भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७०४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


३१७ सदाप्रियः — सर्वदा सबके प्रियतम, ३१८ सदातुष्टः — निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले, ३१९ सदापुष्टः — क्षुधा-पिपासा तथा आधि-व्याधिसे रहित होनेके कारण सदा पुष्ट शरीरवाले, ३२० सदार्चितः — भक्तोंद्वारा निरन्तर पूजित, ३२१ सदापूतः — नित्य पवित्र, ३२२ पावनाग्र्यः — पवित्र करनेवालोंमें अग्रगण्य, ३२३ वेदगुह्यः — वेदोंके गूढ़ रहस्य, ३२४ वृषाकपिः — वृष—धर्मको अकम्पित (अविचल) रखनेवाले श्रीविष्णु ॥ १७१ ॥

सहस्रनामा त्रियुगश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्भुजः ।
भूतभव्यभवन्नाथो महापुरुषपूर्वजः ॥ १७२ ॥

३२५ सहस्रनामा — हजारों नामवाले, ३२६ त्रियुगः — सत्ययुग, त्रेता और द्वापर नामक त्रियुग-स्वरूप, ३२७ चतुर्मूर्तिः — राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, ३२८ चतुर्भुजः — चार भुजाओंवाले, ३२९ भूतभव्यभवन्नाथः — भूत, भविष्य और वर्तमान—सभी प्राणियोंके स्वामी, ३३० महापुरुषपूर्वजः — महापुरुष ब्रह्मा आदिके भी पूर्वज ॥ १७२ ॥

नारायणो मञ्जुकेशः सर्वयोगविनिःसृतः ।
वेदसारो यज्ञसारः सामसारस्तपोनिधिः ॥ १७३ ॥

३३१ नारायणः — जलमें शयन करनेवाले, ३३२ मञ्जुकेशः — मनोहर घुँघराले केशोंवाले, ३३३ सर्वयोगविनिःसृतः — नाना प्रकारके शास्त्रोक्त साधनोंसे जाननेमें आनेवाले, समस्त योग-साधनोंसे प्रकट होनेवाले, ३३४ वेदसारः — वेदोंके सारभूत तत्त्व, ब्रह्म, ३३५ यज्ञसारः — यज्ञोंके सारतत्त्व—यज्ञपुरुष विष्णु, ३३६ सामसारः — सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा गाये जानेवाले सारभूत परमात्मा, ३३७ तपोनिधिः — तपस्याके भंडार नर-नारायण-स्वरूप ॥ १७३ ॥

साध्यश्रेष्ठः पुराणर्षिनिष्ठा शान्तिः परायणम् ।
शिवस्त्रिशूलविध्वंसी श्रीकण्ठैकवरप्रदः ॥ १७४ ॥

३३८ साध्यश्रेष्ठः — साध्य देवताओंमें श्रेष्ठ, साधनसे प्राप्त होनेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ, ३३९ पुराणर्षिः — पुरातन ऋषि नारायण, ३४० निष्ठा — सबकी स्थितिके आधार—अधिष्ठानस्वरूप, ३४१ शान्तिः — परम शान्तिस्वरूप, ३४२ परायणम् — परम प्राप्यस्थान, ३४३ शिवः — कल्याणस्वरूप, ३४४ त्रिशूलविध्वंसी — आध्यात्मिक आदि त्रिविध शूलोंका नाश करनेवाले अथवा प्रलयकालमें महारुद्र-रूप होकर त्रिशूलसे समस्त विश्वका विध्वंस करनेवाले, ३४५ श्रीकण्ठैकवरप्रदः — भगवान् शङ्करके एकमात्र वरदाता ॥ १७४ ॥

नरः कृष्णो हरिर्धर्मनन्दनो धर्मजीवनः ।
आदिकर्ता सर्वसत्यः सर्वस्त्रीरत्नदर्पहा ॥ १७५ ॥

३४६ नरः — बदरिकाश्रममें तपस्या करनेवाले ऋषिश्रेष्ठ नर, नरके अवतार अर्जुन, ३४७ कृष्णः — भक्तोंके मनको आकृष्ट करनेवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा, ३४८ हरिः — गजेन्द्रकी पुकार सुनकर तत्काल प्रकट हो ग्राहके प्राणोंका अपहरण करनेवाले भगवान् श्रीहरि, ३४९ धर्मनन्दनः — धर्मके यहाँ पुत्ररूपसे अवतीर्ण होनेवाले भगवान् नारायण अथवा धर्मराज युधिष्ठिरको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, ३५० धर्मजीवनः — पापाचारी असुरोंका मूलोच्छेद करके धर्मको जीवित रखनेवाले, ३५१ आदिकर्ता — जगत्के आदि कारण ब्रह्माजीको उत्पन्न करनेवाले, ३५२ सर्वसत्यः — पूर्णतः सत्यस्वरूप, ३५३ सर्वस्त्रीरत्नदर्पहा — जितेन्द्रिय होनेके कारण सम्पूर्ण सुन्दरी स्त्रियोंका अभिमान चूर्ण करनेवाले ॥ १७५ ॥

त्रिकालजितकन्दर्प उर्वशीसृङ्मुनीश्वरः ।
आद्यः कविर्हयग्रीवः सर्ववागीश्वरेश्वरः ॥ १७६ ॥

३५४ त्रिकालजितकन्दर्पः — भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें कामदेवको परास्त करनेवाले, ३५५ उर्वशीसृक् — उर्वशी अप्सराकी सृष्टि करनेवाले भगवान् नारायण, ३५६ मुनीश्वरः — तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ नर-नारायणस्वरूप, ३५७ आद्यः — आदिपुरुष विष्णु, ३५८ कविः — त्रिकालदर्शी विद्वान्, ३५९ हयग्रीवः — हयग्रीव नामक अवतार धारण करनेवाले