भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०५

भगवान्, ३६० सर्ववागीश्वरेश्वरः— ब्रह्मा आदि समस्त वागीश्वरोंके भी ईश्वर ॥ १७६ ॥ सर्वदेवमयो ब्रह्मगुरुर्वागीश्वरीपतिः । अनन्तविद्याप्रभवो मूलाविद्याविनाशकः ॥ १७७ ॥ ३६१ सर्वदेवमयः—सम्पूर्ण देवस्वरूप, ३६२ ब्रह्मगुरुः—ब्रह्माजीको वेदका उपदेश करनेवाले गुरु, ३६३ वागीश्वरीपतिः—वाणीकी अधीश्वरी सरस्वती देवीके स्वामी, ३६४ अनन्तविद्याप्रभवः—असंख्य विद्याओंकी उत्पत्तिके हेतु, ३६५ मूलाविद्या-विनाशकः— भव-बन्धनकी हेतुभूत मूल अविद्याका विनाश करनेवाले ॥ १७७ ॥ सर्वज्ञदो नमज्जाड्यनाशको मधुसूदनः । अनेकमन्त्रकोटीशः शब्दब्रह्मैकपारगः ॥ १७८ ॥ ३६६ सर्वज्ञदः—सर्वज्ञता प्रदान करनेवाले, ३६७ नमज्जाड्यनाशकः—प्रणाम करनेवाले भक्तोंकी जड़ताका नाश करनेवाले, ३६८ मधुसूदनः— मधु नामक दैत्यका वध करनेवाले, ३६९ अनेकमन्त्र-कोटीशः—अनेक करोड़ मन्त्रोंके स्वामी, ३७० शब्दब्रह्मैकपारगः— शब्दब्रह्म (वेद-वेदाङ्गों) के एकमात्र पारङ्गत विद्वान् ॥ १७८ ॥ आदिविद्वान् वेदकर्ता वेदात्मा श्रुतिसागरः । ब्रह्मार्थवेदाहरणः सर्वविज्ञानजन्मभूः ॥ १७९ ॥ ३७१ आदिविद्वान्—सर्वप्रथम वेदका ज्ञान प्रकाशित करनेवाले, ३७२ वेदकर्ता—अपने निःश्वासके साथ वेदोंको प्रकट करनेवाले, ३७३ वेदात्मा—वेदोंके सार तत्त्व—उनके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले सिद्धान्तभूत परमात्मा, ३७४ श्रुतिसागरः—वैदिक ज्ञानके समुद्र, ३७५ ब्रह्मार्थवेदाहरणः—मत्स्यरूप धारण करके ब्रह्माजीके लिये वेदोंको ले आनेवाले, ३७६ सर्वविज्ञानजन्मभूः—सब प्रकारके विज्ञानोंकी जन्मभूमि ॥ १७९ ॥ विद्याराजो ज्ञानमूर्तिर्ज्ञानसिन्धुरखण्डधीः । मत्स्यदेवो महाशृङ्गो जगद्बीजवहित्यधृक् ॥ १८० ॥ ३७७ विद्याराजः—समस्त विद्याओंके राजा, ३७८ ज्ञानमूर्तिः—ज्ञानस्वरूप, ३७९ ज्ञानसिन्धुः—ज्ञानके सागर, ३८० अखण्डधीः—संशय-विपर्यय आदिके द्वारा कभी खण्डित न होनेवाली बुद्धिसे युक्त, ३८१ मत्स्यदेवः—मत्स्यावतारधारी भगवान्, ३८२ महाशृङ्गः—मत्स्य-शरीरमें ही महान् शृङ्ग धारण करनेवाले, ३८३ जगद्बीजवहित्यधृक्—संसारकी बीजभूत ओषधियोंके सहित नौकाको अपने सींगमें बाँधकर धारण करनेवाले मत्स्य-भगवान् ॥ १८० ॥ लीलाव्याप्ताखिलाम्भोधिर्ऋग्वेदादिप्रवर्तकः । आदिकूर्मोऽखिलाधारस्तृणीकृतजगद्भरः ॥ १८१ ॥ ३८४ लीलाव्याप्ताखिलाम्भोधिः—अपने मत्स्य-शरीरसे लीलापूर्वक सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लेनेवाले, ३८५ ऋग्वेदादिप्रवर्तकः—ऋग्वेद, यजुर्वेद आदिके प्रवर्तक, ३८६ आदिकूर्मः—सर्वप्रथम कच्छपरूपमें प्रकट होनेवाले भगवान्, ३८७ अखिलाधारः—अखिल ब्रह्माण्डके आधारभूत, ३८८ तृणीकृतजगद्भरः—समस्त जगत्के भारको तिनकेके समान समझनेवाले ॥ १८१ ॥ अमरीकृतदेवौघः पीयूषोत्पत्तिकारणम् । आत्माधारो धराधारो यज्ञाङ्गो धरणीधरः ॥ १८२ ॥ ३८९ अमरीकृतदेवौघः—अमृत पिलाकर देवसमुदायको अमर बनानेवाले, ३९० पीयूषोत्पत्ति-कारणम्—क्षीरसागरसे अमृतके निकालनेमें प्रधान कारण, ३९१ आत्माधारः—अन्य किसी आधारकी अपेक्षा न रखकर अपने ही आधारपर स्थित रहनेवाले, ३९२ धराधारः—पृथ्वीके आधार, ३९३ यज्ञाङ्गः—यज्ञमय शरीरवाले भगवान् वराह, ३९४ धरणीधरः—अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वीको धारण करने-वाले ॥ १८२ ॥ हिरण्याक्षहरः पृथ्वीपतिः श्राद्धादिकल्पकः । समस्तपितृभीतिघ्नः समस्तपितृजीवनम् ॥ १८३ ॥ ३९५ हिरण्याक्षहरः—वराहरूपसे ही हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध करनेवाले, ३९६ पृथ्वीपतिः—उक्त अवतारमें ही पृथ्वीको पत्नीरूपमें ग्रहण करनेवाले, अथवा पृथ्वीके पालक, ३९७ श्राद्धादिकल्पकः—पितरोंके लिये श्राद्ध आदिकी व्यवस्था करनेवाले, ३९८