप, ३१५ सदाशान्तः—नित्य शान्त, ३१६ सदाशिवः—निरन्तर कल्याण करनेवाले ॥ १७० ॥

सदाप्रियः सदातुष्टः सदापुष्टः सदार्चितः ।
सदापूतः पावनाग्र्यो वेदगुह्यो वृषाकपिः ॥ १७१ ॥